आनंद स्वरूप वर्मा

ब्रेख्त का एक नाटक है जिसमें (कम्युनिस्ट) पार्टी ने अपने एक निष्ठावान युवा कार्यकर्ता को एक मिशन के तहत ज़रूरी सन्देश के साथ उस इलाके में भेजा जो दुश्मन का इलाका था. गंतव्य तक पहुंचने से पहले उसे मजदूरों का एक समूह दिखाई दिया जो मालिक की बर्बरता के शिकार थे और भीषण उत्पीड़न झेल रहे थे. उस युवा कार्यकर्ता से यह देखा नहीं गया और वह वहाँ रुक कर मालिक के दमन के खिलाफ मजदूरों को संगठित करने में लग गया, क्योंकि उसे लगा कि ऐसे समय चुप बैठ कर वह खुद के प्रति ईमानदार नहीं रह सकता. इस प्रक्रिया में उसने दो-तीन दिन गंवा दिए और समय पर सन्देश न पहुँचने से दुश्मन ने पार्टी को भारी क्षति पहुंचाई.

इसमें कोई संदेह नहीं कि वह युवा कार्यकर्ता बेहद ईमानदार था और उसका आचरण उसकी निष्ठा के अनुरूप ही था लेकिन उसने इसके लिए गलत समय चुना और अपनी प्राथमिकता भूल गया.

हमारे बहुत सारे मित्र आजकल बहुत सही बातें कह रहे हैं लेकिन उन्हें कब कहना चाहिए इस पर शायद ध्यान नहीं दे रहे हैं. उनके अंदर बगैर किसी लाग-लपेट के सच कहने का कितना साहस है इससे हम ज़रूर परिचित हो जा रहे हैं, लेकिन वह कौशल नहीं नजर आ रहा जिसे ब्रेख्त ने ‘सच को हथियार के रूप में इस्तेमाल करने का कौशल’ कहा था. वे इस हथियार का इस्तेमाल दुश्मन के खिलाफ करने की बजाय अपने ही लोगों के खिलाफ कर रहे हैं.

मुझे याद है कि 1970 के दशक में वियतनाम युद्ध के विरोध में दिल्ली में हमारे एक प्रदर्शन में शामिल होने के लिए फिल्मकार मृणाल सेन जब आये तो हमारे ही कई मित्रों ने उनके ‘संशोधनवादी’ रुझान का जिक्र करते हुए उनसे एक दूरी बना कर रखी. अतिशुद्धतावादी और चौबीस कैरेट का बने रहने की ललक में लम्बे समय तक हम फिदेल कास्त्रो से ले कर महाश्वेता देवी तक को अपना मानने से गुरेज करते रहे. अफ़सोस कि यह प्रवृत्ति आज भी किसी न किसी रूप में हमारे बीच मौजूद है.

फासीवादी ताकतों के खिलाफ जो साथ आते रहे हैं, आ सकते हैं या उसी खेमे के वे लोग जो अपने अंदरूनी अंतर्विरोधों के चलते आने के लिए मजबूर दिखाई दे रहे हैं, उन सबके लिए हमारे पास गुंजाइश होनी चाहिए. किसकी चीड़फाड़ सार्वजनिक मंचों पर करें और किसको अपना एतराज़ अपने पत्रों या व्यक्तिगत तौर पर बताएं, इसका ध्यान रखना होगा.

हमारे बीच बहुत सारे ऐसे लोग हैं जिनका एक लंबा सार्वजनिक जीवन रहा है - हम उनके कार्यों को समग्रता में देखते हुए ही कठोर फैसलों की ओर बढ़ें.

मित्रो, लड़ाई लम्बी है और हमें समझदारी से कदम बढ़ाना होगा.