कांग्रेस का हाथ आप के साथ,पटाक्षेप दिल्ली की नौटंकी का
कांग्रेस का हाथ आप के साथ,पटाक्षेप दिल्ली की नौटंकी का
भाजपा को यह साबित करना था कि #आप भी डिफ़रेंट नहीं है, इसलिए उसने तेज़ आवाज़ में कहना शुरू करदिया कि एक नई पार्टी होते हुए भी #आप ने जो कमाल किया है, सरकार उसे ही बनानी चाहिए।
मोहन श्रोत्रिय
पिछले बारह दिनों से नौटंकी चल रही है दिल्ली में। यह कहना ग़लत होगा कि यह #आप का ही खेल है। सामान्य परिस्थितियों में, भाजपा चुनाव परिणामों के रुझान दिखने लगते ही, सरकार बनाने का दावा पेश करने लग जाती। सबसे बड़ी पार्टी को बुलाए जाने की नज़ीरें पेश करने लगती। जोड़-तोड़ का अभ्यास पुराना है। उसकी स्थिति में कांग्रेस होती, तो वह भी उसी तरह के दावे करने लग जाती, बेशक ! पर #आपने दोनों की स्क्रिप्ट को बदल दिया, पूरी तरह से। कांग्रेस को तो कुछ भी कहने लायक़ छोड़ा ही नहीं था, जनता ने। भाजपा पर शुचिता का अप्रत्याशित दौरा पड़ गया, और उसने पैर पीछे खींच लिए। अपने आप को #पार्टी विद अ डिफ़रेंस कहने वाली भाजपा अभी तक कभी बता नहीं पाई कि वह #डिफ़रेंस उसके किस #आचरण में निहित रहा है।
#आप ने चाहे कभी यह दावा नहीं किया कि वह पार्टी विदअ डिफ़रेंस है, पर वह जिस आधार पर खड़ी होकर चुनाव में उतरी, बिना उसके कहे भी आम लोगों को दिखने लगा कि यह #डिफ़रेंट है। झंझट यहीं से शुरू हो गया। भाजपा को यह साबित करना था कि #आप भी डिफ़रेंट नहीं है, इसलिए उसने तेज़ आवाज़ में कहना शुरू करदिया कि एक नई पार्टी होते हुए भी #आप ने जो कमाल किया है, सरकार उसे ही बनानी चाहिए। उल्लेखनीय है कि ऐसा कहते हुए भी उसने #आप को बाहरी समर्थन देने की पहलक़दमी नहीं की। ऐसे में बेहतर तो यही होता कि भाजपा दुबारा चुनाव की मांग कर देती, या फिर यह जानते हुए भी कि #आप बिना कांग्रेस का समर्थन लिए सरकार नहीं बना सकती है, उसे #आप पर फब्तियां कसने से बाज़ आना चाहिए था।
#आप को भी यह साफ़ लग रहा था कि कांग्रेस का समर्थन उसे दो कारणों से महंगा पड़ सकता है। पहला तो यह कि कांग्रेस की परंपरा रही है, समर्थन देकर सरकार बनवाने की, और फिर किसी दिन अचानक बिना किसी बड़े कारण के समर्थन वापस लेकर सरकार गिरा देने की। दूसरे, इससे यह संदेश जाएगा ही कि #आप “किसी से समर्थन न लेने। किसी को समर्थन न देने” कीघोषित नीति से पलट रही है। इसलिए यह अप्रत्याशित नहीं था कि वह सरकार बनाने के अपने फ़ैसले पर जनता का “ठप्पा” लगवा लेने के रास्ते पर चल पड़ती। यह उसके लिए ज़रूरी इसलिए भी था कि दोनों पार्टियां एक तरफ़ तो कटाक्ष करने से बाज़ नहीं आ रही थीं, वही दूसरी ओर, सरकार चला पाने और वादे पूरे कर पाने की #आप की क्षमता को लगातार प्रश्नांकित करती रही थीं। मीडिया ने प्रकारांतर से मज़े लेने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी।
ग़नीमत है, जनता ने #आप की इस दुविधा को भांप कर उसे संदेशों के माध्यम से बता दिया कि उसे सरकार बना ही लेनी चाहिए। उम्मीद है कि आज नौटंकी का आखिरी दृश्य पूरा होते ही पर्दा गिर जाएगा। पर ज़रूरी नहीं कि सरकार बनते ही एक नई नौटंकी की शुरुआत न हो जाए। नैतिकता और शुचिता में यदि दोनों पार्टियों को दिखावे-भर का भी विश्वास है, तो सरकार को काम करते रहने, और इस तरह अपने वादे पूरे करने का मौक़ा दिया जाना चाहिए। जनता का हित इसी में निहित है। फ़ासिज़्म की आंधी को रोकने में भी सरकार की सफलता दूरगामी भूमिका अदा करेगी। यह काम कोई भी अवसरवादी तीसरा मोर्चा नहीं कर सकता, वामपंथियों की बड़ी-छोटी कैसी भी भूमिका हो चाहे उस मोर्चे के गठन में !


