वेश्यावृत्ति और बलात्कार स्त्री जाति के प्रति आदिमकाल से किया जाने वाला जघन्यतम अपराध है। स्त्री के प्रति किए गए इस अपराध की भरपाई किसी भी तरह से संभव नहीं है। केंद्र और देश की राज्य सरकारें इसकी रोकथाम की हरसंभव कोशिश करती हैं, लेकिन विडंबना यह है कि यह अपराध दिनोंदिन बढ़ता ही जा रहा है। देश के हर हिस्से में बलात्कार के मामले बढ़े हैं।
बलात्कार जैसे मामलों की रोकथाम राज्य द्वारा संचालित संस्थाएं इसलिए नहीं कर सकती हैं क्योंकि यह क्षणिक आवेश में किया जाने वाला अपराध है। यह संगठित अपराध की श्रेणी में नहीं आता है। ऐसे अपराध होने से पूर्व तनिक भी आभास नहीं होता है कि ऐसा अपराध होने वाला है। इसकी रोकथाम के उपाय सामाजिक जीवन में छिपे हुए हैं, समाज को ही आगे आकर ऐसे अपराध पर रोक लगाने की पहल करनी होगी। लेकिन वेश्यावृत्ति और लड़कियों की तस्करी संगठित अपराध की श्रेणी में जरूर आता है। इसकी रोकथाम जरूर राज्य नियंत्रित संस्थाओं के हाथ में हैं। यदि वे ऐसे अपराध पर अंकुश लगा पाने में नाकाम हैं, तो यह उनकी नाकामी है।
इस मामले में खौफनाक पहलू यह है कि हथियारों और ड्रग्स की तस्करी के बाद वेश्यावृत्ति के लिए छोटी बच्चियों की तस्करी देश का तीसरा सबसे बड़ा अपराध है। यदि इंडियास्पेंड संस्था की रिपोर्ट पर विश्वास करें, तो पिछले एक दशक में छोटी बच्चियों की तस्करी चौदह गुनी बढ़ी है। आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2014 में छोटी बच्चियों की तस्करी जैसे अपराध में 65 फीसदी की बढ़ोतरी दर्ज की गई है।
नेशनल क्राइम ब्यूरो की रिपोर्ट के मुताबिक, राष्ट्रीय स्तर पर पिछले एक दशक में 76 फीसदी मानव तस्करी के मामले ज्यादा दर्ज किए गए हैं। वर्ष 2014 में देश भर से कम से कम 8,099 बच्चियों के सौदे की रिपोर्ट दर्ज की गई है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट बताती है कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर महिलाओं और बच्चियों की तस्करी यूक्रेन, जार्जिया, कजाकिस्तान, उजबेकिस्तान, अजरबैजान, चेचन्या, किर्गिस्तान, नेपाल, थाईलैंड, मलेशिया और थाईलैंड से ज्यादा होती है। अगर हम राष्ट्रीय स्तर पर बात करें, तो आंध्र प्रदेश बच्चियों की तस्करी के मामले में अव्वल है।
पिछले पांच सालों में 7,450 मामले आंध्र प्रदेश में ही दर्ज किए गए हैं। इसके बाद महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडु और पश्चिम बंगाल का स्थान है। मणिपुर, मेघालय, मिजोरम और नगालैंड से भी पिछले दस सालों में नाबालिग लड़कियों की तस्करी के आंकड़ों में काफी बढ़ोतरी हुई है।
इन प्रदेशों में सक्रिय मानव तस्कर और वेश्यावृत्ति के अड्डे चलाने वालों के दलाल नौकरियां दिलाने और किसी कमाऊ लड़के से शादी करा देने का झांसा देकर विभिन्न प्रदेश में ले जाते हैं और उन्हें बेच देते हैं। अब इन प्रदेशों की सरकारें लोगों को इस सच्चाई से अवगत कराने के लिए कई तरह के अभियान चला रही हैं, उन्हें जागरूक कर रही हैं, इसके बावजूद नाबालिग बच्चियों की तस्करी पर अंकुश नहीं लग पा रहा है। मामला सामने आने पर इन प्रदेशों में आरोपियों के खिलाफ कठोर कार्रवाई के साथ-साथ न्यायालय भी खूब सजाएं सुना रहा है।
बच्चियों की तस्करी और वेश्यावृत्ति कराने के अपराध में सजा सुनाने में उत्तर प्रदेश, दिल्ली, हरियाणा और राजस्थान जैसे प्रदेश भी पीछे नहीं है।
कुल मिलाकर, मानव तस्करी से संबंधित तमिलनाडु में 2,756 लोगों के खिलाफ सजा सुनाई गई है। पिछले दस सालों में, किसी भी अन्य राज्य के मुकाबले सजा केयह आंकड़े सर्वाधिक हैं। सजा के आंकड़े तमिलनाडु के बाद कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, केरल एवं उत्तर प्रदेश राज्यों के सर्वाधिक सुनाए गए हैं।
देश के विभिन्न राज्यों की मदद से केंद्र सरकार बच्चियों और महिलाओं की तस्करी करने वालों के खिलाफ मुहिम चला रही है। ऐसे मामले में लापरवाही बरतने वाले पुलिस अधिकारियों के खिलाफ कठोर कार्रवाइयां कर रही है। वेश्यावृत्ति या बाल मजदूरी के लिए बच्चियों और महिलाओं की तस्करी रोकने के लिए केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मानव तस्कर विरोधी इकाइयों के साथ-साथ देश के सबसे संवेदनशील 335 पुलिस जिलों में तस्कर विरोधी नोडल सेल की स्थापना की है। इसी तरह देश में 225 मानव तस्कर विरोधी इकाइयां भी काम कर रही हैं।
वर्ष 2014 में मानव तस्कर विरोधी इकाइयों के लिए अरुणाचल प्रदेश, गुजरात, हरियाणा, केरल, नगालैंड, उड़ीसा, उत्तर प्रदेश एवं उत्तराखंड को केंद्र की ओर से 2.65 करोड़ रुपये की सहायता दी गई है। यही क्यों, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने वेब पोर्टल की भी शुरुआत की है जिसके माध्यम से लोगों को जागरूक किया जा रहा है। महिला एवं शिशु विकास मंत्रालय का उज्जवला कार्यक्रम वेश्यावृत्ति के धंधे में जबरन ढकेली गई बच्चियों और महिलाओं के पुनर्वास की दिशा में भी सक्रिय है। छोटी बच्चियों एवं महिलाओं की तस्करी पर रोक लगाने के लिए 2013 में किए गए कानून में संशोधन बच्चों की तस्करी मामले में तीन साल से लेकर उम्र कैद की कठोर सजा प्रदान करता है। इसके बावजूद बच्चियों की तस्करी के बढ़ते मामले समाज और कानून व्यवस्था के साथ-साथ इस देश के प्रतिनिधियों से सवाल जरूरत करते हैं कि क्या कारण है कि ऐसी घटनाओं पर अंकुश नहीं लग पा रहा है?
जब तक देश की आमजनता में ऐसे मामलों को लेकर जागरूकता नहीं होगी, ऐसी घटनाओं पर अंकुश लगा पाना असंभव सा है। ऐसी घटनाएं प्रकाश में आने के बाद लोगों का चुप रह जाना ही सबसे बड़ी समस्या है। लोगों को कई बार घटना के बारे में जानकारी हो जाती है, लेकिन पुलिस के पचड़े में पडऩे के भय से वह कतराकर निकल जाता है। समाज को ऐसी प्रवृत्ति से बचना होगा।
जगजीत शर्मा
जगजीत शर्मा, लेखक दैनिक 'न्यू ब्राइट स्टार' में समूह संपादक हैं।