चार साला स्नातक प्रोग्राम के विरोध में अभिभावकों का अनशन
यह अकारण नहीं है कि संसदीय निर्णय के बिना एक वाइसचांसलर ने उच्च शिक्षा की राष्ट्रीय नीति का खुला उल्लंघन किया है और देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री चुप बैठे हैं- डॉ. प्रेम सिंह
नई दिल्ली। दिल्ली यूनिवर्सिटी में इस अकादमिक सत्र से लागू किए गए चार साला स्नातक प्रोग्राम के विरोध में छात्रों के अभिभावक खुल कर सामने आ गए हैं। शुरुआत पूर्वी दिल्ली की सघन बस्ती सीलम पुर से हुई है। दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिला लेने वाले अपने बच्चों के भविष्य को लेकर चिंतित इलाके के कई अभिभावक आज पब्लिक सेकुलर वेलफेयर समिति के बैनर तले संयोजक मसूद खान की अगुआई में एक दिन के अनशन पर बैठे।

मसूद खान ने कहा कि एफवाईयूपी का चौतरफा विरोध हो रहा है। यह प्रोग्राम सामाजिक और आर्थिक रूप से पिछड़े छात्रों और सभी छात्राओं को उच्च शिक्षा से वंचित करने के लिए लागू किया गया है। उन्होंने जोर देकर कहा कि उच्च शिक्षा के क्षेत्र में पहले से ही बुरी तरह पिछड़े अल्पसंख्यक मुसलमानों के छात्र-छात्राओं का सबसे ज्यादा नुकसान होगा। उनके साथ अनशन पर बैठे राकेश कुमार दुबे, सैयद मोहम्मद अरशद, मुजफ्फर खान, अंसार मोहम्मद खान ने कहा कि वे गरीब व अल्पसंख्यक छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा से बेदखल करने वाले चार साला बीए प्रोग्राम विरोधी आंदोलन को दिल्ली की अन्य बस्तियों में लेकर जाएंगे।

अनशन में शामिल सोशलिस्ट युवजन सभा (एसवाईएस) के संयोजक राकेश कुमार दुबे ने आशंका जताई कि जिस तरह से देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री तमाम विरोध के बावजूद इस पूरे मामले में चुप्पी साधे हुए हैं, उससे लगता है शिक्षा की अमेरिकी लॉबी के साथ सरकार की सांठगांठ हो चुकी है। उन्होंने ऐलान किया कि एसवाईएस दाखिला प्रक्रिया शुरू होने के बाद भी एफवाईयूपी के खिलाफ अपना प्रतिरोध जारी रखेगी।

अनशन सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक चला। इस बीच इलाके के कई अभिभावकों सहित कई वक्ताओं जिनमें राजकुमार जैन (पूर्व विधायक व शिक्षक डीयू), हरीश खन्ना (उपाध्यक्ष, डूटा), अश्वनी कुमार (शिक्षक, डीयू), प्रेम सिंह (शिक्षक, डीयू) शामिल हैं, ने बड़ी संख्या में जुटे लोगों को संबोधित किया।

दिल्ली विश्वविद्यालय के शिक्षक डॉ. प्रेम सिंह ने अपने संबोधन में कहा कि एफवाईयूपी को लागू करके नवब्राह्मणवाद और नवसाम्राज्यवाद के गठजोड़ ने भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था पर तेज हमला बोला है। यह अकारण नहीं है कि संसदीय निर्णय के बिना एक वाइसचांसलर ने उच्च शिक्षा की राष्ट्रीय नीति का खुला उल्लंघन किया है और देश के राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री चुप बैठे हैं। सबको शिक्षा और रोजगार का समान अवसर देने की बात भारत के संविधान में कह गई है। डॉ. अंबेडकर ने सामाजिक-आर्थिक रूप से पिछड़े छात्र-छात्राओं के उत्थान के लिए सबसे पहले शिक्षा को महत्व दिया है। लेकिन दिल्ली विश्वविद्यालय में लागू किया गया चार साला स्नातक प्रोग्राम दलित-आदिवासी-पिछड़े वर्ग के छात्र-छात्राओं को उच्च शिक्षा से बाहर करने वाला है। गरीब मुसलमानों के बच्चे, खासकर लड़कियां, जो उच्च शिक्षा में सबसे जयादा पिछड़े हैं, उन्हें एफवाईयूपी का सबसे ज्यादा नुकसान होगा। अगर सरकार चैतरफा विरोध के बावजूद एफवाईयूपी को वापस नहीं ले रही है तो यह इसका प्रमाण है कि उसने शिक्षा के क्षेत्र में भी संविधान की विचारधारा की जगह नवब्राह्मणवाद और नवसाम्राज्यवाद के गठजोड़ पर आधारित नवउदारवादी विचारधारा को आगे बढ़ाने का निर्णय ले लिया है।

यह प्रोग्राम अत्यंत जल्दबाजी में बनाया गया है। इसकी पाठ्य सामग्री भी तैयार नहीं की गई है। न ही आधारभूत ढांचा विकसित किया गया है। ऐसा प्रोग्राम डूबने के लिए अभिशप्त है। दुख यही है कि इससे छात्रों की पढ़ाई और कैरियर का भारी नुकसान होगा जिसकी भरपाई असंभव है। वे एक ऐसे प्रोग्राम में दाखिला लेने के लिए मजबूर है जिसमें फीस सहित बाकी खर्चे तो उठाने होंगे लेकिन समुवित पढ़ाई नहीं मिलेगी। दिल्ली विश्वविद्यालय के सभी शिक्षकों को आगे आकर इस प्रतिरोध अभियान से जुड़ना चाहिए।

क्षेत्र के अभिभावकों सहित बड़ी संख्या में छात्र-छात्राओं, शिक्षकों व नागरिक समाज के नुमांइदों ने अनशन स्थल पर पहुंच कर अपना समर्थन जाहिर किया। डॉ. राजकुमार जैन ने अनशनकारियों को जूस पिला कर अनशन समाप्त कराया। धरने के अंत में उत्तराखंड में प्राकृतिक आपदा में मारे गए लोगों को दो मिनट का मौन रख कर श्रद्धांजलि दी गई।