किसान की तबाही- दिल्ली दरबार खबरदार, जरा भी हुई चूक तो खमियाजा भुगतेगा देश
किसान की तबाही- दिल्ली दरबार खबरदार, जरा भी हुई चूक तो खमियाजा भुगतेगा देश
किसान की तबाही से अलगर्ज़ नेताओं को झकझोरने की ज़रूरत है
सरकार किसानों को ज़मीन का सौदागर मान रही है और मुआवजा से आगे बढ़ने को तैयार नहीं हैं
नई दिल्ली। किसानों की ज़मीन को सरकारी काम के लिए अधिग्रहण करने के मामले में राजनीति गरम हो गयी है। लोकसभा चुनाव और उसके बाद के चुनावों में हुई करारी हार के बाद कांग्रेस में चौतरफा निराशा का माहौल बन गया था लेकिन ज़मीन अधिग्रहण के मामले में प्रधानमंत्री मोदी की नीतियों के चलते कांग्रेस में थोड़ी बहुत उम्मीद जगना शुरू हुई है। अगर कांग्रेस में एक परिवार की इच्छा पर आधारित राजनीति का रिवाज़ न होता तो माहौल और भी गरमा गया होता। ज़मीन से जुड़े किसानों को निराश होने का एक और कारण प्रकृति ने उपलब्ध करवा दिया।
उत्तर भारत में रबी की फसल पूरी तरह से तबाह हो गयी है। उसके बारे में केंद्र सरकार के किसी विभाग को सही आकलन नहीं है। वह शुद्ध रूप से मुआवजा बढाने की बात कर रही है। इस बात की तरफ गौर ही नहीं किया जा रहा है कि फसल की तबाही के बाद किसान खायेगा क्या। मौजूदा सरकार के जितने भी समर्थक हैं सभी मुआवजा ज़्यादा देने की बात करते पाए जा रहे हैं। लगता है कि सभी हार मान चुके हैं। हालांकि सरकार के लिए अभी बहुत बड़ा मौक़ा है। अगर आज केंद्र सरकार सभी राज्य सरकारों को चिट्ठी लिख दे कि रबी की बर्बादी की भरपाई जायद की फसल से की जानी चाहिए तो हारी हुई बाज़ी जीती जा सकती है और किसान के चेहरे पर एक बार फिर मुस्कराहट आ सकती है। लेकिन बदकिस्मती की बात यह है कि सत्ताधारी पार्टी में बहुत सारे बड़े नेताओं को जायद की फसल के बारे में जानकारी ही नहीं है। और अगर है भी तो अपने सुप्रीम लीडर के सामने कोई सुझाव पेश कर सकने की किसी की हिम्मत नहीं है।
गेहूं सहित रबी की फसलों के तैयार होने के बाद देश में आम तौर पर खेत खाली रहते हैं। जायद की फसल इसलिए भी प्राथमिकता नहीं पाती कि उसमें पानी बहुत लगता है और देश में बिजली की हालत ठीक नहीं रहती। लेकिन अगर सरकार तय कर ले और युद्ध स्तर पर काम शुरू कर दिया जाए तो हालात बदल सकते हैं। सरकार बिजली पानी खाद बीज सब कुछ राष्ट्रीय प्राथमिकता के आधार पर उपलब्ध करवा सकती है। जायद की फसल में रबी और खरीफ के सारे अनाज और सब्जियां पैदा की जा सकती हैं। यानी रबी की तबाही की भरपाई से ज़्यादा पैदा किया जा सकता है। आज अगर केंद्र सरकार इस तरह से जुट जाए जैसे वह एक किसान हो और उसकी फसल तबाह हो गयी हो और अपना सब कुछ दांव पर लगाकर अपने बच्चों के खाने के लिए कुछ पैदा करना उसकी सर्वोच्च प्राथमिकता है तो हालात बदल सकते हैं। लेकिन हम देख चुके हैं कि सरकार किसानों को ज़मीन का सौदागर मान रही है और मुआवजा से आगे बढ़ने क तैयार नहीं हैं। ज़मीन अधिग्रहण और फसल की बरबादी दोनों मुद्दों पर सरकार का रवैया खरीदार का ही है।
· समकालीन इतिहास में केवल १९६४-६५ में फसल की इस तरह की तबाही देखी गयी है। देश चीन से युद्ध की आग में झुलस चुका था। जवाहरलाल नेहरू नहीं थे। लाल बहादुर शास्त्री देश के प्रधानमंत्री थे। रक्षा और खेती के मामले में देश को ज़बरदस्त झटका लगा था। शास्त्री जी ज़मीन से जुड़े हुए नेता थे । गरीबी के अर्थशास्त्र को समझते थे। उन्होंने किसान और जवान की इज्ज़त की और फौज और किसान के हौसलों को बुलंद किया। लाल बहादुर शास्त्री ने ही " जय जवान , जय किसान " का नारा दिया। जवान यानी सेना को सही लीडरशिप मिली और उसने पाकितान के जनरल अय्यूब खान को भारत की सेना के बारे सही बात समझा दी। यह ज़रूरी था क्योंकि पकिस्त्तानी फौज और सरकार के मुखिया जनरल अय्यूब खान को भारत की सैन्य शक्ति के बारे में कुछ मुगालते हो गए थे। उनकी समझ को सेना ने दुरुस्त कर दिया। किसानी के मैदान में भी शास्त्री जी की सोच विजयी रही। उन्होंने भुखमरी की स्थिति को बचा लिया। विकसित देशों से अनाज का बहुत बड़े पैमाने पर आयात किया और अपने कृषि वैज्ञानिकों को आगाह किया कि टेक्नालोजी के सहारे खेती के विकास का वक़्त आ चुका है। विश्वविद्यालयों में खेती के विज्ञान की पढाई लिखाई की बुनियाद जवाहरलाल नेहरू ने पहले ही डाल दी थी। भारत के कृषि वैज्ञानिक अमरीकी विश्वविद्यालयों में बहुत बड़े स्तर पर सम्मान पा रहे थे। शीर्ष कृषि वैज्ञानिक नारमन बोरलाग से संपर्क किया गया।
शास्त्री जी ने 1965 में सी सुब्रमण्यम को कृषि मंत्री बनाया और उनको निर्देश दिया कि अनाज के मामले में देश को आत्मनिर्भर बनाया जाना है। उसके लिए सी सुब्रमण्यम ने खेती के बारे में एक रणनीति बनायी। किसी भी कृषिप्रधान अर्थव्यवस्था को डूबने से बचाने के लिए उनकी किताब ए न्यू स्ट्रेटेजी इन इंडियन एग्रीकल्चर ( The New Strategy in Indian Agriculture) मील का पत्थर मानी जाती है। उनकी इसी किताब के आधार पर जो नीतियाँ बनीं उनको ही (हरित क्रांति) ग्रीन रिवोल्यूशन कहा जाता है। आम धारणा है कि ग्रीन रियोल्यूशन इंदिरा गांधी की देन है। लेकिन यह सच नहीं है। इसकी शुरुआत शास्त्री जी के कार्यकाल में हो चुकी थी। उनकी असामयिक मृत्यु के बाद इंदिरा गांधी ने उस योजना को चलने भर दिया था। दुनिया जानती है की इस देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए हरित क्रांति का सबसे बड़ा योगदान है।
इस तरह से हम देखते हैं जब आज़ादी के बाद पहली बार आज जैसी फसलों की तबाही हुयी थी तो उसका जो राजनीतिक रिस्पांस था, वह ज़बरदस्त था और उस मुसीबत से बचने के लिए शास्त्री जी की सरकार ने जो पहल की थी उसके कारण भारत में सही मायनों में ग्रामीण तरक्की का माहौल बना था। इस बार भी उसी तरह की राजनीतिक जवाब की ज़रुरत थी लेकिन सरकार और विपक्ष दोनों ही एक दूसरे के खिलाफ राजनीतिक प्वाइंट स्कोर करने की नूराकुश्ती मीन लगे हुए हैं क्योंकि दोनों ही की आर्थिक राजनीतिक सोच के केंद्र में किसान दूर दूर तक नहीं है।
आज उत्तर भारत में किसान की हालत बहुत खराब है। आशंका यह भी है कि लोग भूख से भी मरने लगें। भूख से मरना बहुत बड़ी बात है, दुर्दिन की इंतहा है, लेकिन भूख की वजह से मौत होने के पहले इंसान पर तरह-तरह की मुसीबतें आती हैं। गांव का किसान, जिसकी हर जरूरत खेती से पूरी होती है, वह राजनेताओं की प्राथमिकता की सूची में कहीं नहीं आता। कोई इनसे पूछे कि फसल चौपट हो जाने की वजह से उस गरीब किसान का क्या होगा, जिसका सब कुछ तबाह हो चुका है। वह सरकारी मदद भी लेने में संकोच करेगा, क्योंकि गांव का गरीब और इज्जतदार आदमी मांगकर नहीं खाता।
1963-64 में उत्तर भारत में मौसम अजीब हो गया था। रबी और खरीफ दोनों ही फसलें तबाह हो गई थी। जवाहर लाल नेहरू को एहसास हो गया था कि कहीं बड़ी गलती हुई है। ताबड़तोड़ मुसीबतों से घिरे मुल्क पर 1965 में पाकिस्तानी जनरल अयूब खान ने भी हमला कर दिया। युद्ध का दौर और खाने की कमी। ऐसे ही बुरे वक़्त में प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री ने देश का ज़िम्मा सम्भाला और जय जवान, जय किसान का नारा दिया।
अनाज की बचत के लिए देश की जनता से आह्वान किया कि सभी लोग हफ्ते में एक दिन का उपवास रखें यानी मुसीबत से लड़ने के लिए हौसलों की जरूरत पर बल दिया, लेकिन भूख की लड़ाई केवल हौसलों से नहीं लड़ी जाती। जो लोग 60 के दशक में समझने लायक थे, उनसे कोई भी पता लगा सकता है कि विदेशों से सहायता में मिले बादामी रंग के बाजरे को निगल पाना कितना मुश्किल होता है और अमेरिका से पीएल 480 योजना के तहत मंगाए गए गेहूं की रोटियां बिलकुल रबड़ की तरह होती हैं, लेकिन भूख सब कुछ करवाती है।
केंद्र सरकार में ऊंचे पदों पर बैठे लोगों को क्या मालूम कि गांव का गरीब किसान जब कोटेदार के यहां अनाज खरीदने या मांगने जाता है तो कितनी बार मरता है। अपमान के कितने कड़वे घूंट पीता है। गांवों में रहने वाले किसान के यहाँ इसलिए खरीदकर खाना शर्म की बात मानी जाती है। आज के पत्रकारों को चाहिए कि गांव के किसानों की इस सच्चाई का आईना इन नेताओं और नौकरशाहों को दिखाएं। गांव के गरीब की इस निराशा और हताशा को एक नेता ने समझा था। शास्त्री जी के कृषि मंत्री रहे सी सुब्रमण्यम ने इस बात को समझा था और बाद में अपनी प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी को यह सच्चाई समझाई थी।
आज देश को उसी तरह के रिस्पांस की ज़रुरत है जैसी शास्त्री ने दी थी। इस दिशा कोई भी नहीं सोच रहा है। लेकिन नेताओं और दिल्ली दरबार को खबरदार हो जाना चाहिए कि अगर ज़रा सी भी चूक हुयी तो बहुत भारी खामियाजा देश को भुगतना पड़ सकता है।
शेष नारायण सिंह


