कराची में कत्लेआम का जिम्मेदार कौन?
कराची में कत्लेआम का जिम्मेदार कौन?
अभिषेक रंजन सिंह
पाकिस्तान की आर्थिक राजधानी कराची में जारी कत्लेआम थमने का नाम नहीं ले रहा। शहर में एक के बाद एक नए इलाके हिंसा की चपेट में आ रहे हैं। पिछले तीन दिनों में हिंसा की ताजा घटनाओं में तकरीबन 44 लोगों की मौत हो गई, जबकि दर्जनों बुरी तरह जख्मी हो गए। इस तरह मिलाकर जुलाई महीने में मरने वालों की तादात 339 तक पहुंच चुकी है। वहीं दूसरी तरफ पाकिस्तान के मानवाधिकार आयोग की एक ताजा रिपोर्ट में कहा गया है कि वर्ष 2011 के पहले छह महीनों में कराची में 1138 लोग मारे गए है जिनमें से 490 लोग सांप्रदायिक, राजनीतिक और जातीय हिंसा में मारे गए हैं। दरअसल, कराची में जारी यह हिंसा मुहाजिर कौमी मूवमेंट और मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट के कार्यकर्ताओं के बीच हो रही है। इसके अलावा पश्तून बहुल आवामी नेशनल पार्टी जिन्हें कराची के पठानों का समर्थन हासिल है, उसके बीच और एमक्यूएम के बीच मौजूदा लड़ाई में सैंकड़ों लोग मारे गए।
गौरतलब है कि मुहाजिर कौमी मूवमेंट 1990 के दशक में मुख्यधारा की पार्टी मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट से अलग हो गई। उसके बाद यह संगठन मुहाजिर कौमी मूवमेंट(हकीकी) गुट के नाम से जानी जाती है। सियासी दावेदारी और रंजिश की वजह से दोनों गुटों के बीच झड़पें होती रही हैं।
कराची की सड़कों पर बिखरे खून और जल रही दुकानों और गाड़ियों को देखकर जेहन में 1990 की तस्वीरें तैरने लगती है, जब इसी तरह कराची जाति और धार्मिक फसाद की जद में आ गया था। उल्लेखनीय है कि1947 के बंटवारे में भारत से लाखों मुसलमान सिंध की ओर पलायन कर गए। बाद में इन्होंने अपना केंद्र राजधानी कराची बनाया। बंटवारे से पहले कराची में सिंधियों का दखल था, लेकिन भारत से गए मुसलमानों की वजह से वहां की आबादी में काफी फेरबदल आ गया। नतीजतन कराची शहर में एमक्यूएम के लोगों का खासा दबदबा हो गया।
पहले जिस कराची में सिर्फ “ जिए सिंध ” के नारे और सिंधी भाषा का शोर सुनाई देता था उसकी जगह उर्दू जुबान और अदब का प्रभाव बढ़ता गया। कराची और दिल्ली में काफी बुनियादी समानताए हैं। विभाजन के बाद पाकिस्तान से आए हिंदुओं और सिखों ने दिल्ली और उसके आस- पास के इलाकों में बसे। ये लोग यहां अपना सब कुछ खोकर आए थे। दिल्ली बसे इन लोगों ने 64 सालों में अपनी स्थिति काफी मजबूत कर ली। दिल्ली में न तो इन्हें कोई रिफ्यूजी कहता है और न ही भारत सरकार ने इन लोगों के साथ कोई भेदभाव किया। बेशक, कायदे-आजम मुहम्मद अली जिन्ना ने बंटवारे के समय मुसलमानों को नई सरजमीं पाकिस्तान आने का न्यौता दिया। जिन्ना के इस आग्रह पर भारत के कई शहरों से लाखों मुसलमान एक उम्मीद के साथ पाकिस्तान तो चले गए, लेकिन पाकिस्तान में उनके साथ जिस तरह का सौतेला व्यवहार किया गया उसकी टीस बंटवारे के 64 साल बाद भी रह-रह महसूस होती है। इस्लाम में न सिर्फ मुसलमान, बल्कि किसी भी मजहब के लोगों के साथ भेदभाव करने की सख्त मनाही है। बावजूद इसके पाकिस्तान में इस्लाम के बंदों को ही मुहाजिर कहकर बारंबर जलील किया गया। शायद यही वजह था कि अस्सी के दशक में कराची में मुहाजिरों के बीच एक ऐसे नेता जिनका नाम अल्ताफ हुसैन है उनका उदय हुआ और उन्होंने करोड़ों मुहाजिरों की रहनुमाई की, जिनकी न तो कोई आवाज सुनी जाती थी और न ही पाकिस्तान में उनके वजूद को कबूल किया जाता था। अल्ताफ हुसैन का परिवार भारत के शहर आगरा से बंटवारे के समय कराची में शरण ली थी। अल्ताफ हुसैन की पार्टी मुत्तहिदा कौमी मूवमेंट(एमक्यूएम) जो पहले मुहाजिर कौमी मूवमेंट के नाम से जाना जाता था। एमक्यूएम पहले एक छात्र संगठन के रूप में उभरा। कराची यूनिवर्सिटी के कैंपस में ही एमक्यूएम का जन्म हुआ। धीरे-धीरे इसका असर सिंध के अन्य विश्वविद्यालयों में दिखने लगा। छात्रसंघ चुनावों में एमक्यूएम को मिली भारी जीत से मुहाजिर छात्र-नौजवानों में जोश भर गया। हालांकि, एमक्यूएम के बढ़ते प्रभाव से पाकिस्तान की राजनीति पर लंबे समय से काबिज सियासतदां चिंतित हो गए, नतीजतन 1989-90 में कराची में जबर्दस्त खून-खराबा हुआ। इस खूनी लड़ाई में एमक्यूएम के संस्थापक अल्ताफ हुसैन के भाई और भतीजे को भी कत्ल कर दिया गया। खुद अल्ताफ हुसैन पर कई जानलेवा हमले हुए, जिसमें वे बाल-बाल बच गए। इस हिंसा के बाद मुहाजिरों ने अल्ताफ हुसैन को अपना भरपूर समर्थन दिया। सिंध की जनता का प्यार देखकर अल्ताफ हुसैन ने 18 मार्च 1984 को एमक्यूएम के बैनर तले पाकिस्तान की राजनीति में उतरने का ऐलान कर दिया। प्रांतीय चुनाव में एमक्यूएम सिंध के अंदर सबसे बड़ी पार्टी बनकर उभरी। पीपीपी और अन्य पार्टियों को इस बात का यकीन कतई नहीं था कि एक छात्र संगठन के रूप में पैदा हुई पार्टी कल पाकिस्तान के अंदर एक बड़ी सियासी पार्टी बन जाएगी। 1990 में चुनाव के बाद कराची में राजनीतिक हिंसा एक बार फिर भड़क उठी। दर्जनों एमक्यूएम के कार्यकर्ता इस हिंसा में मारे गए।
पाकिस्तान की केंद्रीय सत्ता ने इस हिंसा के लिए अल्ताफ हुसैन को सीधे तौर पर जिम्मेदार ठहराया और हुसैन को मुल्क से बाहर कर दिया गया। पिछले कई सालों से अल्ताफ हुसैन लंदन में बैठकर अपनी पार्टी चला रहे हैं। अल्ताफ हुसैन की मांग है कि पाकिस्तान सरकार मुहाजिरों के साथ भेदभाव करना बंद करे। पाकिस्तान की सेना और प्रशासन में मुहाजिरों को उचित भागीदारी दी जाए। कराची में जारी इस कत्लेआम के बाद एमक्यूएम केंद्र और सिंध प्रांत में पीपीपी की अगुवाई वाले गठबंधन से अलग हो गया। हालांकि, एएनपी अब भी इस गठबंधन में है। दरअसल कराची में जारी हिंसा के जातीय पहलू हैं – पश्तो और ऊर्दू बोलने वाले समुदायों को निशाना बनाया गया है। पुलिस हिंसा के लिए पश्तून बहुल अवामी नेशनल पार्टी और मुत्तहिदा क़ौमी मूवमेंट को ज़िम्मेदार मान रही है। इन्हीं दोनों दलों के बीच तनाव इस शहर में जातीय और सांप्रदायिक हिंसा में वृद्धि की वजह बताई जा रही है। वैसे कराची में जातीय, नस्लीय हिंसा के साथ-साथ अपराधी गिरोहों के बीच हिंसा का लंबा इतिहास रहा है। सबसे पहले यहां उर्दू भाषी मुहाजिर और सिंधी भाषा के नाम पर एक-दूसरे के खून के प्यासे हुए। इसके बाद जिया-उल-हक के शासनकाल में कराची शिया समुदाय के खिलाफ अभूतपूर्व हिंसा का गवाह बना। जिया-उल- हक पाकिस्तान को पूरी तरह से एक इस्लामिक देश बनाने के लिए ख्वाहिशमंद थे। अपने अधिकार को चुनौती दे रहे शियाओं को सबक सिखाने के लिए जिया और पाकिस्तानी सेना ने सक्रिय रूप से सुन्नियों के समूहों को शियाओं के खिलाफ हिंसा के लिए उकसाया, जिन्होंने बिना शिया समुदाय को निशाना बनाना शुरू कर दिया। हालांकि, कराची दाऊद इब्राहिम के लिए बेहद मुफीद शरण स्थल भी है, जहां से वह अपने काले कारनामों को अंजाम देता है। माफिया तत्व न केवल ड्रग्स के काले धंधे में लिप्त हैं, बल्कि मानव तस्करी से लेकर रियल इस्टेट का धंधा भी कर रहे हैं।
इन काले कारोबार में वर्चस्व को लेकर माफिया गिरोहों के बीच एक-दूसरे का खून बहाने की होड़ लगी रहती है। कराची में जातीय हिंसा इसीलिए रुकने का नाम नहीं ले रही है, क्योंकि माफिया गिरोहों के जरिए अथाह पैसा जुटाया जा रहा है। कराची का यह रोग धीरे-धीरे पाकिस्तान के दूसरे शहरों तक पहुंचता जा रहा है। इसमें कोई शक नहीं कि कराची की आग धीरे-धीरे पूरे पाकिस्तान में जातियों और वर्गो की लड़ाई में तब्दील कर दिया है। निश्चित रूप से कराची उस बेहुरमती की एक बानगी है, जहां आज पाकिस्तान पहुंच चुका है। मौजूदा हालात को देखकर यह कहा जा सकता है कि पाकिस्तान हिंसा और अस्थिरता के गंभीर खतरे के दायरे में आ चुका है।


