रमन कटारिया व योगेश जैन
अनुवाद: रोमा
चिकित्सीय प्रणाली में खून का इस्तेमाल करीब एक सदी से अधिक समय से एक जीवनदायिनी औषधि के रूप में किया जा रहा है, लेकिन देश के ग्रामीण व विकास के दृष्टिकोण से पिछड़े इलाकों खासतौर पर वनक्षेत्रों में आज भी इस जीवनदायक औषधि की अनुपलब्धता एक बड़ा सवाल खड़ा करती है। क्योंकि देश की आज़ादी के 67 वर्ष पूरे हो जाने पर भी इन इलाकों में रक़्त कोष नहीं बन पाये हैं और रक़्त कोष के बाहर से उपलब्ध ख़ून किसी मरीज़ को चढ़ाये जाने पर प्रतिबन्ध लगा हुआ है। ऐसे में शहरी इलाकों के बाहर ग्रामीण इलाकों में जीवन दायक औषधि ख़ून की उपलब्धता में भारी कमी के सवाल पर अब वक़्त आ गया है कि सरकार की आंखे खुले जिससे कि रक़्तकोष के बाहर उपलब्ध रक़्त की आपूर्ति को भी कानूनी मान्यता मिल सके।
बीस वर्षीय पुतुल जोकि छत्तीसगढ़ जिला मुख्यालय से 70 कि0मी0 की दूरी पर रहती है, पिछले दो दिन से प्रसव पीड़ा से तड़प रही थी। यह उसका पहला गर्भधारण था, प्रसव पीड़ा को बढ़ाने के लिए गांव के ही नीम हक़ीमों द्वारा उसे कई इंजेक्शन दिए गए, ताकि उसका गर्भाशय सिकुड़ सके और बच्चा जल्दी पैदा हो सके। लेकिन प्रसव पीड़ा के 48 घंटे बाद भी जब डिलीवरी नहीं हुई, तो उसे रात 9 बजे एक धमार्थ अस्पताल में एक भाड़े की जीप द्वारा लाया गया। इस गंभीर हालत में पुतुल को उसके भाई और मां जंगल और पहाड़ के दुर्गम रास्तों से होते हुए करीब ढाई घंटे में इस अस्पताल तक पहुंचा पाये। जाहिर है कि यह युवा महिला गर्भाशय के फटने के कारण हुए रक्त स्राव से उसका शरीर में रक्तचाप कम हो गया व उसके शरीर में रक्त का प्रवाह काफी कम हो गया, और बिल्कुल पीली पड़ चुकी थी। अस्पताल में पहुंचते ही उसको पानी चढ़ाया गया व उसके रक्त के ग्रुप की रिपोर्ट आने का इंतज़ार किया जाने लगा। लेकिन दुर्भाग्यवश अस्पताल में उसके खून के ग्रुप का खून उपलब्ध नहीं था। डाक्टरों द्वारा उसके भाई को जिला मुख्यालय स्थित ब्लड बैंक से तीन यूनिट ख़ून लाने के लिये भेजा गया। शाम के समय जिला मुख्यालय तक की यह दूरी जो कि दिन में अमूमन एक घंटे की होती है वह तीन घंटे की हो जाती है। चूंकि साधन की कमी व सड़क की स्थिति दोनों ही खराब हैं। शहर में ब्लड बैंक के कर्मचारी एक यूनिट ख़ून के एवज में उसके भाई को ख़ून देने के लिये बाध्य करते हैं। भाई अपना खून देने के लिए तैयार भी होता है, लेकिन उस में खून की कमी के चलते वह रक्त दान के लिये अयोग्य साबित हो जाता है। उसे इस हालत में देख पास में ही एक अजनबी मददगार जो कि वास्तव में दलाल है, द्वारा यह सलाह दी जाती है कि वह बगल में ही प्राइवेट ब्लड बैंक में जा कर खून की एक यूनिट खरीद सकता है, जिसकी कीमत 2400रू है व जिसके लिए उसे बदले में खून देने की जरूरत भी नहीं होगी। वह खून की एक यूनिट को खरीद कर वापिस अस्पताल पहुंचता है, लेकिन तब तक काफी देर हो चुकी होती है। डाक्टरों द्वारा उसकी बहन को बचाने के लिए अंततः उसके गर्भाशय व मरे हुए बच्चे को आपरेशन द्वारा निकाल कर बाहर किया जा चुका था। इस आपरेशन से महिला गंभीर रूप से खून की कमी के कारण पीली पड़ गई थी व सद्मे की स्थिति में ही थी। मात्र एक यूनिट ख़ून उसकी जान बचाने के लिए काफी नहीं था और आखिरकार अगले दिन सुबह उसने दम तोड़ दिया। पुतुल की मौत से मां अपने आप को संभाल नहीं पा रही थी व भाई पत्थर बन कर मौन बैठा था। डाक्टर और नर्स भी क्षुब्ध थे व गुस्से में थे। सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों हुआ? ज़ाहिर है इसका कारण हमारे सामाजिक - आर्थिक, लैंगिक, जाति एवं वर्ग के भेदभाव में निहित है, जो कि सदियों से चला आ रहा है। लकिन पिछले दो दशकों से यह भेदभाव और भी गहरा गया है। यह विडम्बना ही है, कि इस आधुनिक हाईटेक चिकित्सा पद्धति के युग में क्रांतिकारी उपचार साधनों के होते हुए भी इस युवा महिला की मौत खून के सही समय पर उपलब्ध न होने की वजह से हो जाती है- ख़ून जो कि एक ऐसी ‘‘दवा’’ है, जो कि मानव जीवन को बचाने के लिए एक सदी से भी अधिक समय से इस्तेमाल की जा रही है।
कानूनों में हुए संशोधनों का असर
पुतुल के जीवन को बचाने के लिए वैसे अस्पताल में उस समय कई रक्त दाता थे, जिनमें अस्पताल के कुछ कर्मचारी भी खून देने के तैयार थे। जिसके लिए एक साधारण सी प्रक्रिया होती है, जैसे; पहले उनके खून को मरीज़ के खून के ग्रुप से मिलाया जाना, किसी संक्रमण के लिए खून की जांच करना, जैसा कि किसी भी ब्लड बैंक में ख़ून लेने से पहले जांच की जाती है - तत्पश्चात मरीज़ को बिना ब्लड बैंक के खून के ही यह खून जो तत्काल लिया गया है, चढ़ाया जाता है। इस पूरी प्रक्रिया को ‘‘अनबैंक डायरेक्टड ब्लड ट्रांसफयूज़न (यू0डी0बी0टी) कहा जाता है। यानि बिना ब्लड बैंक से रक्त लिए सीधे ही रक्तदाता से उपलब्ध हुए खून को चढ़ाया जाना। ग्रामीण क्षेत्रों में जहां पर देश की 69 प्रतिशत आबादी रहती है व जहां ब्लड बैंक हैं ही नहीं, वहां अतिगंभीर, आपातकालीन स्थिति, जटिल प्रसव, गंभीर सर्जरी व अन्य गंभीर प्रकार की बीमारियों में यूडीबीटी प्रक्रिया का इस्तेमाल किया जाता रहा है। इस तरह के रक्त स्थानांतरण की पद्धति सन् 1988 तक पूर्ण रूप से वैध थी। लेकिन एचआईवी के बढ़ते खतरों एवं कुछ व्यापारिक ब्लड बैंक द्वारा अवैध कार्यों में लिप्त होने की वजह से ‘‘ड्रग एवं कासमेटिक नियमावली 1985’’ में एक संशोधन किया गया, जिसमें रक्त को केवल लाईसेंस प्राप्त ब्लड बैंक द्वारा ही एकत्रित किए जाने के सख्त नियम बना दिए गए। जिनके चलते यूडीबीटी एक ही झटके में गैरकानूनी करार दे दिया गया। इसका असर ग्रामीण क्षेत्रों में बुरी तरह से पड़ा, जहां पर आपातकालीन स्थिति में रक्त की उपलब्धता असंभव हो गई।
ख़ून की ज़रूरत
हालांकि रक्त उपलब्धता की सही ज़रूरत का अनुमान लगाना तो काफी मुश्किल है, लेकिन सरकारी आंकड़ों में ‘‘भारतीय सांख्यिकी 2012’’ के मुताबिक देश में रक्त उपलब्धता की भारी कमी है, जो कि 31 फीसदी से भी ज्यादा है। यानि अभी 116 लाख यूनिट रक्त की आवश्कता है, जबकि देश में केवल 80 लाख यूनिट ही उपलब्ध है। यह सरकारी अनुमान भी वास्तविक ज़रूरत से काफी कम आंका गया है। छत्तीसगढ़ जैसे राज्य में तो यह कमी और भी भयावह है, जो कि 81 प्रतिशत तक है।
इस तरह से ब्लड बैंक को स्थापित करने के लिए कानून एवं ग्रामीण क्षेत्रों में क्या संभव है व सुरक्षित है, इसे लेकर एक बहुत बड़ा अंतर व अंतर्विरोध भी है। एक आदर्श ब्लड बैंक को स्थापित करने के लिए कम से कम आठ कमरों की ज़रूरत होती है। जिनमें से पांच के लिए वातानुकूलित माहौल अनिवार्य है। जिसका मतलब है कि चौबीस घंटे की बिजली आपूर्ति। इसके अलावा रक्त को रखने के लिए खास तौर पर निर्मित रैफरीजेरेटर और अन्य उच्च तकनीकी उपकरण, जिन्हें संचालित करने के लिए तकनीकी मेडिकल स्टाफ व अन्य कुशल लोगों की ज़रूरत होती है।
हालांकि यह सब शहरी इलाकों में तो संभव है, लेकिन ग्रामीण इलाकों एवं छोटे शहर व कस्बों में ढेर सारी समस्याएं हैं। एक विशाल मूल आधारभूत ढांचे की कमी के साथ-साथ कई समस्याएं, जैसे आपातकालीन स्थिति में रक्त की उपलब्धता न होना, ब्लड बैंक की ग्रामीण क्षेत्रों में स्थापना न होना, ब्लड बैंक से रक्त लेने में काफी समय लगना, एक यूनिट खरीदने के लिए मरीज़ को 600 से 1200 रू0 तक खर्च करना, यातायात के साधनों की दयानीय स्थिति, दूरी तथा रक्त को दूर दराज के ब्लड बैंक से लाने ले जाने के लिए भारी र्खच, ब्लड बैंक से रक्त को ले जाने के लिए खास तरह के कन्टेनर आदि शामिल हैं।
किस तरह की बाधाऐं
सन् 2001 में सरकार द्वारा यह महसूस किया गया कि मौजूदा नई नियामावली अपर्याप्त है। इसलिए सरकार द्वारा एक पक्षपाती समाधान पेश किया गया, जिसमें उन छोटे अस्पतालों के लिए खून जमा करने के सेंटर यानि ब्लड स्टोरेज सेंटर को स्थापित किए जाने के प्रावधान किए गए जहां पर आपातकालीन प्रसव सेवाएं प्रदान की जाती है। ऐसी परिस्थितयों में रक्त की ज़रूरतों को केवल वैध लाईसेंस धारी ब्लड बैंक द्वारा ही उपलब्ध कराए जाने का प्रावधान किया गया, जो कि रक्त को आपातकालीन स्थिति में जमा कर सकते हैं। लेकिन किसी रक्तदाता से सीधे खून प्राप्त करने की संभावना को ही समाप्त कर दिया गया।
इस नियमावली के लागू होने के बारह साल बाद राज्यों द्वारा कुछ मुट्ठी भर ही रक्त संग्रह केन्द्रों को स्वीकृति प्रदान की गई है, जो कि वांछित ज़रूरतों को अभी तक भी पूरा नहीं कर पाए हैं। मुख्य ब्लड बैंक यह कह कर अपना पल्ला झाड़ लेते हैं कि उनके अपने स्टाक में ही रक्त की कमी है व दूरदराज़ के रक्त संग्रह केन्द्रों को रक्त ज़ारी न करना पड़े, इसलिए यह बहाना बना दिया जाता है। इन ब्लड बैंकों की यही नीति है, कि किसी भी रक्त की आवश्यकता के लिए रक्तदान को अनिवार्य कर दिया गया।
नतीजतन ऐसी परिस्थितियों में पुतुल जैसे लोग ज़रूरत के समय रक्त से वंचित होकर बेवजह ही मर रहे हैं। यह स्थिति और भी भयावह हो सकती थी, अगर ग्रामीण क्षेत्रों में अच्छे डाक्टरों द्वारा सरकारी व गैरसरकारी अस्पतालों में यूडीबीटी पद्धति द्वारा गैरकानूनी ही सही लेकिन मानवीय व नैतिक जिम्मेदारी के आधार पर इस्तेमाल न किया होता, तो रक्त उपलब्धता के इन कड़े नियमों के आधार पर मौतों का आंकड़ा कई सौ गुणा हो जाता।
रक्त की खुले बाज़ार में उपलब्धता की संभावनाए सन् 2013 के मध्य तक आते आते गायब हो गईं। जब राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन ‘नाको’ द्वारा खुले बाज़ार में रक्त संग्रह करने की थैलियों को बेचने को अवैध ठहराया गया व अब किसी भी रक्त दाता द्वारा खून की उपलब्धता की संभावनाओं को पूरी तरह से समाप्त कर दिया गया। यानि अगर वहां पर वैध ब्लड बैंक है, तभी रक्त की उपलब्धता हो सकती है अन्यथा नहीं। इसी के चलते एक डाक्टर को यूडीबीटी के तहत अपने एक मरीज़ की जान बचाने के लिए गिरफ्तार किया गया व एक अन्य अस्पताल में रक्त की थैलियों को ज़ब्त कर लिया गया। वास्तविक स्थिति से परे व यथार्थ से दूर इन कड़े नियमों का असर साधारण मासूम लोगों पर पड़ा, जो कि अब रक्त के आभाव में मौत का शिकार हो रहे हैं व इन मौतों का सिलसिला आगे और भी बढ़ जाने के ख़तरे साफ तौर पर दिखाई दे रहे हैं।
समाधान
अब यह सवाल उठता है कि इन जटिल समस्याओं का समाधान क्या है? इस का केवल एक ही समाधान है कि यूडीबीटी पद्धति को आपातकालीन स्थिति में कानूनी रूप से मान्यता दी जाए। जिसके लिए आपातकालीन परिस्थितियों में लिये गये ऐसे रक्त की जांच ऐसी संस्थाओं द्वारा की जाये, जो कि अपने कुछ प्रशिक्षित स्टाफ द्वारा इसे प्रमाणित कर सकें। इस तरह का ढांचा इन ग्रामीण क्षेत्रों में तैयार करने की ज़रूरत है।
दूसरे, किसी भी आपातकालीन स्थिति में मरीज़ के रिश्तेदारों के लिए बैंक से रक्त लेने के लिए रक्त के बदले रक्त की शर्त को अनिवार्य नहीं किया जाना चाहिए। खासतौर पर जब मरीज़ जीवन और मौत के बीच जूझ रहा हो। जबकि नाको ( राष्ट्रीय ऐड नियंत्रण संस्थान ) द्वारा भी इस बात पर ज़ोर दिया गया है कि, ध्येय इस पर रहना चाहिए कि ऐसी स्थितियों में स्वैच्छिक व रक्त दान को बिना किसी पारिश्रमिक से जोड़े सुरक्षित रक्तदाताओं पर केन्द्रित किया जाना चाहिए व धीरे-धीरे खून के बदले में रक्त दान की नीति को समाप्त करना चाहिए।
देखा जाए तो अभी जितने भी लाईसेंसी ब्लड बैंक हैं, वे हर ग्रुप के रक्त की न्यूनतम ज़रूरत को एकत्रित करने एवं रक्त के इस स्टाक की पुनः पूर्ति करने की जिम्मेदारी नहीं लेते हैं या पूरा नहीं करते हैं। रक्त एकत्रित करने के लिए निर्धारित कैम्प आयोजित किए जाने चाहिएं व इन बैंकों में कम से कम एक निर्धारित रक्त यूनिट की मात्रा हर वक्त उपलब्ध रहनी चाहिए। रक्त के अच्छे स्टाक व नियमित रूप से कैम्पों के माध्यम से रक्त को संग्रह करने से ही रक्त की उपलब्धता सुनिश्चित हो पाएगी।
छोटे शहरों, कस्बों व ग्रामीण क्षेत्रों में नए ब्लड बैंक को स्थापित करने के लिए मूलभूत ढांचागत नियमों को मजबूती से लागू करने की जरूरत है। खासतौर पर सार्वजनिक क्षेत्रों में, हमें ऐसे कई रक्त संग्रह केन्द्रों की ज़रूरत है। देश के सभी सामुदायिक स्वास्थ केन्द्रों में तो इन संग्रह केन्द्रों का होना अनिवार्य होना ही चाहिये और इसके साथ-साथ दूर दराज़ के इलाकों में कार्यरत यूडीबीटी पद्धति के तहत रक्त संग्रह व रक्त को इस्तेमाल करने को भी कानूनी मान्यता दी जानी चाहिए व इसे संचालित करने के लिए कर्मचारियों को खास तौर का प्रशिक्षण दिया जाना चाहिए। रक्त जो कि एक जीवनदायनी औषधि है, को सख्ती से मूल्य नियंत्रण के दायरे में लाया जाना चाहिए, जिसे आपातकालीन स्थिति में मुफ्त उपलब्ध कराया जाना चाहिए।
जब तक हम इन सब जरूरी समाधानों की ओर अपने कदम नहीं बढ़ायेंगे, तब तक ऐसी कई पुतुल मरती रहेंगी। इन सभी सवालों को सरकार द्वारा जल्द ही अति गंभीरता से सम्बोधित करते हुए, इनके बारे में ठोस क़दम उठाने चाहियें।
(रमन कटारिया व योगेश जैन चिकित्सक हैं, जो कि छत्तीसगढ़ बिलासपुर में ‘‘जन स्वास्थ्य सहयोग’’ के साथ कार्य कर रहे हैं।)
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इस रिपोर्ट का संपादित अंश जनसत्ता में प्रकाशित हो चुका है।