देशबन्धु का संपादकीय

जम्मू-कश्मीर में कानून-व्यवस्था, जनअसंतोष, हिंसा की घटनाएं बेकाबू होती जा रही हैं। इस भड़कती आग को अगर सही उपायों और तरीकों से शांत नहीं किया गया तो मुमकिन है कुछ समय में हम अपने स्वर्ग की बर्बादी का शोक संगीत बजाने पर मजबूर हो जाएं।

यह ठीक है कि पाकिस्तान निरंतर घुसपैठ की फिराक में रहता है, आतंकवाद प्रायोजित करता है। लेकिन उसकी करतूतों का जवाब माकूल तरीके से देने की हमारी राजनैतिक इच्छाशक्ति भी कहां नजर आती है।

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जिम्मेदार लोग अपनी सुविधा, अपनी राजनीति, अपने नफे-नुकसान के मुताबिक कश्मीर पर प्रयोग करने पर आमादा हैं। उनके इस खेल में यहां के लोग प्यादे बनकर बुरी तरह पिट रहे हैं और जब उन्हें मौका मिलता है, एक टेढ़ी चाल से किसी को मारने से वे भी बाज नहीं आ रहे।

बीते गुरुवार की रात डीएसपी मोहम्मद अयूब पंडित को जामिया मस्जिद के पास भीड़ ने जिस क्रूरता से पीट-पीट कर मार डाला, यह उस असंतोष की आग का ही परिणाम है, जो यहां के लोगों में भड़क रही है।

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अलगाववादियों के नेता मीरवाइज़ उमर फारूख मस्जिद में अंदर नमाज अदा कर रहे थे और बाहर उनके समर्थकों की भीड़ तथाकथित रूप से पाकिस्तान समर्थित नारे लगा रही थी। ड्यूटी पर तैनात अयूब इस प्रकरण की वीडियो रिकार्डिंग कर रहे थे, लेकिन लोगों ने उन्हें खुफिया एजेंसियों का एजेंट समझा और उन पर हमला कर दिया। अपने बचाव में अयूब ने सर्विस रिवाल्वर से तीन बार फायर किया, लेकिन भीड़ उन पर हावी हो गई। उनके साथी पुलिसकर्मी भाग गए, और लोगों ने अयूब को निर्वस्त्र कर इतना पीटा कि उनकी मौत हो गई। बहुत देर तक उनका शव वहां पड़ा रहा, जिसे बाद में हटाया गया।

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कश्मीर में पत्थरबाजी की घटनाएं तो इतनी होने लगी हैं कि इसे सामान्य माना जाने लगा है और इस पर सार्थक चिंतन हो ही नहीं रहा है। पत्थरबाजों से निपटने के लिए सेना सख्ती दिखाए तो उसे शाबासी मिलती है।

एक ही देश में जनता और सेना आमने-सामने हों, इससे बड़ी विडंबना क्या होगी। लेकिन कश्मीर में यही हो रहा है और राज्य व केंद्र सरकार जुमलेबाजी से अधिक कुछ कर ही नहीं पा रही है। सरकार की निष्क्रियता का लाभ अलगाववादी अच्छे से उठा रहे हैं और लोगों को आजादी का ख्वाब दिखलाते हुए भड़का रहे हैं।

अयूब की हत्या जिस भीड़ ने की, वह इस काल्पनिक आजादी से ही प्रेरित थी।

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हिंसा किसी भी ओर से हो, वह उचित नहीं हो सकती, न ही उससे कोई उपाय निकल सकता है।

गांधीजी अहिंसा की पुरजोर वकालत करते थे, इस बात पर उनसे बहुत लोग असहमत थे, बहुत लोग आज भी उनका मजाक उड़ाते हैं, लेकिन अब शायद वक्त है कि उनके अहिंसा के सिद्धांत को पुनर्व्याख्यायित किया जाए और समझा जाए कि वे साध्य ही नहीं साधन की पवित्रता पर जोर क्यों देते थे।

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कश्मीर की जनता को सरकार और सेना के तौर-तरीकों पर आपत्ति हो सकती है, उन्हें यह अहसास भी हो सकता है कि उनके साथ किसी किस्म का अन्याय हो रहा है, अलगाववादियों की बातें, तर्क उन्हें सही लग सकते हैं। लेकिन उन्हें यह सोचना चाहिए कि इस तरह की प्रतिहिंसा से उन्हें क्या हासिल होगा। जिस आजादी का ख्वाब उन्हें दिखाया जा रहा है, उसकी हकीकत कैसी होगी? क्या जो लोग आज उन्हें आगे करके अपनी चालें चल रहे हैं, अपना राज बढ़ा रहे हैं, क्या वे कल उन्हें वे हक देंगे, जो आज हासिल हैं?

अयूब पंडित भी तो उसी कश्मीर के निवासी थे, जिसके हितैषी होने का अलगाववादी दावा करते हैं। अगर वे अपनों के साथ हो रहे अनाचार को नहीं रोक सके, तो बाद में कश्मीरियों का भला कैसे करेंगे।

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खबरों के मुताबिक मीरवाइज़ उमर फारुख मस्जिद में थे, जबकि बाहर उनके समर्थक अयूब को पीट रहे थे। क्या वे इस दुखद घटना को रोक नहीं सकते थे? क्यों उन्होंने अपने समर्थकों से शांति बनाए रखने की अपील नहींकी? कश्मीरियों को ये सवाल अलगाववादियों से पूछना चाहिए।

मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती को भी अब कोई निर्णायक कदम उठाना चाहिए।

घटना की भर्त्सना की औपचारिकता तो केंद्र सरकार ने भी निभा ली है। और ऐसा वो हर वारदात के बाद करती है

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तीन सालों में कश्मीर निरंतर जल रहा है और आम लोगों की जान पर तो बनी ही है, सुरक्षा बलों के जवान भी लगातार शहीद हो रहे हैं। मोदी सरकार इसके लिए पाकिस्तान को कोस कर अपना कर्तव्य निभा रही है, लेकिन महबूबा मुफ्ती पर जो भरोसा वहां की जनता ने दिखाया है, वे तो उसकी इज्जत रख लें।