कहीं हम अराजकता की ओर तो नहीं बढ़़ रहे ?
कहीं हम अराजकता की ओर तो नहीं बढ़़ रहे ?
राजनीतिक पार्टियों को भी बदलना पड़ेगा अपने आपको
सुन्दर लोहिया
केवल क्रान्तिकारी राजनीति ही परिवर्तनकामी हो सकती है। सत्ता अन्वेषी राजनीति यथास्थिति की पक्षधर बनी रहती है। इसलिए राजनीतिक पार्टियों से किसी परिवर्तनकारी नीति की उम्मीद करना आत्मवंचना के समान है। परिवर्तन की बात किये बिना कोई भी पार्टी सत्ता का दावा नहीं कर सकती। उसे सत्तासीन पार्टी को अपदस्थ करने के लिए विरोध के लिए ही सही परिवर्तन का नारा तो लगाना ही पड़ता है। यह हर पार्टी की लाचारी हो सकती है जिसे सत्ता प्राप्त करते ही वे आसानी से भुला देते हैं। वोटों की राजनीति का यह खेल उस जनता के बीच आसानी से चलता है जिसमें अनपढ़ता और निर्धनता के कारण राजनीतिक चेतना का अभाव होता है। लोकतन्त्र द्वारा विकसित आत्म विश्वास के स्थान पर स्मृति में धँस चुकी गुलाम मानसिकता इस खेल को आसान बना देती है। इस परिप्रेक्ष्य में भारतीय संसद के आगामी चुनाव एक अलग चर्चा की माँग कर रहे हैं। विगत छह दशकों में इस देश के मतदाताओं की आर्थिक और शैक्षणिक परिस्थिति में कुछ तो गुणात्मक अन्तर आया ही है। उदाहरण के रूप में देश में साक्षरता दर जो शुरूआती दौर में तीस प्रतिशत से भी कम थी आज सत्तर प्रतिशत के लगभग हो चुकी है। और इसमें समाज का अब तक उपेक्षित और वंचित वर्ग भी शिक्षित और सम्पन्न वर्ग की श्रेणी में पहुँच रहा है। इसके अतिरिक्त आर्थिक विकास भले ही असंतुलित रूप में हुआ लेकिन इसके फलस्वरूप एक नया मध्यमवर्ग उभर कर आया है जो महँगाई और बेरोज़गारी की मार के कारण आक्रोश और हिंसा की ओर अग्रसर हो रहा है। यह देश की श्रमशक्ति का लगभग एक तिहाई हिस्सा है। इसी तरह मतदाताओं में सेवानिवृत और वयोवृद्ध नागरिकों का एक ऐसा हिस्सा है जो इस देश की राजनीति के गत छह दशकों की उठापटक और कथनी करनी के अंतर को भोग चुका है जो उनके जीवन के इस पड़ाव पर वितृषणा और व्यर्थता के बोध से हतप्रभ भले ही हो लेकिन वे किसी भी तरह हताश नहीं हैं। इनमें अधिकांश हो सकता है मतदान में भाग ही न लेते हों क्योंकि उन्हें आज़ादी से कुछ खास हासिल न हुआ हो लेकिन जीवन के अंतिम छोर पर पहुँचे इनमें से कुछ लोग वृद्धहठ के चलते कुछ भी करने पर उतारु हैं। यह पूरा परिदृश्य राजनीतिक पार्टियों के लिए चुनौतियों से भरपूर है इसलिए राजनीतिक पार्टियों को अपनी परिवर्तन विरोधी मानसिकता से मुक्त हो कर नई वास्तविकताओं और उसकी चुनौतियों का सामना करने के लिए तैयार हो सके।
सबसे पहले तो इन पार्टियों को अपनी संवैधानिक स्थिति के बारे जो अहंकार है उसे त्याग कर लोकतन्त्र द्वारा निर्धारित पद प्रतिष्ठा को स्वीकार करना होगा। अभी तक यह माना जाता है कि निर्वाचित सांसद या विधायक जनता का भाग्यविधाता हो जाता है। इसलिए अब जनता को क्या चाहिए, क्या नहीं इसका फैसला जनता के नाम पर नेता करता है। वास्तव में यह औपनिवेशिक गुलामी का खुमार है जो आज़ादी के पैंसठ साल बाद भी उतरा नहीं है। उसका काम इसके बिलकुल उलट है यानि जनता की आकाँक्षाओं को पहचानते हुए उन्हें संतुष्ट करने के लिए प्रशासनिक तौर पर हर सम्भव प्रयत्न करना। प्रयत्नों में शामिल है तदर्थ कानून बनाना विकास की योजना की रूपरेखा तैयार करके उसके लिए समुचित संसाधन जुटाना। सुखी और समृद्ध जीवन यापन के अवसर जुटाना और बहुजन हिताय बहुजन सुखाय के सिद्धान्त के अनुसार सामाजिक और प्राकृतिक संसाधनों का आवंटन करके समग्र सामाजिक विकास के लिए ढाँचा तैयार करना, ये ऐसे काम हैं जिनकी पूत्र्ति अलग तरह की मानसिकता और अलग प्रकार की बौद्धिकता की मांग करती हैं।
लेकिन इस देश में बड़ा सरमायेदार बड़ा उद्येगपति बड़ा व्यापारी और बड़ा बनने के लिए राजनीति की शरण ले रहा है। अब हालत यह हो गई है कि बड़ा अपारधी और बड़ा अपराध करने के लिए संसद में घुस आता है। इसलिए जब तक ये राजनीतिक दल अपनी कार्यप्रणाली नहीं बदलेंगे और सिर्फ ज़्यादा सीटें जीतने के चक्कर में भ्रष्ट और अपराधिक छवि वाले अमीर को या बहुसंख्यक जाति से ताल्लुक रखने के कारण जातिवादी और साम्प्रदायिक छवि वाले लोगों को सत्ता के गलियारे में प्रतिष्ठित कर के राज चलायेंगे तो जनता को ही कुछ करना पड़ सकता है। इन समाज से उखड़े हुए लोगों के लिए गरीब के भोजन का मतलब है उसके पेट में कुछ न कुछ भकोस दिया जाये ताकि वह कल भी उनके काम पर हाजि़र हो सके।
गरीबी की रेखा के नीचे और ऊपर जो लोग हैं उनकी शिक्षा और स्वास्थ्य के बारे में न योजना आयोग को चिन्ता है न उसके लिए खाद्य सुरक्षा के नाम पर कानून बना कर उसके कपड़े और मकान स्वच्छता और स्वाभिमान की चिन्ता है। सरकार को मालूम होना चाहिए कि उसने गरीबों के नाम पर जो कानून बनाये हैं वे सब उसके लिए उलट गये हैं। वनों पर आदिवासी जनजातियों का अधिकार पुनर्स्थापित करने के लिए जो कानून बना उसे राज्यों ने लागू ही नहीं किया और केन्द्रहय सरकार हस्ताक्षेप के आरोप से बचने के लिए इस पर खामोश हो गई है। सूचना का अधिकार दिया; बड़ा डिंढोरा पीटा कि सरकार अपने कामकाज में पारदर्शिता लाने के लिए कृत्तसंकल्प है लेकिन जब बात राजनीतिक पार्टियों की जवाबदेही पर आई तो संसद में इसके खिलाफ हो गये। आपने शिक्षा के अधिकार का कानून बनाकर गरीब बच्चों को निरक्षर बनाये रखने का षड़यन्त्र रचा है क्योंकि सरकारी स्कूलों में बच्चों को फेल न करने का फरमान निकाल कर और स्कूल में अध्यापकों को दोपहर का खाना पकाने का जिम्मा सौम्प कर उन्हें अध्यापक के बजाये बाबर्ची बना दिया। अब परिणाम सामने है कि पाँचवीं कक्षा का बालक गणित का साधारण सी जमा या घटाने का सवाल हल करने में असमर्थ है। आपने गरीब बच्चों को शिक्षा का कानूनी अधिकार देकर उन्हें वास्तव में निरक्षर बना दिया।
पर ऐसा काम सिर्फ कांग्रेस ने ही नहीं किया है। भाजपा के प्रधानमन्त्री अटलबिहारी वाजपेयी ने शिक्षा को रोज़गार से जोड़ने के मकसद से देश के तीन उद्योगपतियों को नई शिक्षा नीति बनाने का काम सौम्पा था। उनके सुझावों का विरोध वैज्ञानिक यशपाल ने भी किया लेकिन उनकी बात को न कांग्रेस ने सुना न भाजपा ने और देश भर में उच्च शिक्षा की दुकानें खुल गई। गौशालाओं में विश्वविद्यालय स्थापित हो गये और साबुन की टिकिया की तरह डिग्रियां बाज़ार में कई ब्राण्डनेम से बिकनी लगीं। परिणामस्वरूप शिक्षित प्रशिक्षित बेराज़गार युवाओं की संख्या में बढ़ोत्तरी हो गई और निजी विश्वविद्यालयों में आज शिक्षार्थियों की संख्या में हताश कर देनेवाली कमी महसूस की जा रही हैं। मंहगाई कम करने के वायदे प्रधानमन्त्री और वित्त मन्त्री कई बार कर चुके हैं लेकिन मंहगाई इसके बावजूद बढ़ती ही जा रही है। विदेशी निवेश के लिए हमारी सरकार विदेशी पूंजीपतियों के आगे दण्डवत मुद्रा में खड़ी रहती है और वे उसे आर्थिक सुधारों की घुट्टी पिला कर स्वदेश भेज देते हैं और संसद की हर बैठक में प्रधानमन्त्री आर्थिक सुधारों की नई खेप जनता के सिर पर पटक कर सकल घरेलू उत्पाद दर में बढ़ोत्तरी की आशा में एक और वर्ष गुज़ारने का जुगाड़ कर रहे हैं। ऐसे में देश की प्रमुख दावेदार पार्टियों से किसी कारगर बदलाव की उम्मीद नहीं है और शेष पार्टियों में तीसरे मोर्चे के दावेदार जिस तरह से संविधान की धज्जियां उड़ा रहे हैं उन्हें सत्ता सौंपने का मतलब होगा फासीवाद को निमन्त्रण देना। वामपंथी दलों में देश की वस्तुस्थिति का सही आकलन करने की क्षमता नज़र नहीं आ रही। कुल मिलाकर देश का राजनीतिक परिदृश्य चिन्ताजनक है। कहीं हम अराजकता की ओर तो नहीं बढ़़ रहे ?


