आर.एल.फ्रांसिस
दिल्ली में रह रहे अरुणाचल प्रदेश के तमाम छात्र कई कारणों से राजधानी में अपने आपको सुरक्षित नहीं मानते। अपने शक्ल-सूरत और कद-काठी की वजह से उन्हें रोजाना नस्लभेदी टिप्पणियों का सामना करना पड़ता है। हालाँकि, उनका कहना है कि वह हिन्दुस्तानी हैं और यह उनका देश है। उन्हें हिन्दुस्तानी कहलाने में गर्व महसूस होता है। वहीं भारतीयता का प्रमाण अरुणाचल प्रदेश में साफ दिखाई देता है, जहाँ लोग एक दूसरे से मिलते वक्त नमस्ते की जगह आज भी बड़े गर्व और जोश से जय हिन्द कहते हैं।
बीते दिनों दिल्ली के लाजपत नगर में निदो तानिया की निर्मम हत्या ने न सिर्फ प्रदेश के निवासियों को बल्कि पूरे देश को झकझोर कर रख दिया है। दिल्ली में पूर्वोत्तर के एक छात्र निदो तानिया की हत्या कर दी गयी। उसका गुनाह सिर्फ इतना था कि जब बाल और चेहरे को लेकर उसका मजाक उड़ाया गया, उसके खिलाफ नस्ली टिप्पणी की गयी तो उसने इसका विरोध किया। यह टिप्पणी कुछ दुकानदारों ने की थी। जब दुकानदारों ने निदो और उसके मित्रों पर हमला किया तो पुलिस आयी थी, पर उसने दुकानदारों का ही पक्ष लिया। दुकान का काँच तोड़ने का आरोप लगा कर निदो से हर्जाना भी भरवाया गया। दुकानदारों ने दोबारा हमला किया और निदो की मौत हो गयी।
ऐसी घटनाओं का दूरगामी असर पड़ता है । पूर्वोत्तर का हिस्सा पहले से संवेदनशील रहा है अरुणाचल के बड़े हिस्से पर चीन सीधे दावा करता रहा है न सिर्फ अरुणाचल, बल्कि संपूर्ण पूर्वोत्तर भारत में गड़बड़ी फैलाने की साजिश लम्बे समय से चलती रही है। ऐसी घटनाओं से पूर्वोत्तर के लोगों को शेष भारत के खिलाफ भड़काने का मौका मिल सकत है। पूर्वोत्तर के छात्रों के साथ यह कोई पहली घटना नहीं है कि किसी छात्र के साथ ऐसा हुआ हो? इससे पहले भी दर्जनों बार पूर्वोत्तर की रहने वाली लड़कियाँ दुष्कर्म का शिकार बनती रही हैं। इस बार छात्र नीडो तानिया की मौत ने पूरी दिल्ली को हिलाकर रख दिया है।
इस बात को समझना होगा कि भारतीय संघ में कई ऐसे राज्य हैं जहाँ के निवासियों की वेश-भूषा, जीवन-शैली, संस्कृति, शारीरिक बनावट अलग-अलग है। पूर्वोत्तर, भारत का अभिन्न हिस्सा है और वहाँ के लोगों के भी वही अधिकार हैं जो भारत के अन्य नागरिकों के हैं। किसी के बाल, चेहरे को लेकर की गयी टिप्पणी ही गलत है। देश का कोई भी नागरिक किसी राज्य में जा सकता है, पढ़ सकता है, यह तो उसका हक है। सात बहनों के नाम से महशूर पूर्वोत्तर से हर साल दिल्ली में करीब 75 हजार युवक-युवतियाँ पढ़ाई के लिये आते हैं जो दिल्ली विश्वविद्यालय, अम्बेदकर विश्वविद्यालय, आई.पी. विश्वविद्यालय आदि जगह में दाखिला लेते हैं, पर चेहरे के अलगाव और रहन-सहन में विविधता होने के कारण इन छात्रों को आशियाने के लिये भारी मशक्त करनी पड़ती है। अगर कोई नस्ली टिप्पणी कर उसे उकसाता है, तो एक तरीके से वह देश को तोड़ने में लगी ताकतों की परोक्ष मदद करता है। यह बात सही है कि ऐसी टिप्पणी करने वालों की संख्या गिनी-चुनी है, लेकिन ऐसी ही टिप्पणी से माहौल खराब होता है। भेदभाव और नफरत की शुरुआत दिल्ली के कानून मंत्री सोमनाथ भारती ने की। देश का बड़ा तबका महसूस करता है कि पूर्वोत्तर के लोगों को कभी ऐसे न लगने दिया जाये कि उनके साथ दूसरा व्यवहार होता है। दिल्ली पुलिस अगर लापरवाही न बरतती होती तो अपने बालों के रंग पर मजाक का पात्र बने छात्र की मौत न होती। पुलिस के ध्यान न देने पर ही अरुणाचल प्रदेश के एक विधायक के बेटे की दो बार पिटाई हुयी और उसकी बाद में मौत हो गयी।
पूर्वोत्तर के मूल में आदिवासी संस्कृति है, समानता और न्याय का बोध है। वे अन्याय बरदाश्त नहीं कर पाते। इसलिए अगर कोई टिप्पणी करता है तो उसका विरोध करने में वे पीछे नहीं रहते। दिल्ली में भी ऐसा ही हुआ जिसमें निदो की जान गयी। ऐसी घटनाओं से पूर्वोत्तर में प्रतिक्रिया होने का डर भी बना रहता है। हम लोग अन्याय के खिलाफ खड़ा हो, ताकि पूर्वोत्तर के लोगों को लगे कि पूरा देश उनके साथ खड़ा है, वे अकेले नहीं हैं। चेहरे के अलगाव और जागरूकता के अभाव से उन्हें दिल्ली वाले विदेशी समझ बैठते हैं तो उनसे ज्यादा किराया वसूलने में भी पीछे नहीं हटते। पूर्वोत्तर को अन्य भारत को जोड़ऩे के लिये जागरूकता ही एकमात्र माध्यम है। यह ठीक है कि पूर्वी सीमान्त के लोग दिखने में हम लोगों से अलग होते हैं लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हम उनसे ऐसा बर्ताव करें, जैसा विदेशियों के साथ करते हैं। अच्छा तो यह हो कि हम उनके प्रति अतिरिक्त शिष्टता, आत्मीयता और विनम्रता प्रकट करें ताकि वे इस विशाल भारत के साथ एकरसता अनुभव करें।
आर एल फ्रांसिस, पुअर क्रिश्चियन लिबरेशन मूवमेंट के अध्यक्ष हैं।