कहां चले आए मेरे देश?
कहां चले आए मेरे देश?
चन्द्रिका
(पंद्रह दिसंबर २०११ को भाकपा (माओवादी) के केंद्रीय समिति सदस्य और प्रवक्ता चेराकुरी (पार्टी नाम आज़ाद) और पत्रकार हेमचंद्र पाण्डेय की आंध्रप्रदेश पुलिस द्वारा "मुठभेड़" के नाम पर की गई हत्या की न्यायिक जांच के लिए दर्ज़ याचिका पर उच्चतम न्यायालय ने केंद्र और आंध्रप्रदेश सरकार को नोटिस दिया है. अखिल भारतीय जांच दल की फ़ाइडिंग रिपोर्ट में पोस्टमार्टम रिपोर्ट के हवाले से बताया गया है कि आज़ाद और हेम को नजदीक से सटाकर गोली दाग़ी गई है. उच्चतम न्यायालय ने अपनी टिप्पणी में कहा है कि ’हम बतौर गणतंत्र अपने बच्चों की हत्या का बोझ बर्दाश्त नहीं कर सकते.’ हिंदी भाषा के अत्यंत ज़रूरी और मेधावी कवि आलोक श्रीवास्तव की यह कविता तक़रीबन दो साल पहले लिखी गई थी. देश की जनता की रोज़ाना गहरी होती जाती तक़लीफ़ों और बौद्धिक फलक पर तारी पस्ती के बीच इस कविता को अगर उच्चतम न्यायालय की टिप्पणी के आलोक में देखें तो कवि की तीक्ष्ण दृष्टि और उनके विलक्षण सरोकार का भरोसा बाजिब ही युगीन साबित होता है. ज़ाहिर सी बात यह कि आलोक श्रीवास्तव को हम लोग संवाद प्रकाशन के माध्यम से ज्यादा क़रीब से जानते हैं जिसके जरिये हिंदी में अनूठी पुस्तकों की पहुंच पाठकों तक संभव हो सकी है. [email protected] पर कवि से संपर्क किया जा सकता है.)
कहाँ चले आये मेरे देश?
आलोक श्रीवास्तव
ओ मेरे अभागे देश
रोओ अपनी उन संतानों के नाम
जिनकी तुम हत्या करते हो
ओ मातृभूमि
ये किनके ख़ून से सने हैं तुम्हारे हाथ?
तुम्हारी स्याह रातों में
यह कौन रोता जाग रहा है
किसे तुमने कल फिर मिट्टी बना दिया?
सुदूर बस्तियों में,
राहों में,
जंगलों में तुम्हारे ही बेटे
भूखे, बेहाल, तुम्हारे ही हाथों मारे जाते हैं
तुम छीन लेते हो उनके निवाले
उजाड़ देते हो उनकी बस्तियां...
एक विलाप रचते हो तुम
पगडंडियों पर,
खेतों पर,
दूर सिवानों पर...
मेरे अभागे देश
तुम अपनी ही संतानों के वधिक
एक कसाई की, दरिंदे की, लुटेरे की
आंखों से देखते हो जिसे
वह तुम्हारी ही
अस्थि-मज्जा,
देह,
हाथ,
आंख और हृदय है...
नदी के कांटों पर
छूट गए हैं
पैरों के निशान
जो कभी नहीं लौटेंगे...
एक आसूं,
एक रुदन,
एक कातर पुकार
पछाड़ें लेती है
विंध्य से सह्याद्रि तक
यह तुम
कहां चले आए मेरे देश?


