किसने-किसने पहनी थी स्वराज टोपी, नाम बताओ
किसने-किसने पहनी थी स्वराज टोपी, नाम बताओ
निराशा केजरीवाल से नहीं उन से है जो इनके अवसरवाद को क्रांति साबित करने में लगे थे
वे कम बड़े गुनाहगार नहीं जो आज केजरीवाल को दे रहे हैं गाली
किसने-किसने पहनी थी स्वराज टोपी
केजरीवाल - चैप्टर के क्लोज होने के क्या मायने हैं? केजरीवाल पर लगने वाले कोई भी आरोप अब बेअसर ही साबित होंगे। सत्ता चलाने की स्वाभाविक पार्टी होने का खिताब 'आप ' को मिलने ही वाला है। पंजाब चुनाव आयोग ने भी इशारा कर ही दिया है।
भाजपा ने भी सत्ता चलाने की स्वाभाविक पार्टी होने के लिए कड़ी मेहनत की थी। कांग्रेस से यह ताज भाजपा ने छीन लिया है। अब भाजपा सत्ता के मिजाज में है।
केजरीवाल को भी वही ढिठाई करनी है, जो पूर्व के दलों ने की है। सत्ता के स्वभाव में आने के लिए बहुत से पतित कार्य करने होते हैं, जो 'आप' भी करना चाहती है।
दिल्ली सरकार भी एक औसत सरकार की तरह दिन ही काट रही है। ट्रांसफर-पोस्टिंग के फर्जी सवालों में उलझना और उलझाना केजरीवाल का कार्य बच गया है।
केजरीवाल स्वयं घटिया या थेथर होना चाहते हैं, ताकि जनता बड़ी अपेक्षा ना पाल ले। यह है सेल्फ-डिग्रेड पॉलिटिक्स का नमूना। वैचारिक दिवालियेपन दिल्ली सरकार के हित में हैं। पर आप हैं क़ि गीत गाये जा रहे हैं।
केजरीवाल बिल्कुल वही हैं आज, जो कल थे। पर निराशा उन लोगों से है जो इनके अवसरवाद को क्रांति साबित करने में लगे थे। इनकी टोपी में स्वराज खोज रहे थे। यह मति भ्रम नहीं बल्कि उनकी सत्ता की भूख ही थी जो केजरीवाल को नायक मानने को प्रेरित कर रही थी। किसी को कुछ नहीं करना था बस केजरी को देव बना कर अपनी इच्छा पूरी करनी थी।
संगठनवादियों को जीने के लिए संगठन चाहिए। झोला लेकर इस मीटिंग से उस मीटिंग। और अंतिम में सब गुड़ गोबर। इन गोबरचोथो से हमें बहुत ही गुस्सा है।
जो आज केजरीवाल को गाली दे रहे हैं वे कम बड़े गुनहगार नहीं हैं। इस मदारी के पीछे टोपी पहनकर नाचगान करने वाले एक-एक क्रांतिकारी को जानता और पहचानता हूँ। आपको कोई बेवकूफ बना जाता है तो क्यों मुँह घुसेड़ते हैं आन्दोलनों में। कला बेवकूफ होने में नहीं है। कला जादूगर के पास होती है। क्रांति का जादुई असर!
नाक भौं सिकोरने वाले ये लोग कहेंगे कि केजरीवाल ने उन्हें धोखा दे दिया, छल किया और देश को गुमराह किया, इसलिए आप का साथ छोड़ दिए हैं या छोड़ रहे हैं।
पता नहीं कब ये समाज को ठगना बंद करेंगे। पॉलिटिक्स के ये तोते अभिशप्त हैं, जाल में फंसने को। अरविंद के साथ और अलग होने में क्या अंतर हो गया? हजारे ने हिम्मत खोयी और समाज ने विश्वास ?
आंदोलन की मौत की मर्सिया गाने वालों सम्हलो!
सत्ता की मंडी में बड़े-बड़े कोठे खुले हुए हैं। असुरक्षित सम्बन्ध बनाकर बीमारी को क्यों आमंत्रित किया जाय? स्वराज सिंड्रोम जैसे एनजीओ मार्का से बचें।
प्रशांत-योगेन्द्र एकादश से कोई उम्मीद वैसी ही होगी जैसी केजरीवाल से की थी। शायद यह उससे भी बदतर साबित हो। केजरीवाल ने इस टीम को सत्ता-वियोग की धीमी आंच पर पकने को छोड़ दिया है। योगेन्द्र यादव का दुश्मन स्वयं कैमरा के फ्रेम से आउट है तो इनका क्या भाव होगा?
देश अब कुछ राज्यों के होने वाले चुनावी महफ़िल का शागिर्द होगा। बहुत ही मनोरंजक माहौल होगा। इसी बीच देश का समझौता हो चुका होगा और हम झाल बजाते रह जायेंगें।
लग ही नहीं रहा है कि देश में अब कोई समस्या है? एकदम चमको-चमको का माहौल। देश दुनिया बदलने वाले लाखों नौजवान आज साजिशन दिल्ली सरकार की पालकी ढोने वाले मजदूर बन गए हैं। जब कि इनसे दूसरी अपेक्षा थी। इनसे वाचन नहीं कर्मणा देशभक्ति की अपेक्षा थी।
सरकार को छोड़ फिर इन्हें समाज की ओर लौटना चाहिए। योगेन्द्र के शाकाहारी विरोध से बात नहीं बनेगी। जो जहाँ है उन्हें वही विद्रोह करना चाहिए। एक घंटा के अंदर कार्यकर्त्ता इन्हें औकात में ला सकते हैं।
अगर ऐसा नहीं करते हैं तो काल के अपयश के हम सब भागीदार होंगे।
बाबा विजयेंद्र


