रामप्रकाश अनंत
एक मार्च को दैनिक हिंदुस्तान में खबर पढ़ कर मुझे पता चला कि कानपुर के गणेश शंकर विद्यार्थी स्मारक मेडिकल कॉलेज के छात्रों और वहाँ के सपा विधायक इरफ़ान सोलंकी के बीच संघर्ष हो गया है। अखबार ने लिखा है कि विधायक हैलट अस्पताल के सामने मेडिकल स्टोर पर खड़े थे। सामने मेडिकल छात्रों ने एक वृद्ध को बाइक से टक्कर मार दी, उसने कुछ कहा तो वे उसे पीटने लगे। विधायक ने उन्हें समझाने के लिए अपना गनर भेजा तो उससे भी भिड़ गए। विधायक खुद पहुंचे तो उनके गाल पर थप्पड़ मार दिया। गनर ने गन तानी तो लड़कों ने विधायक के सिर पर पत्थर मार दिया और भारी पथराव कर दिया। विधायक का सिर फट गया और वे अपने साथियों के साथ जान बचा कर भाग आए। बाद में सपाई वहाँ आए और उन्होंने मेडिकल स्टोर में तोड़ फोड़ कर दी।
अखबार ने दूसरे दिन खबर छापी है कि विधायक के साथ हुई झड़प में एक मेडिकल छात्र की मौत के बाद प्रदेश में डॉक्टरों की हड़ताल से मचा हाहाकार। आगरा, झांसी, कानपुर, इलाहाबाद में सभी तरह की स्वास्थ्य सेवाओं के ठप होने की बात लिखी है। यह खबर भी केवल सनसनी पैदा करने वाली है।
कानपुर में मेरे जो भी सम्पर्क थे मैंने उनसे जानकारी ली। पता चला कि हैलट अस्पताल के सामने विधायक इरफ़ान सोलंकी खड़े थे। किसी ने अचानक अंदर से कार का दरवाज़ा खोला जिससे बाइक से आ रहे मेडिकल के छात्र टकरा गए। इसी को लेकर कहा सुनी हो गई। बाद में एसएसपी यशस्वी यादव ने फ़ोर्स लाकर मेडिकल हॉस्टलों में बर्बरता पूर्ण कार्रवाई की। अखबारों की खबरों से भी पता चलता है कि पुलिस ने एसएसपी यशस्वी यादव की अगुआई में मेडिकल छात्रों पर बर्बरतापूर्वक हॉस्टलों में घुसकर लाठी चार्ज किया है। चालीस से अधिक लड़के चोटिल हुए हैं, छः लड़कों के फ्रैक्चर है, एक लड़के की मौत हो गई और एक लड़का मेदांता हॉस्पिटल के आईसीयू में भर्ती है। पुलिस ने न सिर्फ मेडिकल छात्रों पर हॉस्टल में घुसकर लाठी चार्ज किया बल्कि मीडिया कर्मियों के कैमरे तोड़ दिए और उन पर भी लाठी चार्ज किया है। कई पत्रकारों के गंभीर चोटें आई हैं। नूतन ठाकुर जो खुद आईपीएस की पत्नी हैं और जनहित के मुद्दों पर अक्सर याचिकाएं दायर करती रहती हैं, उन्होंने मेडिकल कॉलेज की स्थिति का जायजा लेने के बाद एसएसपी यशस्वी यादव की बर्बरता पूर्ण कार्रवाई के विरुद्ध मानवाधिकार अध्यक्ष को लिखा है। इसके बावजूद दैनिक हिंदुस्तान जैसे अखबार जैसे विधायक द्वारा बना कर दी गई रिपोर्ट को ही प्रकाशित कर रहे हैं और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने पूरी घटना को ही बाइपास कर दिया तो वजह समझ में आती है। आप दो मार्च के हिंदुस्तान को देखेंगे पहले दो और अंतिम दो यानी पूरे चार पृष्ठ का विज्ञापन उत्तर प्रदेश सरकार का छपा है। चुनाव का समय है और पेड मीडिया के इस दौर में कोई मीडिया घराना क्यों सत्ता पक्ष के विरुद्ध जाएगा। भले ही सत्ता पत्रकारों के सिर फोड़ डाले। आखिर वे एक तरह के मज़दूर ही हैं और उनकी जान की कीमत मीडिया मालिकों के आर्थिक हितों के आगे बहुत मामूली है।
उत्तर प्रदेश में गुंडागर्दी सारी हदें पार कर चुकी है। नेता कुछ भी करने के लिए स्वतन्त्र हैं। एसएसपी यशस्वी यादव ने यह सिद्ध कर दिया कि सत्ता का वरदहस्त उनके ऊपर हो तो उनके जैसे अफसर हिटलर और मुसोलिनी को भी पीछे छोड़ सकते हैं। इन्हीं इरफ़ान सोलंकी विधायक ने 16 जून को आईएएस अधिकारी रितु माहेश्वरी के ऑफिस में घुस कर गुंडागर्दी की जिसकी उन्होंने रिपोर्ट लिखाई और 17 जून को उन्हें अरेस्ट किया गया। इस खबर की विडियो क्लिप इंडिया टीवी पर पडी है। कुछ महीने पहले ही रामपुर में एक चिकित्सक की सरकारी गुंडों ने पिटाई की। उनका कहना था कि वह प्राइवेट प्रैक्टिस करता था। यह बात सुनने में अच्छी लगेगी कि नेता यह तो अच्छा काम ही कर रहे हैं डॉक्टरों को पीट-पीट कर प्राइवेट प्रैक्टिस रोक रहे हैं। डॉक्टरों का कहना है कि यह सब पुरानी खुन्नस की वजह से हुआ। दरअसल उत्तर प्रदेश की सरकारी स्वास्थ्य व्यवस्था उससे भी कहीं बदतर है जैसी हम सोचते हैं। लेकिन शासन व्यवस्था का उद्देश्य उसे सुधारना नहीं है बल्कि वह उसे ऐसा ही बनाए रखना चाहती है और उसी के प्रयासों से वह इस स्थिति में है। अगर वह उसे सुधारना चाहती तो गुंडों की तरह मारपीट करने के बजाय वह न सिर्फ उस चिकित्सक पर कार्रवाई करती बल्कि प्रदेश में जितने भी सरकारी चिकित्सक प्राइवेट प्रैक्टिस करते हैं उन पर कार्रवाई करती। दस-बारह जनवरी के आसपास फिरोजावाद के ज़िला अस्पताल में इमरजेंसी में तैनात चिकित्साधिकारी को बिना किसी वजह के एक स्थानीय नेता ने पीटा। बात यह थी कि कुछ लोग आधी रात को शव लेकर आए और वे रात को ही उसका पोस्टमॉर्टम कराना चाहते थे। शाम पांच बजे के बाद पोस्टमॉर्टम करना नियम के विरुद्ध है यानी पोस्टमॉर्टम दिन की अच्छी रौशनी में ही किया जाता है। कुछ विशेष परिस्थितियों में जिलाधिकारी की अनुमति पर रात को पोस्टमॉर्टम किया जा सकता है। इस पोस्टमॉर्टम के साथ ऐसी कोई विशेष परिस्थिति नहीं थी पर वे लोग अपने राजनीतिक दबाव से ज़िलाधिकारी से अनुमति ले आए। रात में डॉक्टर को कॉल किया। डॉक्टर को आने में थोड़ा विलम्ब हुआ तो नेताजी ने इमरजेंसी में काम कर रहे डॉक्टर को पीट दिया। ये कुछ उदहारण मात्र हैं उत्तर प्रदेश की क़ानून व्यवस्था के।
ये छात्र कानपुर मेडिकल कॉलेज में मेडिकल की पढ़ाई करने आए हैं। विधायक के रुतबे के लिए एसएसपी ने न सिर्फ उनके साथ बर्बरता की है बल्कि प्रोफेसरों के साथ भी मारपीट की है। तमाम छात्रों पर फर्जी मुक़द्दमे लगाकर उन्हें बंद कर रखा है। डॉक्टर्स के सभी संगठनों को इन बच्चों की मदद के लिए आगे आना चाहिए।
डॉ. राम प्रकाश अनन्त, लेखक स्वतन्त्र टिप्पणीकार हैं।