राजेश जोशी, लाल्टू व युवा रचनाकारों का कविता पाठ व परिचर्चा
भोपाल। जज़्बा ग्रुप, विकल्प सांस्कृतिक मंच और शहीद शंकर गुहा नियोगी पुस्तकालय व सांस्कृतिक केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में 20 सितंबर 2015 (इतवार) को हिन्दी भवन, भोपाल में हिन्दी के वरिष्ठ कवियों राजेश जोशी और लाल्टू व युवा रचनाकारों का कविता पाठ व परिचर्चा का आयोजन किया गया।
कार्यक्रम की शुरुआत की हिन्दी में अपनी एक विशिष्ट पहचान व आवाज के कवि लाल्टू ने। “सभी भाषाओं से प्यार करता हूं / अपनी भाषा से प्यार करता हूं” और “जिसे नहीं दिखता आदमी / उसे पेड़ और बादल क्या दिखेंगे” की लाइनों में लाल्टू ने वर्तमान परिदृश्य पर अपनी टिप्पणी की। एक ऐसे समय में जबकि हिन्दी को भाषा से साम्राज्य में बदलने की कोशिश हो रही है, लाल्टू ने युवा रचनाकारों को एक मानवीय दृष्टिकोण से अपने आसपास की दुनिया को समझने की अपील की।
समकालीन हिन्दी कविता के मिजाज़ को विकसित करने में जिन कवियों का नाम रहा है उनमें राजेश जोशी अग्रणी है। “पानी को ‘वाटर’ कहने से डूबने लगती है जिनकी संस्कृति की नब्ज़ / उन्हे गंगा के साबुन में बदल जाने से कोई एतराज़ नहीं”, “और सबसे खतरनाक है उनका राष्ट्रवाद ” और 1987 के दंगो पर लिखी “मेरठ से कब बाहर निकलेगी यह रेलगाड़ी” का पाठ करते हुए राजेश जोशी ने युवा रचनाकारों से कहा कि कविता लिखने के लिए अपने समय-समाज-इतिहास की गहरी समझ विकसित करनी जरूरी है।
परिचर्चा में इस बात पर ज़ोर दिया गया कि जो भी युवा कविता लेखन को गंभीरता से लेते हैं उनके लिए यह जरूरी है कि कविता के इतिहास और वर्तमान की गहरी समझ पैदा करें और अपने भावुक आवेगों से उबर कर अपनी अभिव्यक्ति को तराशने की कोशिश करें। खासतौर से वे मानसिक आवेग जो समाज में लगातार निर्मित किए जाते हैं उनसे न सिर्फ बच कर बल्कि उनकी गहरी पड़ताल कर ही कविता संभव है यह बात परिचर्चा में उभर कर आई।
इस अवसर पर जज़्बा के सदस्यों ने नाटक का भी प्रदर्शन किया। आयोजकों ने बताया कि इस शृंखला में आगे भी लगातार कार्यक्रम प्रस्तुत किए जाएंगे।