क़मर वहीद नक़वी
जैसा मौसम, वैसा कोट! वैसे कोट तो अंग्रेज़ लाये थे। उनके साहब लोग पहना करते थे। वह चले गये, देसी साहबों को पहना गये! बचपन में हम समझते थे कि सारे कोट गरम ही हुआ करते हैं! इस भोंदूपने पर हैरान न होइएगा। उस ज़माने के बच्चे ऐसे ही ढक्कन होते थे! न टीवी था, न इंटरनेट, न मोबाइल! सीखते भी तो कहाँ से सीखते? घर में एक रेडियो था, जिसका एरियल एक लम्बे बाँस पर घर की सबसे ऊँची छत पर लगाना पड़ता था। तब जा कर वह रेडियो महाशय सिग्नल पकड़ पाते और बजते। और जब रेडियो वाले कमरे में कोई न होता, तो हमारे भीतर का जासूस जाग पड़ता। रेडियो के पीछे ताक-झाँक कर हम पता लगाने की कोशिश करते कि इस डिब्बे के अन्दर इत्ती-सी जगह में कुछ मर्द-औरत कहाँ छिप कर बैठे होते हैं कि उसकी नॉब घुमाते ही बोलने लगते हैं, गाने लगते हैं! आज के बच्चे सुनें तो कहेंगे कि कैसे घामड़ होते थे तब के बच्चे! बहरहाल, बड़े हुए तो पता चला कि मौसम गरम हो तो कोट गरम नहीं पहना जा सकता! तब जा कर समझे कि मौसम के मुताबिक़ अलग-अलग तरह के कोट पहने जाते हैं! उत्तर का मौसम अलग, दक्षिण का मौसम अलग!
अब आजकल चुनाव का मौसम है। यह तो बड़ा ही चित्र-विचित्र मौसम होता है। बित्ते भर की दूरी पर भी बदल सकता है। ‘साहेब’ फ़ौरन मौसम भाँप लेते हैं। बहुत स्मार्ट हैं! अरे, जो स्मार्ट होता है, वही तो साहब हो सकता है न! ‘साहेब’ ने भले ही टोपी पहनने से मना कर दिया हो, लेकिन पार्टी कोट पहनने के लिए उतावली है! जंगल, जंगल बात चली है, पता चला है…कोट पहन कर कमल खिलाना है!
बीजेपी को पिछले एक-डेढ़ साल से मुसलमान बहुत याद आ रहे हैं। हर सभा, हर रैली में टोपियों और बुरक़ों को हाँक-हाँक कर लाया गया। ताकि दुनिया देख ले कि मुसलमानों को न बीजेपी से परहेज़ है, और न नरेन्द्र मोदी से! कुछ मौलानाओं से बयान भी दिलवा दिये गये, सलमान ख़ान के साथ पतंगबाज़ी भी हुई और अब पार्टी अध्यक्ष राजनाथ सिंह कह रहे हैं कि मुसलमानों को कम से कम एक बार तो बीजेपी को आज़मा कर देखना चाहिए और पार्टी की ओर से अगर कभी भी और कहीं भी कोई ग़लती या कमी रह गयी हो तो वह इसके लिए माफ़ी माँगने को तैयार हैं! चुनाव के लिए यह कोट भी पहनना पड़े तो यही सही!
पर क्या मुसलमान इस पर भरोसा कर लें? क्या बात महज़ एक दंगे की है? दंगों के ज़ख़्म तो कभी न कभी भर ही जाते हैं। राजनाथ सिंह असम के दंगों की याद दिलाते हैं कि काँग्रेसी मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया के शासन में एक दिन में पाँच हज़ार मुसलमान मारे गये थे। सही कहते हैं वह। लेकिन आज वह नरसंहार किसी को याद नहीं। शिव सेना की संगठित हिंसा के बावजूद 1992-93 के कुख्यात मुम्बई दंगों की चर्चा भी अब नहीं होती। फिर गुजरात क्यों नहीं भूलता? सवाल का जवाब क्या इतना कठिन है?
बीजेपी बार-बार कहती है कि अगर 2002 को छोड़ दें तो उसके बाद जहाँ-जहाँ उसका शासन रहा, कहीं कोई दंगा नहीं हुआ। सही कहती है। लेकिन संघ की लम्बी इतिहास यात्रा में मुसलमानों के प्रति संघ के स्थापित दृष्टिकोण से लेकर अयोध्या कांड तक के तमाम पड़ावों में कितनी बातें, कितनी चीज़ें समय की शिला से मिटायी जा सकती हैं? यह अविश्वास, यह असुरक्षा क्या किसी एक या कुछ लमहों की ख़ता है? और क्या इसे महज़ टोपियों और बुरक़ों के नुमाइशी शिगूफ़ों और चुनावी मौसम के बरसाती बयानों से लमहों में मिटाया जा सकता है? और फिर, सबसे बड़ा सवाल कि क्या बीजेपी सचमुच इस अविश्वास को मिटाना ही चाहती है?
बीजेपी की चिन्ता यह नहीं कि उसे मुसलमानों के वोट मिलेंगे या नहीं। उसे मालूम है कि उसे बहुत थोड़े-से मुसलिम वोट मिलते हैं और वह भी केवल कुछ राज्यों में। इसलिए वोट नहीं, वह वोट के बाद का हिसाब कर रही है। उसके लिए ऐसा कोट पहनना ज़रूरी है कि सेकुलर ब्राँड वालों को उससे हाथ मिलाने में ज़्यादा शर्म न आये। आख़िर 2002 का मातम करते हुए एनडीए छोड़ देनेवाले रामविलास पासवान फिर ‘घर’ लौट आये न! फिर कल को ममता, जयललिता के लिए भी बहानों के दरवाज़े खुले रह सकें, इसके लिए ज़रूरी है कि कुछ दिन मुसलमानों के नाम की माला भी जप ली जाये तो क्या हरज है? वैसे कुछ लोग हैरान भी हैं कि राजनाथ जी ने इतनी लपक कर माफ़ी माँग लेने वाली बात क्यों कह दी? लोग इसे भी बड़ी दूर की कौड़ी बताते हैं कि देखिए कैसे राजनाथ जी ने फिरकी मारी और अपनी ‘सेकुलर इमेज’ बना ली! कौन जाने, चुनाव बाद ऐसे अटपट हालात बनें कि सेकुलर चेहरे के नाम पर उन्हीं का नम्बर लग जाये! अटल बिहारी वाजपेयी की कहानी अभी ज़्यादा पुरानी नहीं हुई है। और दिल्ली में किसी ज्योतिषी की एक भविष्यवाणी बहुत दिनों से चटख़ारों में चल रही है!
चुनाव में ज्योतिषियों का धन्धा तो ख़ूब चमकता है, लेकिन उनके तुक्के अकसर कम ही लगते हैं। राजनीति का फलित तमाम तरह के गणित की घोटमघोट से बनता है। तो एक तरफ़ अगर बीजेपी मुसलमानों को सहला रही है, तो उधर सुनते हैं कि मोदी को वाराणसी से लड़ाने की बात तय हो चुकी है। वाराणसी ही क्यों? भगवान शिव की पवित्र नगरी काशी! हर हर महादेव की नगरी! मोदी वहाँ से लड़ेंगे तो हर-हर मोदी, घर-घर मोदी के नारे की अपील देश भर में अपने आप बढ़ जायेगी। वह बात करेंगे विकास की, गवर्नेन्स की, इंडिया फ़र्स्ट की, लेकिन नेपत्थ्य में हिन्दुत्व की अबोली सुरसुरी चुपचाप चलती रहेगी।
उत्तर प्रदेश में मायावती और मुलायम के चक्रव्यूह को हिन्दुत्व के ब्रह्मास्त्र के बिना कैसे भेदा जा सकता है? इसलिए काशी का कोट अलग और माफ़ी का कोट अलग!
(लोकमत समाचार, 1 मार्च, 2014)
क़मर वहीद नक़वी। वरिष्ठ पत्रकार व हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता के जनक में से एक हैं। हिंदी को गढ़ने में अखबारों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। सही अर्थों में कहा जाए तो आधुनिक हिंदी को अखबारों ने ही गढ़ा (यह दीगर बात है कि वही अखबार अब हिंदी की चिंदियां बिखेर रहे हैं), और यह भी उतना ही सत्य है कि हिंदी टेलीविजन पत्रकारिता को भाषा की तमीज़ सिखाने का काम क़मर वहीद नक़वी ने किया है। उनका दिया गया वाक्य – यह थीं खबरें आज तक इंतजार कीजिए कल तक – निजी टीवी पत्रकारिता का सर्वाधिक पसंदीदा नारा रहा। रविवार, चौथी दुनिया, नवभारत टाइम्स और आज तक जैसे संस्थानों में शीर्ष पदों पर रहे नक़वी साहब आजकल इंडिया टीवी में संपादकीय निदेशक हैं। नागपुर से प्रकाशित लोकमत समाचार में हर हफ्ते उनका साप्ताहिक कॉलम राग देश प्रकाशित होता है।