मोहम्मद ज़फ़र
कन्हैया कुमार जो कि आज एक ब्रांड बन चुके हैं और शायद कहना कम नहीं होगा कि छात्र राजनीति के शाहरुख़ खान के समान हो गए हैं, जिन्हें ना सिर्फ बड़ी ख्याति प्राप्त हो चुकी है बल्कि अलग-अलग जगह उन्हें भाषण और बातचीत के लिए बुलाया जाना और तेज़ हो गया है। उन्होंने मोदी जी के सत्यमेव जयते का उदाहरण ठीक ही दिया था। अंत में आखिरकार सरकार और प्रशासन पर पासा उल्टा ही पड़ गया और जे. एन. यू. के छात्र उमर ख़ालिद और कन्हैया ना सिर्फ अधिक मशहूर हुए बल्कि सरकार और प्रशासन की ही किरकिरी सरकार के नेताओं के करीबी वकील और उसकी टोली व विधायक साब के लात घूंसों ने करा दी और रही सही कसर कई नेताओं के जे. एन. यू. और हैदराबाद यूनिवर्सिटी प्रकरणों को लेकर ऊल-जलूल बयानों ने पूरी कर दी।
तो ये तो हो गया कि कन्हैया का सत्यमेव जयते सामने आ गया। उस घटना में हम सभी ने विधायक ओ. पी. शर्मा और अलोकतांत्रिक वकीलों के गुट की उनके गैरकानूनी कर्मों के लिए बढ़-चढ़ कर खिंचाई की थी और मीडिया ने भी उसमें बढ़-चढ़ कर योगदान दिया था। ऐसा शायद इसलिए भी कि इस बार मीडिया भी पिटने में निशाने पर आ गया था। खिंचाई और विरोध करना एकदम जायज़ भी था, क्योंकि जब हमारे देश में कोर्ट है, कानून है, न्यायपालिका क्रियाशील है तो फिर सरे आम सज़ा देने, पीटने और बिना जांच के सज़ा सुनाने को सहन नहीं करना चाहिए।
अब बात ये आती है कि कन्हैया को पीटना हो, अमीक नाम के सी. पी. आई. कार्यकर्ता को विधायक साब द्वारा लतियाना हो या पटना में कन्हैया को काले झंडे दिखाने वालों को कन्हैया समर्थकों द्वारा पीटना हो, यह सब एक ही बात के उदाहरण हैं कि जहाँ जिसकी पॉवर और वर्चस्व होगा वही अलोकतान्त्रिकता को बढ़ावा देने में पीछे नहीं रहेगा।
अगर कन्हैया के समर्थक प्रगतिशील सोच वाले समूहों से खुद को मानते हैं तो उन्हें विरोधियों को बिना मारे, कपड़े फाड़े पुलिस को देना था ना कि सड़क पर सज़ा देने वाला रवय्या अपनाना था। तो फिर काहे की प्रगतिशीलता? क्या फर्क रहा उन वकीलों, विधायक और पटना के पीटने वाले लोगों में? वहाँ उनका वर्चस्व था तो वे विरोध के स्वर के प्रति असहनशील थे, यहाँ इनका जो खुद को प्रगतिशील कहते हैं, उनका वर्चस्व था तो इन्होंने विरोध के प्रति असहनशीलता का परिचय दिया। जबकि लोकतंत्र में विरोध के प्रति सहनशील होना एक ज़रूरत है।
क्या होता? अगर मोदी जी को कन्हैया समर्थक काले झंडे दिखाएँ और पुलिस उन्हें पीट दे। तब में और इसमें क्या कोई फर्क होगा? शायद नहीं।
हाँ बड़ी और छोटी चोटों का फर्क हो सकता है पर मानसकिता का नहीं। वहाँ भी अलग स्वर को बर्दाश्त ना करना छिपा है यहाँ भी। ये तो तय है कि कन्हैया पीटने पाटने की राजनीति के समर्थक नहीं हैं तो खुद को उनके समर्थक बोलने वालों या खुद को प्रगतिशील मानने वालों को भी अपने आप को प्रतिक्रियावादी होने से बचाना होगा। जैसा पाउलो फ्रेरा की विचारधारा से मिलती जुलती बात है कि दक्षिणपन्थ का तो प्रतिक्रियावादी तरीका स्वाभाविक ही है मगर अगर वामपंथ की सोच वाले भी प्रतिक्रियावादी या संकीर्णतावादी जवाब देंगे तो फिर सोचने की बात है।
कन्हैया ने अपने भाषण में कहा था कि सेल्फ क्रिटिसिज्म यानि आत्म-आलोचन बेहद ज़रूरी है तो उनके समर्थकों को एक-दो-बार उनके वीडियो और देखने चाहिए और साथ ही ऐसे ही विषय की उलझन को दर्शाती ओम पुरी की फ़िल्म आघात ज़रूर देखनी चाहिए। अगर हम अलोकतान्त्रिकता का विरोध करते हैं तो हमें सब तरह की अलोकतान्त्रिकता का विरोध करना चाहिए।