उदय प्रकाश किसी बिरहमन के तीर से नहीं मर सकता !
उदय प्रकाश किसी बिरहमन के तीर से नहीं मर सकता !
उदय प्रकाश कभी-कभी नहीं अक्सर असहज ही रहते हैं- नीलाभ
नई दिल्ली। हिंदी के वरिष्ठ साहित्यकार उदय प्रकाश (जिन्हें हिंदी से बहुत चिढ़ है) और वरिष्ठ पत्रकार दयानंद पाण्डेय के बीच आजकल ठनी हुई है। सुनते हैं दयानन्द पाण्डेय ने कुछ लिख दिया है जिससे उदय प्रकाश बिदके हुए हैं। उधर रूस में रहने वाले वरिष्ठ पत्रकार व साहित्यकार अनिल जनविजय ने फेसबुक पर दयानन्द पाण्डेय से दो बातें कीं तो उनकी फेसबुक टाइमलाइन पर बहस छिड़ गई। आइए देखते हैं अनिल जनविजय की टिप्पणी व उस पर कुछ कमेंट्स
दयानन्द पाण्डे से दो शब्द
उदय मेरा बहुत गहरा दोस्त है। कभी-कभी असहज हो जाता है। लेकिन दोस्त तो दोस्त होता है। मैंने दोस्ती में ही भारत यायावर को थप्पड़ मार दिया था। लेकिन वह मेरे उस थप्पड़ को चुपचाप पी गया। बाद में मुझे ही दुख हुआ। लेकिन हमने कभी इस बारे में बाद में कोई बात नहीं की। भारत आज भी मेरा वैसा ही गहरा दोस्त है। मैं उदय के घर पड़ा रहता था। उन दिनों मैं बेरोज़गार था। उदय ही मुझे खाना खिलाता था। उदय ने ही मेरी जमानत दी थी। आपात्काल में सरकार-विरोधी सक्रियता के कारण एक मुकदमे में फंसा हुआ था मैं। उदय ख़ुद भी कोई काम नहीं करता था और उदय की पत्नी को मुंह दिखाई में मिली गिन्नी बेचकर जैसे-तैसे जीवन के दिन खींचे थे। उसी उदय ने फिर एक बार मुझे अपने घर से निकाल दिया था। मैं मास्को से आया था। उदय से मिलने गया। उदय को गलतफ़हमी हो गई और उसने मुझे घर में नहीं घुसने दिया। लेकिन हम आज भी दोस्त हैं। गहरे दोस्त हैं। दोस्ती में इस तरह की चीज़ें होती रहती हैं, लेकिन दयानन्द जी, आपकी तरह पलटकर वार मैंने नहीं किया था। क्योंकि मैं उदय का दोस्त था और दोस्त हूं। आप उदय के दोस्त नहीं थे और न कभी बनेंगे। बाक़ी आप जो हैं, सो हैं। पुरस्कार तो नागार्जुन ने भी इन्दिरा गांधी से लिया था। उन्हीं इन्दिरा गांधी से, जिन्होंने आपात्काल लगाया था और जिन्हें बाबा अपनी कविताओं में लताड़ते रहे थे। क्या नागार्जुन के इन्दिरा गांधी से पुरस्कार लेने पर भी ऐसा कोई लेख लिखा गया है? मैंने तो नहीं देखा। न जाने कितना बड़ा गुनाह कर दिया है उदय ने कि किसी आर०एस०एस० के नेता से पुरस्कार ले लिया? सब उदय विरोधी बस इसी एक बात को गाते रहते हैं। उदय की रचनाओं पर बात करिए और तब बताइए कि आप कहां पर हैं?
(अनिल जनविजय की पोस्ट)
अनिल भाई, यह वह ताली है जो दोनो हाथ से बजती है, एक से नहीं। अाप सचमुच बेहतरीन इंसान हैं जो इस हद तक जाकर र्दोस्ती निभा लेते है।
(Om Nishchal का कमेंट)
घोर परम्परावादी शास्त्रोक्त ब्राह्मणवादी लेख !
मनु-स्मृति ने ब्राह्मणों को यह हक़ दे रखा है कि वे ठाकुरों को गाली दे सकते हैं । उदय को जितनी गालियाँ अभी तक दी गयीं हैं, उनका यह एक अच्छा संकलन है, जिसमें Dayanand Pandey जी ने संस्मरण का भी तड़का लगा दिया है । इस वि-लेख का कोई साहित्यिक मूल्य तो है नहीं, यह कस्बाई पत्रकारिता का एक बेहतरीन नमूना है । और हाँ, दयानंदजी पिछले कुछ दिनों से ब्राह्मणवाद के प्रवक्ता के रूप में अवैध रूप से कार्य कर रहे हैं, क्योंकि उनका नियुक्ति-पत्र हमारी नज़रों से नहीं गुज़रा । ब्राह्मण के घर पैदा होने से कोई ब्राह्मणवादी नहीं हो जाता !
और सुन लीजिये उदय प्रकाश किसी बिरहमन के तीर से नहीं मर सकता !
(कल्बे कबीर का कमेंट)
इस भगवाधारी से पुरस्कार लेकर उदय प्रकाश ने वामपंथी नकाब नोच डाला। कृपया बाबा से तुलना न करें। ये है हिंदी साहित्यकार का ढोंग। मेरी बात अच्छी नहीं लगेगी। माफ़ करेंगे। आपलोग बड़े आदमी हैं। मैं साहित्य की समझ नहीं रखता। पर वाह क्या बात है उदय प्रकाश जी। योगी दंगाबाज से पुरस्कार। बहुत ख़ूब। बहुत ख़ूब। वाह रे हिंदी का कवि। यह समय ही बुरा है।
(Manoj Kumarjha का कमेंट)
अनिल तुम्हारी बात ऐसी ही है, जैसे कोई कहे कि दाऊद इब्राहिम होंगे डौन पर मेरे साथ उनके अच्छे सम्बन्ध हैं. उदय प्रकाश कभी-कभी नहीं अक्सर असहज ही रहते हैं. ऊपर से वे एक उलटे हीनता बोध के मारे हुए भी हैं. योगी के हाथ से वे पुरस्कार न लेते तो मैं कभी समझ न पाता कि यह योगी ठाकुर है, मैं तो उसे बांभन समझा था. जब इसकी आलोचना हुई तो उदय ने ऐतराज़ करने वाले सभी लोगों को चुन-चुन कर गालियां दीं और ब्राहमणवादी कहा. जहां तक उदय की रचनाओं पर बात करने का सवाल है, डियर, तुम लोगों की आंख पर पट्टी बंधी है, वरना तुम्हें "रामसजीवन की प्रेम कथा" और "पाल गोमरा का स्कूटर" जैसी रचनाओं का खोट नज़र आ जाता. और "तिरिछ" का सच जाननेके लिएमार्केज़ के "क्रौनिकल औफ़ अ डेथ फ़ोरटोल्ड" को पढ़ लो. बाक़ी, मेरा तो अब यह पक्का मानना है कि हिन्दी के लेखकों में दम नहीं रहा, वरना उदय की रक्षा करने के लिए नागार्जुन को न घसीट लाते. नागार्जुन की भी आलोचना हुई थी पर उन्होंने, और मैं उद्धृत कर रहा हूं, कहा था, "पुरस्कार क्या इन्दिरा गान्धी के बाप का था." बस. किसी ऐतराज़ करने वाले को बुरा-भला नहीं कहा था. इसलिए दोस्ती उतनी निभाओ जितनी ज़रूरत हो. और भी हैं जिनकी स्मृति तुम जितनी ही अच्छी है. ज़रा कभी देवी प्रसाद मिश्र से पूछना कि उदय ने उनके साथ कैसा प्रेम और नफ़रत भरा सुलूक़ किया था. @ Anil Janvijay
(Neelabh Ashk का कमेंट )
Neelabh Ashk जी ....क्या आप ये कहना चाहते हैं कि उदय जी कहीं से पढ़कर उसका भाव अपनी कहानियों में ले आते हैं..?? ऐसा बिलकुल नहीं है...आप दो- तीन नाम ही क्यों गिनाये ..और बहुत कुछ लिखा है उदय जी ने .... पीली छतरी वाली लड़की पर कहाँ का प्रभाव है,,,मोहनदास पढ़िए क्या गलत है उसमे .... टेपचू , अरेबा -परेबा सब हमारे आसपास की कथा हैं ... आप तो बड़ी दूर चले जा रहे हैं मार्खेज के घर तक
(Sandeep Tiwari का कमेंट)


