कानून के राज पर भारी आस्था
कानून के राज पर भारी आस्था
धर्म और अध्यात्म से जुड़ी सत्य, सेवा, त्याग और समर्पण की बड़ी-बड़ी बातें करने वाले कथित साधु और संत आज समाज और व्यवस्था के लिए अराजक तत्व बन चुके हैं और कानून के राज को खुली चुनौती पेश कर रहे हैं। कानून के राज के प्रति उनकी और उनके अंध भक्तों की अनास्था उनके आचरण और विचार के फर्क को बताते हुए 'पर उपेदश कुशल बहुतेरे..।' वाली कहावत को चरितार्थ करती हुई दिखाई देती है। हाई प्रोफाइल साधु, संतों से जुड़े विवाद अब कोई नई बात नहीं है। ये अपराध जगत से जुड़ी घटनाओं का हिस्सा बन चुके हैं। अपने धार्मिक रसूख और राजनीतिक गठजोड़ से कानून को ठेंगा दिखाने का दुस्साहस करने में ऐसे लोगों को कोई संकोच भी नहीं होता।
इस वक्त स्वयंभू संत 'रामपाल' गिरफ्तारी को लेकर सुर्खियों में हैं। रामपाल अपने अनुयायियों को ढाल बना कर कानून को खुली चुनौती दे रहे हैं। समझने वाली बात यह है कानून के राज में आस्था को न्याय का आधार नहीं बनाया जा सकता। क्योंकि भारत की बहुलतावादी की बुनियाद आस्था ही है। संवैधानिक व्यवस्था में आस्था का ध्यान तो रखा जाता है, पर न्याय को वह प्रभावित नहीं कर सकती क्योंकि न्यायायिक प्रक्रिया जांच, तथ्य और मीमांसा से जुड़ी व्यवाहरिक प्रक्रिया है। जहां आरोपी या अपराधी को भी अपना पक्ष रखने की आजादी दी गई है। धार्मिक आस्था इस तरह की इजाजत नहीं देती। आस्था का तार्किक मीमांसा से कोई वास्ता नहीं है। जबकि आध्यात्म और धर्म का अपना विज्ञान और उसकी मीमांसा है। आध्यात्मिक यात्रा में आस्था अंतिम पड़ाव की तरह है। आध्यात्मिक यात्रा का प्रस्थान बिंदु परिकल्पना है और यही वैज्ञानिक अध्ययन का भी प्रस्थान बिंदु है। बिना सवाल खड़ा किए और लक्ष्य लिए हम न तो आध्यात्मिक और न ही वैज्ञानिक यात्रा को पूर्ण कर सकते। धर्म और आध्यात्म की अपनी कसौटियां है। जिस पर साधक को कसा जाता है और तब उसकी साधना की योग्यता तय होती है।
आज धार्मिक जगत में स्वयंभू संत और मठाधीश बनने की अंधी दौड़ देखने को मिल रही है। समस्याग्रस्त समाज और व्यवस्था में कमजोर इच्छाशक्ति और कर्महीन लोग आस्था के इस खेल में आसानी से फंस जाते हैं। आज साधु वेश में न जाने कितने भ्रष्ट और अपराधी किस्म के लोग धर्म के नाम पर भोले-भाले लोगों का मानसिक और आर्थिक दोहन करने में जुटे हैं। तुलसी दास जैसे संतों ने धर्म को परमार्थ यानि दूसरों के कल्याण के रूप में परिभाषित किया था, आज धर्म भोग विलास और अपराध का सुलभ साधन बन चुका है। धर्म के नाम पर राजनीति करने वाली भारतीय जनता पार्टी की हरियाणा सरकार को रामपाल की गिरफ्तारी न होने पर हाईकोर्ट की फटकार खाने को मजबूर होना पड़ रहा है। संवैधानिक व्यवस्था से जुड़ा बड़ा सवाल यही है कि यह सुनिश्चित किया जाए कि कानून से बड़ा कोई नहीं है, तभी हम स्वस्थ लोकतांत्रिक मूल्यों की स्थापना के प्रयासों की ओर अग्रसर हो पाएंगे। लोकतांत्रिक मूल्य और आदर्शों की राह में तर्क हीन आस्था अवरोध का काम न करे ताकि समता आधारित प्रगतिशील समाज की स्थापना के प्रयास आगे बढ़ सके । मसला रामलाल या किसी आसाराम का नहीं बल्कि आस्था के नाम पर उस अराजक प्रवृत्ति से जुड़ा है, जो तर्क सम्मत संवैधानिक न्याय व्यवस्था से मुंह चुराती है।
O - विवेक दत्त मथुरिया


