उद्योगपति से गया गुजरा है हमारा शिक्षक समाज!
उद्योगपति से गया गुजरा है हमारा शिक्षक समाज!
सुरेश शर्मा
एक किसान जब फसल काटता है तो सबसे बढ़िया दाना छाँट कर बीज के रूप में अगली फसल के लिए संजो कर रख लेता है। भारत का शिक्षा तंत्र इस तरह की किसानी में बिलकुल फिस्सडी है। यहाँ हर वर्ष बाजार से सबसे घटिया बीज ( शिक्षक ) ढूँढ कर लाया जाता है। हाथ की मजदूरी से भी सस्ती दर पर काम करने को राजी आदमी यहाँ के स्कूलों में देश का भविष्य निर्माण कर रहे हैं।
जो सरकारें अपने नागरिक को सूचना तक का अधिकार देने में कतराती हैं सोचिए उस देश का शिक्षा तंत्र कितने षड्यंत्रकारी ढँग से काम कर रहा होगा? विश्व विद्यालयों का काम विश्व नागरिक का निर्माण करना है क्या हमारे विश्वविद्यालय दावा कर सकते हैं कि उनके स्नातक वैश्विक सोच रखते हैं।
एक फैक्टरी में कार या मोबाइल खराब हो जाता है तो वह अपनी नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करते हुये उस बैच के सारे उत्पाद बाजार से रिपेयरिंग के लिये या रिप्लेस करने के लिये वापस बुला लेती है। आजादी के बाद आज तक किसी विश्वविद्यालय ने अपने दिये ग्रेजुएट्स पर कोई सवाल नही उठाया, किसी भी पेशेवर काउन्सिल ने कभी भी अपने अधीन काम कर रहे पेशेवर को कोई सजा नहीं दी। जिम्मेदारी स्वीकारने के मामले में एक उद्योगपति से गया गुजरा है हमारा शिक्षक समाज?


