अयोध्‍या फिल्‍म फेस्टिवल 2014
17-19 दिसंबर, 2014
काकोरी के क्रांतिवीर की जेल डायरी और दुर्लभ दस्‍तावेजों का उद्घाटन, फिल्‍में और बेग़म अख्‍़तर, ख्‍़वाज़ा अहमद अब्‍बास व मुक्तिबोध की स्‍मृति

अयोध्या14दिसंबर। फ़ैज़ाबाद का साझी विरासत का अपना शानदार इतिहास रहा है, लेकिन दुर्भाग्य ही है कि यहाँ की आबोहवा में मज़हबी ज़हर घोलने की साजिश लगातार बनी रहती है। इन तमाम अवरोधों के बावजूद अयोध्या से शुरू हुआ "अवाम का सिनेमा" नाम का सफर लगातार आगे बढ़ता ही जा रहा है और आज यह अपने आठवें साल में प्रवेश कर गया है। काकोरी के नायकों की याद में होने वाला यह उत्सव पुरानी परम्परा को सहेजते हुए तीन दिवसीय आयोजन के माध्‍यम से इतिहास का गवाह बनने जा रहा है।

यह आयोजन 17-19 दिसंबर 2014 के बीच होने जा रहा है। "अवाम का सिनेमा" के संयोजक शाह आलम ने बताया कि इस आयोजन में अमर शहीद अशफ़ाक की जेल डायरी के कुछ ऐतिहासिक पन्‍ने हम दुनिया के सामने लाएंगे। शहीद अशफाक के सारे दुर्लभ दस्तावेजों, स्मृतियों को सामने रखकर ही उन्‍हें सम्पूर्णता में समझा जा सकता है।

सिर पर कफन बांधकर दस इंकलाबियों की टीम ने ब्रिटिश सरकार को खुली चुनौती पेश की थी। काकोरी एक्शन से जनता को संदेश देने के साथ बड़े पैमाने पर असलहा खरीदना था और पार्टी (हिन्दुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन) को मजबूत करना था, लिहाजा प्रदर्शनी मे HRA का घोषणा पत्र भी शामिल है। इसके साथ ही न्यायालय से जुड़े दुर्लभ दस्तावेज़ों का अवलोकन किया जा सकता है।

आयोजन के तीसरे दिन बेगम अख्तर, ख्वाजा अहमद अब्बास, मुक्तिबोध को फिल्मों के जरिए याद किया जाएगा।

यह आयोजन हमख्याल दोस्तों से जनसहयोग और श्रम सहयोग से होता आया है। अपने ऊर्जावान और उत्साही साथियों की मदद से यह कारवां अपने शुरुआती तेवर के साथ दिन-ब-दिन आगे बढ़ता जा रहा है। शाह आलम ने कहा कि हमें उम्‍मीद है कि देश में बढ़ते फि़रकापरस्‍ती के माहौल में अवाम का सिनेमा शहीदों की विरासत को संजोते हुए अमन और चैन का संदेश देगा जिससे जनता अपने बुनियादी हक-हकूक के प्रति जागरूक होगी और अपने दुश्‍मनों की सही शिनाख्‍त कर पाने में कामयाब होगी।
जिन्दगी बादे फना तुझको मिलेगी हसरत, तेरा जीना तेरा मरने की बदौलत होगा।
तन्हाई-ए-गुरबत से मगमून न हो हसरत, कब तक न खबर लेंगे यारान वतन तेरी।
मिटा ले ऐ फलक मुझको जहां तक तेरा जी चाहे, सितम परवर सितम झेल गया मैं शेरे अया होकर।
हों दौलत व हशमत पर अरबाब होस नाजां,यां बे सरोसामानी सामान-ए-मुहब्बत है।
जेल डायरी:शहीद-ए-वतन अशफाकउल्ला खां ‘हसरत वारसी’
जेल डायरी में शहीद-ए-वतन शेर, गजल और जुमलों के मार्फत अपनी बात कह रहे हैं। वतन की फिक्र और वतनी भाइयों से रुबरु होने का उनके पास यही एकमात्र जरिया बचा था जो उन्होंने डायरी में उकेरा है, हालांकि जेल डायरी के कुछ फुटकर शेर उन्होंने अपने खतों में इस्तेमाल किए थे जो उस दौर में छप भी चुके हैं। बाकी बहुत कुछ डायरी में ही सुरक्षित है।