लखनऊ, 14 मार्च। उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में समाजवादी पार्टी की हार के बाद भले ही सपा के अपदस्थ अध्यक्ष मुलायम सिंह यादव ने यह कहकर कि हार के लिए कोई अकेला जिम्मेदार नहीं है, अखिलेश यादव को बचाने की कोशिश की हो, लेकिन सोशल मीडिया पर अखिलेश की कोटरी के खिलाफ सपा कार्यकर्ताओं का गुस्सा सातवें आसमान पर है। आइए देखिए कुछ टिप्पणियां

अरविन्द विद्रोही ने फेसबुक पर लिखा

1 जनवरी 2017 को जनेश्वर मिश्र पार्क में किया गया ऐतिहासिक कार्य ( नेता जी को राष्ट्रीय अध्यक्ष पद से हटाने का ) ही समाजवादी पार्टी की सरकार के मुखिया अखिलेश यादव ( तत्कालीन एवं निवर्तमान मुख्यमंत्री उप्र ) के सभी विकास कार्यों ,सौम्य छवि पर भारी पड़ा है ।।

यही वो भयंकर भूल थी जिसने पराजय की इबारत लिख दी थी । कुर्बानी गैंग ने क्या क़ुर्बान किया ?? बेड़ागर्क कर दिया ...सौम्य छवि बिगाड़ दी , सिद्धांत की पिच पर सत्ता का खेल खेला गया ....इस्तीफा इस्तीफा खेला खूब खेला ,,फिर चेहरा चेहरा खेला ......

अरे ये किस चुनावी परिणाम पर ला कर खड़ा कर दिया राजनैतिक सूझबूझ से लबरेज स्वनामधन्य लोगों ......

आओ ..कुछ तो नया राग अलापो .... ईवीएम् ईवीएम से तो दाल न गली हो तोहार ....

योगेश यादव ने फेसबुक पर लिखा

कमियाँ और कारण बहुत होंगे उनमें से एक प्रमुख कारण -

2012 में समाजवादी पार्टी ने पूरी सीटों पर चुनाव लड़ा था और 2.2 करोड़ वोट मिले थे जो कुल मतदान का लगभग 29 % था हर सीट पर औसतन 54000 वोट मिले थे और 224 सीट जीती थी. 2017 में समाजवादी पार्टी ने 311 सीट पर चुनाव लड़ा और 1.89 करोड़ वोट मिले जो कुल मतदान का 22 % है और गठबंधन के साथ जोड़कर 403 सीट पर 28 प्रतिशत से ज़्यादा है और हर सीट पर लगभग 60000 वोट मिले है और मात्र 47 +7 = 54सीट जीत पायी है.

भाजपा गठबंधन को क़रीब 41 प्रतिशत और समाजवादी पार्टी गठबंधन को 28 प्रतिशत वोट मिले है इस चुनाव में भाजपा और सपा के बीच वोटों का जो क़रीब 13 प्रतिशत का अंतर है उसने क़रीब 4-5 प्रतिशत मुस्लिम मतदाताओं का वोट बँटकर बसपा को मतदान हुआ है 97 मुस्लिम प्रत्याशियों के वजह से और कुछ फ़तवा जारी करने वालों का भी इज़्ज़त सम्मान होगा और क़रीब 2 प्रतिशत निषाद वोट जो सपा के साथ रहता था वह और क़रीब 3-4 प्रतिशत लोहार, प्रजापति, नाई ,पाल और प्रत्याशी की जाति का वोट जो सपा के साथ रहता था वह सपा संगठन के इन जतीयो के नेताओ के सक्रियता में कमी और भाजपा rss के यादववाद के झूठे प्रचार और बनाए हुए यादव विरोधी माहौल और चुनावी वादों के चलते भाजपा को गया इस बार वही अंतर पैदा हुआ है और विधानसभा वार सपा और भाजपा के बीच हार जीत का जो अन्तर है वो यही वोट है. और कुछ वोट मशीन में भी बना दिया होगा भाजपा वालों ने उसकी भी जाँच हो.

योगेश यादव की इस पोस्ट पर कुछ कमेंट्स देखिए

Mukesh Bahadur Singh yogesh, try to read unexplained situations and conditions which were actual reasons for this fall out. those reasons can't be discussed on this social platform, reasons which you have written are only to console yourself or for all of us, try to understand what i meant to say Yogesh Yadav

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Arvind Yadav

Arvind Yadav This defeat was just becoz of few hypocrite and chaploos people who were surrounded with CM Sahab and give irrelevant report of every seat . These chaploos people have good power to get into 5KD and take selfie with CM Sahab and also earn money in various ways on the name of CM Sahab close people (Chaploos).

Few of them sit in Delhi and ask people to vote for sp in social media.

And people also vote on social media.

They forget all ground report and show CM Sahab all irrelevant stuff and make there numbers in CM Sahab eyes which lead to defeat of Sapa and entire true socialist of Samajwadi party.

True socialist are keept side just because of these chaploos people.

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Arvind Yadav

Arvind Yadav Anyhow jo bhi ho chaplooso ne 5 saal m full maze liye h, Ab dekhte h Kitne chakar lagte h CM Sahab k ghar k, Sayad Ab party badal le, BJP join karenge Ab wo

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Alok Singh

Alok Singh Very True Arvind Yadav ji. I appreciate that despite being a yadav you have the courage to give the right picture. Actually you have nailed it down. Akhilesh ji never stood what goverance is. He simply went by what chaploos told him who earned for themselves by Dalali. He has still to mature as an administrator. He needs to do lot of reading and understand the ground realities. He has to come out of his Mahal .

अनिल यदुवंशी ने फेसबुक पर लिखा

अब ये देखना है कि आज तक की सबसे करारी शिकस्त झेलने के बाद सपा नेतृत्व हार के कारणों की सही समीक्षा करता हैं या दूसरों पर दोषारोपण कर के अपनी जिम्मेदारी से मुंह चुराता है ?

इस ऐतिहासिक हार के कारणों की मेरी समीक्षा में कुछ मुख्य बिंदु ये रहे-

(1) सन् 2012 में बहुमत (225) प्राप्त करने के बाद मुलायम सिंह जी ने जो मंत्रिमंडल बनाया उसमे ब्राह्मण, ठाकुरों को ओबीसी के ऊपर वरीयता देते हुए इस वर्ग के कुल 20 मंत्री (ठाकुर-11, ब्राह्मण-9) बनाये गए।

पिछड़ों को कुल जमा 9 गैर महत्वपूर्ण मंत्रालय दिए गए। इस मंत्रिमंडल में सामाजिक संतुलन का ध्यान नहीं रखा गया ।

(2) 2012 की विजय के मात्र 2 माह बाद ही 12 नगर निगमों के चुनावों में भाजपा ने क्लीन स्वीप किया। उल्लेखनीय है की सभी नगर निगमों में सवर्णों की संख्या बहुत ज्यादा है ।इन नतीजों से भी सपा ने कोई सबक नहीं सिखा और सवर्णवाद जारी रखा।

(3)ओबीसी को सपा से जोड़े रखने वाले आरक्षण पर सपा सरकार द्वारा बहुत बेईमानी पूर्ण रवैया अपनाय गया। तक़रीबन हर भर्ती में ओबीसी की 27 फीसदी सीटों को कम किया गया । हर भर्ती कोर्ट में जाकर ही डिसाइड हुई।

(4) उत्तर प्रदेश लोक सेवा आयोग की परीक्षाओं में पूर्व अध्यक्ष श्री अनिल यादव जी द्वारा लागु किये गए त्रिस्तरीय आरक्षण को आरक्षण विरोधियों के दबाव में सवर्ण वोट की खातिर रद्द कर दिया।

ये दीगर बात है की सवर्णों ने सपा से पूरी तरह मुंह मोड़ लिया क्योंकि उन्हें तो अखिलेश के सरनेम से ही प्रॉब्लम थी।

(5) शासन-प्रशासन में भी ओबीसी-दलित अधिकारियों की उपेक्षा करते हुए सवर्ण अधिकारीयों को ही तरजीह दी गयी ।

(6) टिकट वितरण में भी समाज के विभिन्न वर्गों को उनकी संख्या के अनुपात में टिकट नहीं दिए गए।

उल्टा 16 फीसदी अपर कास्ट को 35 फीसदी टिकट दिए गए। वहीँ 45 फीसदी ओबीसी को 100 टिकट भी नहीं दिए गए।

(7) चुनाव के वक्त जब सभी पार्टियां अपने चुनाव प्रचार और पोल मैनेजमेंट में व्यस्त थी उस वक़्त सैफई परिवार बुरी तरह से आपसी कलह में फंसा हुआ था।

इससे जनता में इनकी छवि ख़राब हुई ।

(8) चुनाव प्रचार के दौरान भाजपा के मोदी, अमित शाह, केशव मौर्या आदि के झूठे-अनर्गल आरोपों का जमकर जवाब ना देना और सिर्फ अपने विकास को ही हर सभा में गिनाना ।

अपने भाषण में नयापन ना लाते हुए वही घिसी पिटी बातें हर सभा में रिपीट करना।

(9) बूथ लेवल पर पार्टी के समर्पित कार्यकर्ताओं की टीम के गठन का अभाव ।

नोट: इन मुद्दों में ईवीएम सेटिंग का मामला शामिल नहीं है ।

अब सपा को यदि पुनः उबरना है तो नेतृत्व को इन बातों पर गंभीरता से विचार करना होगा ।