मर्द बनने का आकांक्षी नहीं सपना चमड़िया का स्त्रीवाद - आज की कविता – प्रतिनिधि स्वर, सपना चमड़िया की कविताएं – 4
अंतिम किस्त

सपना चमड़िया का स्त्रीवाद कहीं भी मर्द बनने का आकांक्षी नहीं है। वे ससम्मान और बराबरी का जीवन चाहती हैं। ‘ओ हमारे माझी’, ‘पेट्रोल पंप पर लड़की’, ‘नमाज़ की तरह’ आदि इसी तरह की कविताएं हैं। नमाज़ की तरह कविता को गतानुगतिक प्रेम समझ टाप जाने के बजाए गम्भीर पाठ की जरूरत है। यह गहरे अर्थों में स्त्री की प्रेम कविता है। उसका जीवन सत्य है, जो पुरुष द्वारा अपनी आत्मवत्ता और अनुभव को निरपेक्ष सत्य की तरह गाये गए प्रेम को जगह-जगह से तोड़ती है। यह तमाम सहमतियों-असहमतियों से बुना इसी धरती का मानवीय संबंध है। प्रेम में पुरुष के लिए स्त्री दर्पण की तरह है जहाँ वह अपने को पाना चाहता है, उसे पाना चाहता है जिसे उसने सदियों से वहाँ छोड़ रखा है। । स्त्री के अनुभवों से उसे कोई मतलब नहीं। इसीलिए स्त्रियों ने इसे ‘कार्पस सेक्सुयलिटी’ की तरह भी समझा है। इस कविता में एक-एक चिह्नों पर ध्यान देना होगा। उदाहरण के लिए इन पंक्तियों को लें-

“बस बीच-बीच में

मादा कबूतर अपने गहरे काले

पंखों से ढक लेती है

अपने साथी को”।

विस्तार से बचते हुए सिर्फ़ इतना आग्रह है, कि ‘सब्जेक्ट’ और ‘ऑब्जेक्ट’ अवस्थिति पर ध्यान दें। इस कविता में हिन्दू चिह्नों से बचना सिर्फ़ भगवावाद से लड़ने की चाहत नहीं बल्कि इससे आगे बढ़ कर यह कविता नमाज़, रमजान और वज़ू को भी नितांत मानवीय धरातल पर उतार देती है।
समाप्त।
-आशीष मिश्र युवा आलोचक हैं।
आज की कविता – प्रतिनिधि स्वर, सपना चमड़िया की कविताएं – I

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