मोहन श्रोत्रिय

कोई बुद्धि-से-एकदम-पैदल-व्यक्ति ही उस बयान पर यक़ीन कर सकता है जो माधुरी के पिता के नाम से भाजपा के केन्द्रीय कार्यालय से कल जारी हुआ है।

गुलेल तथा कोबरा पोस्ट द्वारा किये गये स्टिंग ऑपरेशन ( जिसमें अमित शाह को "साहेब" के निर्देश पर माधुरी का पीछा करवाते हुये दिखाया गया है) ने टीवी चैनल्स की "एक क़दम आगे, दो क़दम पीछे" की नीति के बावजूद जब पूरे देश में हंगामा मचवा दिया, तो भाजपा के केन्द्रीय कार्यालय ने वह बयान जारी किया।

चलिए, मान लेते हैं कि माधुरी के पिता "साहेब" के पूर्व-परिचित (मित्र अथवा सम्बंधी नहीं) थे, और उनके आग्रह पर ही माधुरी को कोई असुविधा न हो, यह सुनिश्चित किया जा रहा था ! एक राज्य की पुलिस मशीनरी किसी एक व्यक्ति का "ऐसे" ध्यान रखती है क्या? पल-पल की ख़बर लेने और एक ही पुलिस अधिकारी को निर्देश देने का काम अमित शाह कर रहे थे। माधुरी के बारे में ही नहीं, एक आइएएस अधिकारी के एक-एक क़दम की जानकारी भी माँगी जा रही थी। उस ज़िले के पुलिस कप्तान को भी वही पुलिस अधिकारी फ़ोन कर रहे थे, जहाँ उक्त अधकारी म्युनिसिपल कमिश्नर के रूप में तैनात थे।

यही नहीं, "साहेब" को माधुरी के बारे में किन्हीं अन्य स्रोतों/सूत्रों से भी जानकारियाँ प्राप्त हो ही रही थीं, जिन्हें "साहेब-के-पास-बैठे-अमित-शाह" थोड़ी-थोड़ी देर में पुलिस अधिकारी को दे रहे थे, तथा आगे के लिये निर्देश दे रहे थे।

और फिर वह "लड़का" कौन था जो माधुरी के साथ था और उसे घुमा रहा था- कभी रेस्तरां, शॉपिंग मॉल और कभी अन्यत्र। उनके एक-एक मिनट के मूवमेंट का लेखा-जोखा रखवाना क्या दर्शाता है? क्या सिर्फ़ यही कि "साहेब" अपने परिचितों का इतना ध्यान रखते हैं कि उनके कहने पर पूरे तन्त्र को ड्यूटी बजाने के लिये तैनात कर सकते हैं?

... और यह भी कि क्या "साहेब" माधुरी से पहले कभी नहीं मिल चुके थे?

यह संगीन मसला है। इस पर ज़िम्मेदारी-भरा रुख अपनाने की ज़रूरत है, भाजपा को, जो निस्संदेह एक देशभक्त पार्टी(!) है, क्योंकि यह शासन करने के तरीकों से जुड़ा मामला भी है। सर्वोच्च न्यायालय को भी इसका संज्ञान लेना चाहिए, तथा सी बी आई (जिसके पास ये सारी जानकारियाँ पहले से हैं) को निर्देश देना चाहिए कि इस मामले में तुरन्त कार्रवाई हो। सरकार तो कुछ करेगी नहीं क्योंकि उसे डर होना स्वाभाविक है कि इससे राजनीतिक उथल-पुथल मच सकती है।