उरी सेक्टर में शहीद 18 जवानों के कातिल मोदी जी और उनकी सरकार है
उरी सेक्टर में शहीद 18 जवानों के कातिल मोदी जी और उनकी सरकार है
उरी सेक्टर में शहीद 18 जवानों के कातिल मोदी जी और उनकी सरकार है
युद्ध मोदी जी की जरूरत हो सकती है। लेकिन देश की नहीं
महेंद्र मिश्र
खुफिया सूचना रहते कोई पहल न कर सरकार ने आपराधिक लापरवाही की। और उसकी कीमत किसानों के सपूतों को अपनी जान देकर चुकानी पड़ी।
तात्कालिक चूकों में केवल यही एक नहीं है।
केंद्र में आने के बाद मोदी सरकार ने कश्मीर समाधान का नायाब रास्ता चुना। पहले उसने पैलेट गनों से 500 लोगों को अंधा किया। और फिर 70 से ज्यादा लोगों को उसका शिकार बनाया गया। फिर ऐतिहासिक कर्फ्यू के जरिये घाटी को गर्म किया गया। जब घाटी उबलने लगी तो फिर उन्होंने लाल किले से बलूचिस्तान का नया पांसा फेंक दिया। यह बिल्कुल नया नुस्खा था।
मोदी जी बलूचिस्तान से कश्मीर को साधना चाहते थे। लेकिन यह दांव बिल्कुल उल्टा पड़ गया। सरकार की कार्रवाई से पाकिस्तान के पास एक तरफ चरमपंथियों की नई फसल काटने का मौका था। दूसरी तरफ बलूचिस्तान के जवाब की जल्दबाजी। जो इस हमले ने पूरी कर दी है।
इस घटना के बाद देश में युद्ध राग चल रहा है।
लेकिन युद्ध करना हमारा मकसद है। या फिर इलाके से आतंकवाद का खात्मा और कश्मीर का स्थाई समाधान?
इस पर बात करने से पहले आइये एक दूसरी तस्वीर पर नजर डालते हैं। जो पाकिस्तान पिछले 25 सालों से आतंकवाद का पनाहगाह बना हुआ था। उसकी सरकार पिछले डेढ़ सालों से आतंकियों के खात्मे के अभियान में जुटी थी। इसके तहत कई को फांसी हुईं। तो कई एनकाउंटर में मार गिराए गए।
दरअसल इस मामले में पेशावर की घटना एक टर्निंग प्वाइंट थी। जब एक सैनिक स्कूल में आतंकियों ने सैकड़ों मासूम बच्चों को हलाक कर दिया था।
इस घटना ने आतंकवाद के सबसे सगे सैनिक तंत्र के भी कान खड़े कर दिए थे। उन्हें भी उपने पैदा किए भस्मासुर के खतरे का अहसास हो गया। देश में जगह-जगह हो रहे आतंकी विस्फोटों से सरकार पहले से ही परेशान थी।
नतीजतन नागरिक सरकार और सैनिक तंत्र आतंकवाद के खिलाफ एकजुट हो गए। लेकिन इस बीच कश्मीर में मोदी के नये रुख और बलूचिस्तान प्रकरण ने उसे नई संजीवनी दे दी। और सारा मामला एक बार फिर उसके घर से निकल कर सरहद पर पहुंच गया। पाक को यह किसी अभयदान से कम नहीं था।
भारत के प्रधानमंत्री लाल किले से पड़ोसी के घर में घुसने का ऐलान करेंगे।
देश का पूरा मीडिया तंत्र भारत से लेकर यूरोप तक बलूचिस्तान मसले पर उसके खिलाफ अगुवाई करेगा। और इस पर भी पड़ोसी चुप बैठा रहेगा। यह निरा सपना ही हो सकता है।
मोदी सरकार को देश को यह जरूर बताना होगा कि बलूचिस्तान में यह ऐलानिया हस्तक्षेप कूटनीति के किस सिद्धांत में आता है? इससे घर में भले सरकार ने कुछ वाहवाही हासिल कर ली हो। लेकिन अंतरराष्ट्रीय स्तर पर देश की बड़ी किरकिरी हुई है। पाकिस्तान के खिलाफ दुनिया के पैमाने पर भारत जिस आधार पर घेरेबंदी करता था अब उसने वह नैतिक अधिकार भी खो दिया। आज सरकार कह रही है कि वह अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाक को हर मंच से अलग-थलग करने का अभियान छेड़ेगी। ऐसे में अगर किसी ने पूछ लिया कि बलूचिस्तान में आप जो कर रहे हैं वह क्या है?
तो सरकार के पास क्या जवाब होगा?
दरअसल कश्मीर और पाक को लेकर सरकार की नीति बेहद अस्पष्ट रही है। घाटी की समस्या को सुलझाने का यह ऐतिहासिक मौका था। जिस कश्मीर में 1990 में आतंकियों की संख्या 3000 थी वह मौजूदा समय में घटकर 150 तक आ गई है। कश्मीर के लोग भी लड़ाई, भय और आतंक के माहौल से ऊब गए थे। और अब नई जिंदगी की तलाश में थे। विभिन्न सरकारी सेवाओं में कश्मीरियों का चयन। और देश के अलग-अलग हिस्सों में कश्मीरी बच्चों के पढ़ने और रोजगार में उनकी भागीदारी। इसी के संकेत थे।
कश्मीर में पहली बार एक ऐसी सरकार बनी थी जो किसी और के मुकाबले जनता के ज्यादा करीब थी। संयोग से बीजेपी का उसके साथ गठबंधन भी था। ऐसे में अगर गठबंधन के वायदे को ही लागू करना शुरू कर दिया जाता। तो आज तस्वीर बिल्कुल अलहदा होती। लेकिन सवा दो साल तक केंद्र और सूबे की सरकारें पैर तोड़कर बैठी रहीं। और जब आतंकी बुरहान वानी की मौत की घटना के बाद घाटी में उबाल आया तो सरकार ने पानी डालने की जगह पैलेट गनों से उसका सामना किया। और बदले में शांति की जगह उनकी आंखे छीनी और मौत बांटी। नतीजतन पूरा कश्मीर भट्टी पर चढ़ गया। और अब वहां उग्रवाद की एक नई फसल तैयार है।
इसी तरह से पाकिस्तान के साथ दोस्ती का सरकार ने दिखावा जरूर किया।
लेकिन उसके लिए जो ठोस पहल करनी चाहिए थी वह बिल्कुल नदारद रही। शपथ ग्रहण में बुलाना और प्रोटोकाल तोड़कर प्रधानमंत्री का शरीफ के पास जाना कुछ दिखावी नुस्खे जरूर हो सकते हैं। लेकिन समस्या को हल करने का कोई व्यवस्थित तरीका नहीं।
अनायास नहीं इस पूरे दौरान प्रधानमंत्री की इन गतिविधियों में और विदेश मंत्रालय के बीच कोई तालमेल नहीं था। कहते हैं नियति से ही बरक्कत होती है। जब वही नहीं ठीक है तो भला क्या कुछ हासिल होगा।
दरअसल मोदी जी और खासकर संघ को पाकिस्तान से दोस्ती करनी ही नहीं है। उसे शांत कश्मीर चाहिए ही नहीं। क्योंकि उसकी पूरी राजनीति पाक विरोध पर टिकी है। घर में भी उसकी वोट की रोटी इसी तवे पर सिंकती है।
आप क्या चाहते हैं कि उसकी रोजी-रोटी बंद हो जाए।
उसकी राष्ट्रभक्ति और राष्ट्र विरोध का पैमाना पाक नाम के बैरोमीटर से तय होता है। फिर मोदी जी तो पूरे गणवेषधारी हैं। वह भला इस लीक से कैसे हट सकते हैं। इसीलिए मोदी जी ने शुरू में ही जल्दी-जल्दी पाक से दोस्ती की खानापूर्ति कर ली।
नीयत थी ही नहीं इसलिए ठोस प्रयास भी नहीं किया गया। और आखिर में 2019 का चुनाव आते-आते उन्हें इस तरह के झगड़े में जाना ही था। जो थोड़ा उससे पहले सिर पर आ गया है। हालांकि लाल किले से उन्होंने ही इसकी शुरुआत की है।
और अब पूरे देश को एक ऐसी जगह लाकर खड़ा कर दिया गया है जहां से युद्ध के अलावा कोई दूसरा विकल्प ही नहीं दिख रहा है।
युद्ध का यही राग पूरे देश में चल रहा है। युद्ध मोदी जी की जरूरत हो सकती है। लेकिन देश की नहीं। (यह कभी किसी की जरूरत होनी भी नहीं चाहिए)। हालांकि सारे मोर्चों पर नाकाम होने के बाद उन्हें एक गोधरा की तलाश है। और यहां तो मुस्लिम और पाक विरोध दोनों काम एक साथ हो जाएगा।
मोदी जी के लिए इससे सुनहरा मौका और कोई नहीं हो सकता।
लेकिन यह थोड़ा जल्दी आ गया। मोदी जी युद्ध में जाएंगे लेकिन अभी नहीं। क्योंकि 2019 अभी दूर है।
आज अगर युद्ध कर लिया गया तो 2019 तक उसका असर भी खत्म हो जाएगा। लिहाजा इस मौके का पाकिस्तान की घेरेबंदी के लिए इस्तेमाल किया जाएगा। साथ ही कहा जाएगा कि उसे हम एक और माफी देते हैं। उसकी अगली गल्ती आखिरी होगी। फिर भविष्य में 2019 के करीब कोई छोटी घटना भी इसके लिए काफी होगी।
फिर यही सरकार कह रही होगी कि आप ही लोग तो युद्ध की मांग कर रहे थे। सरकार ने तो अपनी तरफ से उसे रोकने का पूरा प्रयास किया।
युद्ध कभी भी किसी भी समस्या का समाधान नहीं हो सकता है।
किसी भी मामले में राजनीतिक, कूटनीतिक और बातचीत का विकल्प प्राथमिक और आखिरी होना चाहिए। सैन्य विकल्प है भी तो एक अपवाद के तौर पर। क्योंकि इसके सिर्फ नुकसान ही नुकसान हैं। अगर कोई फायदा हो तो समर्थन करने वालों में सबसे पहला नाम मेरा होगा। लिहाजा उन विभीषिकाओं और उसके नतीजों के समझने के बाद ही कोई फैसला लेना उचित रहेगा।
मसलन अभी हम 18 सैनिकों की लाशों पर आहत हैं। युद्ध के दौरान हजार नहीं तो सैकड़ा सैनिक मारे ही जाएंगे। तब क्या हम उसे बर्दाश्त कर सकेंगे। कारगिल युद्ध में एक वक्त के बाद सैनिकों की लाशें हमें परेशान करने लगी थीं। क्या हमारे भीतर उस मंजर से गुजरने का साहस है। दोनों मुल्क परमाणु संपन्न हैं। और खुदा न खास्ता किसी उन्माद या फिर शासकों की किसी हताशा में यह चल गया। तो फिर इतिहास भी हमें माफ नहीं कर पाएगा। इसमें नुकसान दोनों पक्षों का होगा।
किसका कितना होगा वह आंकलन लगा पाना भी कठिन है।
और जब पहले ही वहां के रक्षामंत्री ने इसकी चेतावनी दे दी हो। तब इस मामले पर गौर करना जरूरी हो जाता है। अमेरिका तो इसी की तलाश में है।
दोनों के बीच युद्ध हो और उसे हस्तक्षेप का मौका मिले। जिसमें चीन और रूस पाक के साथ जाते दिखेंगे। और अमेरिका भारत को सहयोग के बहाने यहीं पैर तोड़कर बैठ जाएगा। अभी हमने हवाई अड्डा दिया है कल पूरा सैनिक अड्डा देना पड़ेगा। फिर दुनिया के इस दारोगा की मौजूदगी के साथ ही पूरे दक्षिण एशिया के सीरिया, इराक और लीबिया में तब्दील होने का रास्ता साफ हो जाएगा।
विकास का जो रास्ता बन रहा है वो भी एकाएक बाधित हो जाएगा।
और फिर देश के दसियों साल पीछे जाने का खतरा पैदा हो जाएगा। इस मामले में बगल के चीन से सबक लेने की जरूरत है। सालों साल वह पूरी दुनिया से कटा रहा। और जब ताकत बनकर उभरा तो हर कोई उसके सामने झुकने के लिए मजबूर है। सीधा युद्ध में जाना पशुवत है। बड़े और बुद्धिमान लोग तो कौशल का इस्तेमाल करते हैं। अपना एक सैनिक भी न मरे और शत्रु मात खा जाए। इस तरह की कूटनीति और रणनीति की जरूरत है।
हम जिन आतंकवादियों से परेशान हैं और जिन्हें पाकिस्तान पनाह दे रहा है। कुछ ऐसी चाल चलें कि वह खुद ही उन्हें मारने लगे। यानी पाकिस्तान ही हमारा हथियार बन जाए।


