कानून जब पार कर दे.. बर्बरता की हद... तब क्या? ?
कानून जब पार कर दे.. बर्बरता की हद... तब क्या? ?
दिलनवाज़ पाशा
कुरान की कथित बेइज्जती के बाद मुरादाबाद में हुए दंगे की सबसे ज्यादा मार निर्दोष लोगों पर पड़ी है। सबसे दुखद पहलू यह है की मीडिया ने भी सिर्फ घटना का एक ही पक्ष दिखाया है। जब कानून बेलगाम हो जाए तो आम आदमी ही पिसता है। पढ़िए उन लोगों की कहानी जिनकी अभी तक किसी ने नहीं सुनी है और शायद कभी कोई सुने भी ना।
06 जुलाई 2011 को उत्तर प्रदेश के मुरादाबाद जिले के मुस्लिम बाहुल्य थानाक्षेत्र मैनाठेर में इस्लाम की पवित्र पुस्तक कुरान के कथित अपमान को लेकर दंगा भड़का जिसमें मुरादाबाद के डीआईजी अशोक कुमार सिंह समेत कई ग्रामीण गंभीर रूप से घायल हुए। पुलिस पर हमला करने के आरोप में 38 लोगों को गिरफ्तार करके जेल भेज दिया गया और 2 हजार से अधिक लोगों के खिलाफ केस किया गया।
मानवीय क्षति के अलावा इस घटना में सार्वजनिक और निजी संपत्ति का भी बड़े पैमाने पर नुकसान हुआ।
घटना की पृष्ठभूमिः
मैनाठेर थाने से करीब पांच किलोमीटर दूर है असालतपुर बघा गांव जहां पेशे से मजदूर कमरू का परिवार रहता है। कमरू का आरोप है कि ०४ जुलाई को घर में उसकी नाबालिग बेटी अकेली थी जिसके साथ गांव के ही मुस्लिम नाम के युवक ने जबरदस्ती की कोशिश की। कमरू ने मुस्लिम के खिलाफ थाने में मामला दर्ज कराया। ०६ जुलाई की सुबह पुलिस ने आरोपी के घर पर दबिश दी, परिवार फरार था और घर में आरोपी की १० वर्षीय बहन अकेली थी। इस बच्ची के मुताबिक दबिश देने आई पुलिस ने घर में तोड़फोड़ की जिस क्रम में कुरान-ए-पाक भी नीचे गिर गया। पुलिसक्रमियों ने कुरान को ठोकर मारी। बच्ची ने जब यह बात लोगों को बताई तो आसपास के इलाके में आक्रोश पैदा हो गया।
यूं भड़का दंगा-
आसपास के गांव के लोगों ने पुलिस के खिलाफ संभल मुरादाबाद मार्ग जाम कर दिया। जैसे-जैसे कुरान के अपमान की बात गांवों में फैली वैसे-वैसे ही आक्रोश बढ़ता गया। ११ बजे के करीब कुरान के अपमान की बात से आक्रोशित भीड़ ने मैनाठेर थाने पर हमला कर दिया जिसमें एक पुलिस जीप भी जला दी गई। मुरादाबाद संभल मार्ग से गुजर रहा पीएसी जवानों का एक मिनी ट्रक भी भीड़ के गुस्से में स्वाहा हो गया।
डींगरपुर गांव में भी पुलिस चौकी को आग लगा दी गई। यहां मुरादाबाद के डीआईजी अशोक कुमार सिंह पर भीड़ ने हमला किया। पुलिस की फायरिंग में भी चार युवक घायल हुए।
इस घटना के बाद इलाके में दहशत का माहौल पैदा हो गया ग्रामीण गांव छोड़कर अन्य गांवों में पनाह लेने चले गए। तनाव को देखते हुए भारी पुलिस बल तैनात किया गया।
राजनीतिः घटना पर राजनीति भी खूब हुई। क्षेत्र से कांग्रेसी सांसद मोहम्मद अजहउद्दीन और समाजवादी पार्टी के मुखिया मुलायम सिंह यादव समेत कई नेता हिरासत में लिए गए।
अब तक मैंने जो लिखा है उसे मीडिया में कई बार दोहराया जा चुका है। लेकिन इस घटना का एक दुखद पहलू जो सामने नहीं आ पाया वो है निर्दोष लोगों के जीवन पर पड़ा इसका असर और पुलिस द्वरा बदले की भावना से कई गई कार्रवाई में महिलाओं और बुजुर्गों पर अत्याचार।
21 वर्षीय मारूफ मुरादाबाद की तीर्थांकर यूनीवर्सिटी में बीबीए अंतिम वर्ष का छात्र है। घटना वाले दिन वो लखनऊ गया था। दंगा फैला तो उसका परिवार भी घर में बुजुर्गों को छोड़कर रिश्तेदारों के यहां पनाह लेने चला गया। बुधवार दोपहर दो बजे के करीब उसके घर में पुलिस के जवान घुसे और जमकर तोड़फोड़ की। उसका लैपटाप और डेस्कटॉप पूरी तरह क्षतिग्रस्त हो गया। कंप्यूटर के साथ ही अब मारूफ का भविष्य भी बिखर गया है।
55 वर्षीय मुस्तरी बेगम ने अपनी बहू और बेटी को तो सुरक्षित स्थान पर भेज दिया लेकिन खुद कर में ही रुक गई। उसने अपनी आंखों से अपनी नई बहु के कमरे को बर्बाद होते देखा। दरवाजा तोड़कर घर में घुसे जवानों ने न सिर्फ टीवी समेत अन्य कीमती सामान को तोड़ा बल्कि मुस्तरी का तो यह भी आरोप है कि पुलिस ने अलमारी में रखी नकदी भी निकाल ली।
32 वर्षीय साहेमीन बेगम डींगरपुर के ग्राम प्रधान की पत्नी है। पुलिस ने उसके पति कामिल हुसैन को गिरफ्तार कर लिया और उसे तब तक पीटा जब तक वो बेहोश होकर न गिर गई। एक हफ्ते बाद भी जुल्म के निशान उसके बदन पर साफ देखे जा सकते हैं। यासेमीन घर में अकेली तड़पती रही। ग्रामीण गांव छोड़कर भाग गए थे इसलिए कोई मदद को भी नहीं आ सका। अभी तक कोई भी उसका हाल जानने उसकी चौखट तक नहीं पहुंचा है। पति जेल में है और वो अभी भी घर में तड़प रही है। यही नहीं पुलिस ने उसके घर में जमकर तोड़फोड़ भी की।
यह तो चंद लोग हैं जिन्होंने अपनी बात कहने की हिम्मत की। दहशत का यह आलम है कि अभी तक गांव के युवक और युवतियां अपने घर नहीं लौटे हैं। इस दंगे के चलते एक हफ्ते तक डींगरपुर का बाजार बंद रहा जिससे यहां के ट्रांस्पोर्ट उद्योग पर भारी आर्थिक असर पड़ा। पुलिस कार्रवाई के चलते लोग अपने घरों को छोड़ने पर मजबूर हो गए हैं। पूरे मामले का सबसे दुखद पहलू यह है कि एक पुलिसकर्मी की गलती के कारण हुआ जो अभी भी अपने पद पर कायम है जबकि कई ग्रामीण जेल में हैं और ज्यादातर गिरफ्तारी के डर से अपना घर छोड़े हुए हैं।
अब कुछ सवाल-
क्या पुलिस को बदले की भावना से कार्रवाई करने का अधिकार है?
सरकारी संपत्ति को हुई हानि की भरपाई तो जनता के चुकाए टैक्स से हो जाएगी। पुलीस ने जो ग्रामीणों के घरों में तोड़फोड़ की क्या उसकी भरपाई हो पाएगी?
क्या अपने घर में होना ही अपराध है। जिस तरह पुलिस ने घरों में मौजूद महिलाओं और बुजुर्गों पर बल प्रयोग किया क्या उसकी जिम्मेदारी लेते हुए पुलिस विभाग को जिम्मेदार कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई नहीं करनी चाहिए?
क्या पुलिस के पास यह अधिकार है कि वो दबिश के दौरान घरों में तोड़फोड़ करे। यदि पुलिस ने तोड़फोड़ न की होती तो न कुरान का अपमान होता और न यह दंगा?
कार्रवाई करते हुए जब पुलिसबल ही कानून को ताक पर रख देता है तो क्या आम आदमी से कानून से दायरे में रहने की उम्मीद की जा सकती है?
मेरी दो वर्षों की मेहनत को पुलिस ने नष्ट कर दिया। अब मैं दोबारा कंप्यूटर खरीदने का सोच भी नहीं सकता। जब पुलिस ही ऐसा जुल्म करने लगेगी तो इस देश का क्या होगा? मेरा जुल्म क्या है...? क्या इस देश का कानून मेरी मदद कर सकता है?
(मारूफ हुसैन, छात्र जिसका लैपटॉप और कंप्यूटर पुलिस ने तोड़ दिया)
पुलिसवाले गुंडों की तरह दरवाजा तोड़ते हुए हमारे मेरे घर में घुसे। मेरे सामने ही मेरी बहु के कमरे को तहस-नहस कर दिया गया। टीवी समेत सारा सामान तोड़ दिया और अलमारी में रखी नकदी भी निकाल ली। क्या इस देश में कोई है जो हम पर हुए जुल्म का हिसाब दे।
... मुस्तरी बेगम जिसके घर पुलिस ने तोड़फोड़ की।
मुझे तब तक पीटा जब तक मैं बेहोश नहीं हो गई। बेहोशी की हालत में मैं घर में पड़ी रही। मेरा क्या कसूर है? बस यह कि मैं अपने ही घर में रुक गई। क्या कोई है जो मेरे जिस्म पर लगे जुल्म के निशानों का हिसाब दे सके?
...डींगरपुर के ग्राम प्रधान की पत्नी साहेमीन
पुलिसवाले मेरे घर में घुसे और तोड़फोड़ की। महिलाएं और बच्चों को हमने पहले ही भगा दिया था।
(इफ्तेखार हुसैन, डींगरपुर के रहने वाले)
पुलिसवाले घर में घुसे और सामान फेंक दिया। कुरान शरीफ भी नीचे गिर गया जिसे पलिसवालों ने ठोकर मार दी। मैंने कहा बाबूजी ऐसा मत करो तो मुझे भी थप्पड़ मारा और फिर कुरान को ठोकर मारी।
(मुस्लिम की बहन नूरजहां के इसी बयान के बाद दंगा हुआ)
पुलिसवालें पीछे भागे तो मैं गिर गई और हाथ टूट गया। फिर मुझे पुलिसवालों ने नहीं मारा। (सरबरी, दंगों में जिसका हाथ टूट गया)
ग्राम प्रधान की मोटरसाइकिल जिसे पुलिस ने तोड़ दिया।
मैं घर में अपने पति के साथ थी। पुलिस वाले आए और हम दोनों को बहुत पीटा और घर में तोड़फोड़ भी की। हमने हाथ जोड़े तो भी वो नहीं माने।
(मारूफ की दादी हदीसा)
पुलिसवाले दरवाजा तोड़ते हुए घर में घुसे। मैंने कहा मैं सांस का मरीज हूं। वो तब भी नहीं माने और मुझ पर लाठी चलाई। घर में भी तोड़फोड़ की। जो सामान सामने आया वो सब तोड़ दिया।
(सुक्खन, मारूफ के दादा)
पुलिस की बर्बरता से मारूफ का कंप्यूटर और लैपटॉप भी नहीं बच सका। मारूफ इंटेरनेट की मदद से नोट्स इक्ट्ठा करता था। न सिर्फ उसके कीमती गैजेट नस्ट हो गए बल्कि उसकी दो वर्षों की मेहनत भी तबाह हो गई।
मेरी दुकान में पुलिस ने जमकर तोड़फोड़ की। सभी मिठाइयां और सामान नष्ट कर दिया। मेरा करीब एक लाख रुपए का नुकसान हुआ है। (डींगरपुर में मिठाई की दुकान चलाने वाले रहमान)
पुलिस दरवाजे तोड़कर घरो में घुसी और जमकर तोड़फोड़ की। एक घर का टूटा हुआ दरवाजा।
स्कूल में अच्छे नंबर लाने वाले एक विज्ञापन में प्रकाशित अपने बेटे तौसीब आलम की तस्वीर दिखाती उसकी दादी।
१५ तौसीब स्कूल से लौट रहा था तभी उसे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया। यह नाबालिग छात्र फिलहाल मुरादाबाद की जिला जेल में बंद हैं।
मैं विधवा हूं गांव वाले ही मुझे खाना देते हैं। मेरी बहू भी विधवा है। मैंने अपनी बहू को तो भगा दिया लेकिन पुलिसवाले दरवाजा तोड़कर मेरे घर में घुस गए। मैंने हाथ जोड़े तो मुझे नहीं मारा। घर में कुछ है ही नहीं तो लेकर क्या जाते लेकिन तीनों दरवाजे तोड़ दिए। अब इन दरवाजों को कौन जोड़ेगा?
जिन दरवाजों पर ताले लगे थे उन्हें बंदूक की बटें मारकर तोड़ दिया गया।


