कठिन चुनौतियों भरा समय
कठिन चुनौतियों भरा समय
विष्णु प्रभाकर उपाध्याय
मुजफ्फरनगर के साम्प्रदायिक दंगे ने एक फिर से समाजवादी पार्टी के तथाकथित समाजवादी और धर्मनिरपेक्ष होने पर सवालिया निशान लगा दिया है। एक तरफ तो समाजवादी पार्टी मुसलमानों की हिमायती होने का दावा भी करती रही और दूसरी तरफ संघ से आतंरिक गठबंधन कर ऐसी घटनाओं को अंजाम भी दे रही है। समाजवादी पार्टी जो मुस्लिम वोट बैंक पर आधारित होकर सत्ता में आती रही और आने वाले चुनावों में भी समर्थन की उम्मीद करती है फिर भी उसके शासन में इतनी सारी घटनायें होने ही क्यों दी गयीं।
उस समय जब सपा ने चुनाव लड़ा था तो प्रदेश में बसपा और केंद्र में कांग्रेस की सरकार उस वक़्त देश के विभिन्न जगहों पर निर्दोष लोग और नौजवान पकड़े गये और उन्हें आतंकवादी देशद्रोही बताया गया और उन पर फर्जी केस चलाया गया, जिनमें अधिकतर मुस्लिम ही हैं। उत्तर प्रदेश की जनता ने बसपा सरकार से त्रस्त होकर खासकर मुसलमानों ने समाजवादी पार्टी का दामन पकड़ा केवल इस वजह से कि समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव चुनाव से पहले चिल्ला-चिल्ला कर यह कहने में नहीं थकते थे कि हम निमेष रिपोर्ट को सार्वजनिक कर देंगे और निर्दोष नौजवानों और मुसलमानों पर लगाये गये फर्जी केसों का पुनरावलोकन करके उन्हें छुडवा देंगे। लोगों को यह उम्मीद थी कि सपा सरकार के सत्ता में आने के बाद उनके खिलाफ फर्जी केसों और आरोपों को वापस ले लिया जायेगा। समाजवादी पार्टी जिसने विधानसभा चुनाव में बहुमत हासिल किया वह लोकसभा 2014 के चुनाव में मुसलमानों के वोट को लेकर आश्वस्त है और अपने साथ नए वोटरों को जोड़ने की कोशिश में उसने हिन्दुत्वादी साम्प्रदायिक ताकतों को ढील दिया जिससे मुसलमानों के दिलो दिमाग में ये बात घर कर जाये कि उन्हें हिन्दुओ से खतरा है और वे अनुशासित ढँग से समाजवादी पार्टी को वोट देंगे और हिन्दुओ का वोट बैंक भी तैयार हो जायेगा।
यहाँ हम तीन बिन्दुओं पर गौर करेंगे जिसमें पहला है शासक द्वारा जनविरोधी नीतियों पर अमल करना जिसको लागू करने के लिए साम्प्रदायिक ताकतों का सहारा लेती हैं जिससे लोगों का ध्यान जनविरोधी नीतियों से भटकाया जाता है जिसमें पुलिस भी निर्दोष लोगों को गिरफ्तार करके मनमाने ढंग से केस बनाती है और निरँकुश होकर मारती पीटती भी है। इसका खामियाजा हमेशा निर्दोष और गरीबों को ही भुगतना पड़ता है जो निरँकुश पुलिस के शिकार होते हैं। दूसरा बिंदु राजनैतिक बँटवारे का है। दंगे में जो लोग साम्प्रदायिक तत्वों के शिकार होते हैं उनकी मरहम पट्टी सहायता और आश्वासन देकर बाँध देना आसन होता है और इस तरह उन्हें मजबूर होकर जनविरोधी नीतियों और साम्प्रदायिक ताकतों के सामने घुटने टेकने पड़ते हैं और इसका सीधा लाभ उन राजनीतिक पार्टियों को मिलता है जो जातिवाद और धर्म के नाम पर अपने वर्चस्व को कायम करना चाहती हैं। वो भी सिर्फ सत्ता में बने रहने के लिये। तीसरा बिंदु यह है यदि हम इतिहास पर नज़र डालें तो देखेंगे कि 1857 की स्वाधीनता संघर्ष में जब लोगो ने बहादुर शाह ज़फर को अपना नेता चुना तो अँग्रेजो को ये बात हज़म नहीं हूयी। हिन्दू मुस्लिम एकता को देखकर वे समझ गये थे कि इनकी एकता को तोड़ पाना मुश्किल है। इस एकता को तेड़ने के लिए उन्होंने मिथ्या इतिहास का सहारा लिया और दो अंग्रेजी इतिहासकारों इलियट और डाउसन के माध्यम से इतिहास लिखवाया जिसमें हिन्दू और मुसलमानों के बीच भेद भाव को दिखाया है जिसमें वो सफल भी हुये। वही इतिहास आज हम पढ़ रहे हैं जो आज हिन्दू और मुसलमानों के बीच खाई की तरह है। आज़ादी के समय भी देश के हुक्मरानों ने आज़ादी से जनता का ध्यान भड़काकर अंग्रेजी कम्पनियों को देश में बनाये रक्खा और आज आजादी के बाद धर्म और जाति के नाम पर राजनीति करने वाली पार्टियाँ वही इतिहास को आधार बनाती हैं और फूट डालो और राज करो की नीति पर चल रही हैं।
इस दौर में जब लगातार देश में जल जंगल ज़मीन खदानों खेतों, शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं, उर्जा उद्योगों और अब फुटकर व्यापार में भी विदेशी निवेश को आमंत्रित किया जा रहा है और आदिवासी किसान मजदूर उजड़ते जा रहे हैं। शिक्षा स्वस्थ्य सेवाओ की सुविधा घटाई जा रही है, मनमाने ढंग से महंगाई बढ़ रही है और भ्रष्टाचार ने तो बेशर्मी की सारी हदें तोड़ दी हैं लेकिन सरकार इस पर जबाबदेही नहीं समझती।


