बाबा रामदेव कमांडो से घिर गए हैं। उनके तन मन और धन की सुरक्षा जरूरी हो गयी है। यह सम्भव है कि कोई सिरफिरा उनका जीवन धन लूट ले!

रामदेव ठहरे सरकारी बाबा तो ठसक तो आवश्यक था ? रामदेव केवल बाबा ही हो सकते हैं बापू नहीं। मोदी कालाधन वापस करने के बजाय रामदेव के पास काले लिबास का कमांडो भेज दिया!

बाबा तो व्यापारी हैं। इनके व्यापार और उद्योग को बचाना राज्य की नैतिक जिम्मेवारी है? स्वदेशी आन्दोलन की उपलब्धि यही कमांडो की बहाली है !

संत और साधक को तन बचाने का मोह नहीं होता। महाबीर, बुद्ध, कबीर और गाँधी को अपनी बॉडी के लिए गार्ड की जरूरत ही नहीं थी। संतों की चिंता तो समाज को करनी चाहिए न कि राज्य सरकार को।

कबीर का वक्त इससे भी ज्यादा अराजक था। गांधी पर लगातार हमले होते रहे पर वे डरे नहीं। नोआखली के दंगे में गाँधी की निर्भयता प्रेरक है।

माया के खेल में मारकाट और हिंसा होगी ही। आवश्यकता से अधिक धन रखना एक हिंसा है। पूँजी विषमता और शोषण के पाँव पर ही आगे बढ़ती है। रामदेव का साम्राज्य भी इसी हिंसक प्रक्रिया का परिणाम है। रामदेव योग- बाजार और धर्म- उद्योग के प्रतिनिधि हैं। कोर्ट पहनकर पैसा कमायें या भगवा धारण कर पैसा कमायें, दोनों बराबर है। पैसा स्वदेशी और विदेशी नहीं होता। नेशनल और मल्टीनेशनल भी नहीं होता। दोनों का स्वभाव एक है। दोनों को ही ग्लोबल से प्यार है और लोकल से नफरत है।

रामदेव भ्रम न फैलाएं। स्वघोषित भारत का मसीहा न बने। रामदेव को समाधान बनना चाहिए, पर वो तो स्वयं सवाल बन गए हैं। सियासत के लोग अगर तामझाम रखते हैं तो समझ में आता है। पर भगवाधारी को इससे बचना चाहिए। आखिर इस समाज को निर्भयता का सन्देश कौन देगा ? बाबा रामदेवजी ! कबीर को करघा चाहिए कमांडो नहीं।
O- बाबा विजयेंद्र
बाबा विजयेंद्र, लेखक स्वराज्य खबर के संपादक हैं।