कनहर सिंचाई परियोजना के विस्थापितों के आंदोलन पर रिपोर्ट
कनहर सिंचाई परियोजना के विस्थापितों के आंदोलन पर रिपोर्ट
2013 के कानून के तहत अधिग्रहण, न्यायोचित पुर्नवास के लिए
कनहर सिंचाई परियोजना के विस्थापितों के आंदोलन पर रिपोर्ट
सोनभद्र। नए सिरे से अधिग्रहण, न्यायोचित पुर्नवास एवं जीविकोपार्जन की गारण्टी पाने की उम्मीद में विगत 23 दिसम्बर से सोनभद्र जनपद में निर्माणाधीन कनहर डैम के पास पागन नदी पर धरनारत विस्थापितों पर कल पुलिस व प्रशासन ने जर्बदस्त दमन किया है। विस्थापितों पर रबर की गोली और आंसू गैस चलाए गए, भीषण लाठीचार्ज किया गया। इसमें दर्जनों लोग घायल हुए है और अस्पतालों में भर्ती हैं। इसके पहले भी 14 अप्रैल को सुबह पुलिस द्वारा आंदोलनरत लोगों और महिलाओं पर लाठी चार्ज किया गया, जिसका प्रतिवाद करने पर अकलू बैगा को दुद्धी कोतवाल द्वारा गोली मारी गई थी जिनका इलाज वाराणसी के सर सुदंर लाल अस्पताल में चल रहा है। इस हमले में महिलाओं समेत कई अन्य लोग भी घायल हुए थे।
प्रशासन व विस्थापितों के बीच विवाद की मूल वजह क्या है। दरअसल उ0प्र0 के सोनभद्र जनपद के अमवार में कनहर व पांगन नदी पर निर्मित हो रहे कनहर बांध का शिलान्यास 1976 में उ0प्र0 के तत्कालीन मुख्यमंत्री नारायण दत्त तिवारी ने किया था। शिलान्यास के वक्त जारी दस्तावेज में कहा गया कि इस सूखाग्रस्त क्षेत्र के विकास के लिए परियोजना का निर्माण किया जा रहा है और यह बांध मूलतः सिंचाई परियोजना के लिए बनाया जाना है। शिलान्यास के वक्त सरकार ने जनता से वायदा किया कि जमीन के बदले जमीन व रोजगार दिये जायेगे और पूरे क्षेत्र में हरियाली आ जायेगी जिसका क्षेत्रीय जनता ने स्वागत किया। परन्तु सरकार ने वायदा खिलाफी करते हुए विस्थापित हो रहे आदिवासियों व अन्य वन परम्परागत निवासियों को सिर्फ 1894 के भूमि अधिग्रहण अधिनियम के तहत प्रतिकर देना शुरू किया। यहीं नहीं 1980 तक जो अधिग्रहण जमीनों का किया गया था, उसमें भी बहुत सारे आदिवासी परिवारों को मुआवजा भी नही प्रदान किया गया क्योकि सर्वे में भारी अनियमिता के चलते उनके जमीन को डूब क्षेत्र में नही माना गया। विस्थापित हो रहे इन परिवारों को न तो कहीं अन्यत्र बसाया गया और न ही उनके जीविकोपार्जन के लिए रोजगार/जमीन दी गयी। पूर्व में शासन द्वारा कनहर डैम का निर्माण कार्य स्थगित कर देने से डूब क्षेत्र के आदिवासी व अन्य समुदाय अपने मूल स्थान पर बसे रहने दिया गया। जिससे आज ये विस्थापित जीविकोपार्जन के लिए अपनी पुश्तैनी जमीनों व जंगल पर निर्भर हैं। 1995 में पंचायत राज अधिनियम के तहत पंचायतें गठित की गयीं और मनरेगा सहित अन्य सरकारी योजनाओं के तहत विकास कार्य कराये गये, वनाधिकार कानून बन जाने पर ग्रामीणों द्वारा जंगल की जमीन पर दावे भी जमा कराये गये।
कनहर बांध एक बहुउद्देश्यीय परियोजना है जिसे तीन चरणों में पूरा किया जाना प्रस्तावित है। प्रथम व द्वितीय चरण में डैम का निर्माण व मुख्य-सहायक नहरों का निर्माण करना और तृतीय चरण में डैम की ऊचांई को बढ़ा कर 39.9 मी0 से 52.90 मी0 करके कनहर डैम से रिहंद जलाशय को पानी भेजना है। प्रशासन द्वारा यह बताया जा रहा है कि फिलहाल अभी प्रथम व द्वितीय चरण में डैम को 39.90 मी0 ऊचांई रहेगी। इस बांध के निर्माण के लिए विभाग द्वारा सीमांकन कराना, जिसके तहत जलाशय की सीमा पर स्टोन पिलर लगाना आवश्यक है, अभी तक नही लगाये गए है जिससे विस्थापितों में भय व आतंक हैै। शिलान्यास के वक्त जो दस्तावेज सरकार द्वारा जारी किया गया उसमें डूब क्षेत्र को 2181 हेक्टेयर दर्शाया गया है जबकि 1984 किये गये सर्वे में 2925 हेक्टेयर दर्शाया गया है। इसी तरह अब पुनः कनहर विभाग द्वारा जो दस्तावेज जारी किया गया है उसमें 4331.50 हेक्टेयर को डूब क्षेत्र माना गया है।
महत्वपूर्ण बात ध्यान देने लायक यह है कि विभाग द्वारा जो मानचित्र जारी किया गया है उसका सम्पूर्ण क्षेत्रफल लगभग 125 वर्ग किमी (12500 हेक्टेयर) है इसकी मुख्य वजह जल मग्न व डूब क्षेत्र में फर्क किया जाना व सर्वे में अनियमितता है। जैसे किसी की जमीन का टुकड़ा जलाशय की निर्धारित ऊचाॅई से ज्यादा है तब उसे जलमग्न नही माना गया है और उसे मुआवजा अथवा अन्य लाभ पाने से वंचित कर दिया गया है हालांकि वह जमीन डूब क्षेत्र में आयेगी क्योकि उसके आवागमन का कोई रास्ता सिवाय जलाशय के पानी के नही बचेगा। उदाहरण के लिए डैम से मात्र 2 किमी की दूरी व कनहर एवं पागन नदी के बीच में स्थित सुन्दरी गांव में कई इलाके जलमग्न नही है और सर्वे में उन्हें छोड़ दिया गया है जबकि उस जमीन के चारों तरफ पानी होगा।
1984 के सर्वे के अनुसार डैम का अधिकतम जल स्तर 267.92 मी0, कुल जल संचय क्षमता 0.262 मिलियन एकड़ फुट, डैम की लम्बाई 3.24 किमी, अधिकतम 39.90 मी0 अधिकतम डिस्चार्ज 9.80 लाख क्यूसेक, मुख्य नहर 141.45 किमी, अन्य नहर 150.00 किमी, वार्षिक सिंचाई 81828 एकड़ व अतिरिक्त उत्पादन 6555 मी0 टन था। इस परियोजना का पूर्ण होने का लक्ष्य वित्तीय वर्ष 1992-93 था। 26 फरवरी 1979 को राज्यपाल द्वारा भूमि अर्जन अधिनियम 1984 की धारा 4 की उपधारा (1) व धारा 17 की उपधारा (4) के अधीन करते हुए सार्वजनिक उपयोग में अति आवश्यक बताया गया था। लेकिन 1984 से 2011 तक कनहर डैम में कोई भी कार्य नही किया गया। आज तक शासन द्वारा डैम के लेटलतीफी की वजह नही बतायी गयी है। हर बार यह बताया गया कि कतिपय कारणों से देरी हुई। अब अखिलेश सरकार द्वारा 22 अरब 39 करोड़ बजट आवंटित करने के पश्चात काम शुरू किया गया है।
विस्थापित हो रहे हजारों परिवार कार्य शुरू होने के बाद से ही पुनर्वास व न्यूनतम जीवन निर्वाह योग्य जीविकोपार्जन का इंतजाम करने की मांग को लेकर आंदोलित है। प्रशासन ने विस्थापितों को आश्वासन दिया कि उन्हें भूमि अधिग्रहण अधिनियम 2013 के तहत मुआवजा व अन्य लाभ प्रदान कर ही विस्थापित किया जायेगा। लेकिन सरकार ने इसे मानने से इंकार कर दिया। सिंचाई विभाग द्वारा की गयी गलत बयानी कि डूब क्षेत्र में सरकार द्वारा जमीन अधिग्रहीत कर वास्तविक कब्जा प्राप्त किया जा चुका है, को आधार बनाकर उ0 प्र0 शासन द्वारा शासनादेश संख्या 2265/14-17-सि.-4-112(डब्लू)/14, दिनांक 30 अक्टूबर 2014 के अनुसार जिलाधिकारी सोनभद्र द्वारा प्रस्तावित पुर्नवास एवं पुनर्व्यवस्थापन के संबंध में ’भू-अर्जन, पुर्नवास एवं पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार, 2013’ के अनुरूप तैयार कर चालू वित्तीय वर्ष 2014-15 के अनुसार 7 लाख 11 हजार रू0 का पैकेज व 150 वर्ग मी प्लाट देने की घोषणा की गयी (बाद में आंदोलन के दबाव में इंदिरा आवास के स्थान पर लोहिया आवास को शामिल करने की घोषणा जिला प्रशासन ने की है)। इस पैकेज में विस्थापितों की जमीन का कोई मुआवजा नहीं है और न ही रोजगार की तथा रोजगार न देने की स्थिति में भत्ते को देने कोई व्यवस्था है।
यहीं नहीं उक्त विस्थापित पैकेज का लाभ मूल विस्थापित (प्रथम पीढ़ी) के 1044 परिवारों की तीन पीढ़ी के हर वयस्क व शादीशुदा परिवार जिसका अलग चूल्हा हो को ही देने की बात कही गयी है, इस प्रकार प्रशासन ने 1810 परिवारों की सूंची जारी कर दी है। मौजूदा स्थिति में इस सूची की कोई वैधता नहीं है क्योकि सर्वें व सीमांकन में ही भारी अतंर आता रहा है और 1980 के बाद डूब क्षेत्र में आ कर बसे अथवा भूमिहीन-आवासविहीन या फिर अन्य किसी कारण से मूल सूंची में नाम दर्ज नहीं होने वाले परिवारों को इस पैकेज का लाभ नहीं प्रदान करना अन्याय है। इस पैकेज में उन भूमिहीन परिवारों को जो अधिग्रहण के वक्त जंगल की जमीन व वन संपदा-नदी पर निर्भर थे, उन्हें भी किसी तरह के विस्थापन पैकेज देने से प्रशासन ने इंकार कर दिया। इनमें भी 1044 विस्थापितों की मूल सूंची में लगभग 300 लोगों को लापता दिखा कर उनके परिवार जो डूब क्षेत्र में ही बसे हैं, उन्हें पैकेज से वंचित कर दिया गया है। अन्य जो नाम हैं उसमें भारी पैमाने पर द्वितीय व तृतीय पीढ़ी के नाम छोड़ दिये गये है। उदाहरण के लिए विस्थापित गांव सुगवामन को ले सकते हैं। इस गांव में प्रथम पीढ़ी के 111 नाम हैं जिसमें 82 जीवित व 29 मृतक हैं व 51 लापता दर्ज किया गया है। द्वितीय पीढ़ी में 41 लाभांवित परिवार हैं जबकि तीसरी पीढ़ी में कोई भी लाभांवित परिवार नहीं है। इस तरह बहुत बड़े पैमाने पर वर्तमान में डूब क्षेत्र में बसे लोगों के नामों को छोड़ दिया गया है। आंदोलनरत विस्थापितों का दावा है कि उनके सर्वें के मुताबिक 10 हजार से ज्यादा परिवार इस क्षेत्र (उ0प्र0 के सोनभद्र की 5 ग्राम पंचायतों के 11 गांव) में हैं। जबकि प्रशासन द्वारा लाभांवित परिवारों की सूची में सिर्फ 1810 नाम हैं।
इसी वजह से विस्थापितों में गहरा आक्रोश है और इसकी पृष्ठभूमि पूर्व में रिहंद जलाशय से लेकर अन्य विस्थापन के समय सरकारों द्वारा किये गये लिखित समझौतों का भी अनुपालन न किया जाना है। इसी आक्रोश व अविश्वास के माहौल में विस्थापित व प्रशासन में टकराव पैदा हुआ है। आंदोलन के साथ रहते हुए आल इण्डिया पीपुल्स फ्रंट (आइपीएफ) ने एक जनवरी को उ0 प्र0 के राज्यपाल और 14 अप्रैल को मुख्यमंत्री को पत्र देकर यह मांग की है कि कनहर बांध परियोजना में डूब रहे क्षेत्र का भूमि अधिग्रहण कानून 2013 के तहत पुनः अधिग्रहण के लिए अध्यादेश जारी किया जाए, पूरे विस्थापित क्षेत्र का पुनः सर्वे व सीमांकन हो और मौजूदा स्थिति के अनुसार परिवारों को मुआवजे व सम्मानजनक पुर्नवास की व्यवस्था की जाए तथा विस्थापितों के दमन पर तत्काल रोक लगाई जाये और वार्ता के जरिये विस्थापितों की समस्याओं का निदान किया जाए। यदि प्रशासन ने समय रहते विस्थापितों के सवालों को हल किया होता तो आज पैदा हुई अप्रिय स्थिति से बचा जा सकता था। अभी भी सरकार यदि इस बांध को बनाने के लिए ईमानदार है तो उसे दमन के रास्ते की जगह विस्थापितों से वार्ता कर उनकी जायज मांगों को पूरा करना चाहिए।
राजेश सचान


