किसान-मजदूर विरोधी कार्रवाहियों में लगी है सरकार : अखिलेन्द्र
किसान-मजदूर विरोधी कार्रवाहियों में लगी है सरकार : अखिलेन्द्र
कानून के राज के लिए आइपीएफ का प्रदेशव्यापी जन अधिकार अभियान जारी
जिला मुख्यालयों पर हो रहा घरना-प्रदर्शन
अखिलेन्द्र ने किया दौरा
लखनऊ। कानून के राज की स्थापना के लिए पूरे प्रदेश में आइपीएफ द्वारा जन अधिकार अभियान जारी है। इस अभियान में चंदौली, वाराणसी, गोण्डा, सम्भल, इलाहाबाद जिलों में धरना प्रदर्शन किया गया, सोनभद्र जिला मुख्यालय पर बीस दिनों से धरना जारी है, गाजीपुर, मऊ में अगले सप्ताह धरना दिया जायेगा।
आइपीएफ के प्रदेश संगठन प्रभारी दिनकर कपूर ने बताया कि इस अभियान के तहत आइपीएफ के राष्ट्रीय संयोजक का0 अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने सोनभद्र, मिर्जापुर और चंदौली के दर्जनों गांव का दौरा भी किया और जिला मुख्यालयों पर आयोजित सभाओं में शिरकत की।
इन सभाओं में बोलते हुए आइपीएफ के राष्ट्रीय संयोजक का0 अखिलेन्द्र प्रताप सिंह ने कहा कि दुर्गा नागपाल का मामला कोई अलग-थलग मामला नहीं है इससे पहले अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाही करने के कारण एक ही दिन में इलाहाबाद के कमिशनर को हटा दिया गया और सोनभद्र में इसकी मुखालफत करने वाले डीएम व वनविभाग अधिकारियों का एक ही दिन तबादला कर दिया गया। दरअसल माफिया-गुण्डा-अपराधी, अवैध खननकर्ता और बिल्डरों, कॉरपोरेट घरानों ताकतों ने प्रदेश की सरकार पर कब्जा कर लिया है और यहीं सरकार को चला रही हैं। प्रदेश में कहीं भी कानून का राज नहीं है। सरकार अवैध खनन की जाँच कराने का महज नाटक कर रही है जबकि सच यह है कि प्रदेश में सर्वोच्च न्यायालय के आदेशों की अवहेलना कर लगातार अवैध खनन जारी है। इसलिए इन ताकतों के खिलाफ एक बड़े जनांदोलन को खड़ा करना होगा और जनमत का निर्माण करना होगा। उन्होंने कहा कि इस अवैध खनन के सवाल को हमने विगत दिनों विधानसभा के सम्मुख किए दस दिवसीय उपवास में प्रमुख मुद्दा बनाया था और इसके खिलाफ हमने हाईकोर्ट में जनहित याचिका भी दायर की है।
अखिलेन्द्र प्रताप सिंह का कहना है कि दौरे के दौरान यह बात प्रमाणित हुई है कि सोनभद्र, मिर्जापुर और चंदौली के उन क्षेत्रों में जहाँ माओवाद का प्रभाव रहा है और जहाँ सामाजिक तनाव का बड़ा कारण वन भूमि सम्बंधी विवाद रहे है। उन इलाकों में संसद द्वारा पुश्तैनी कब्जों के मालिकाना अधिकार के लिए बने वनाधिकार कानून के तहत आदिवासियों और वनाश्रित जातियों के 70 हजार से भी ज्यादा दावों को सरकार और प्रशासन द्वारा गैरकानूनी तरीके से खारिज कर दिया गया। गांव की वनाधिकार समिति द्वारा मौके की जांच कर स्वीकृत किए गए दावों को दावेदार को बिना कोई सूचना दिए खारिज कर दिया और आदिवासियों व वनाश्रित जातियों को अपील करने का अधिकार भी नहीं दिया गया। इतना ही नहीं अधिकार न होते हुए भी वन विभाग के अधिकारियों ने दावों में बड़े पैमाने पर गलतबयानी और हेराफेरी कर दावे खरिज किए। कई गांवों में प्रधानों ने अपने विरोधी समूह के दावों को लिया ही नहीं। जिन लोगों को जमीन आवंटित भी की गयी उन्हें भी वास्तविक कब्जे से बेहद कम दी गयी है। उन्होंने कहा कि हालत इतनी बुरी है कि कई गांवों में अपनी पुश्तैनी जमीन पर काबिज आदिवासियों और वनाश्रित जातियों के लोगों पर जायका पौधरोपण करा रहा है और वनविभाग उनके ऊपर मुकदमें कायम कर रहा है। वनाधिकार कानून में की गयी अवैधनिक प्रशासनिक कार्रवाहियों के खिलाफ आइपीएफ ने माननीय उच्च न्यायालय में जनहित याचिका दाखिल की है और दौरें के दौरान आए तथ्य से न्यायालय को भी अवगत कराया है, जिस पर न्यायालय में बहस भी हुई है।
उन्होंने कहा कि यह सरकार किसान-मजदूर विरोधी कार्रवाहियों में लगी है। सरकार ने किसानों के साथ धोखा देने का काम किया है। किसानों से पचास हजार तक कर्जे को माफ करने पर वायदाखिलाफी की है। प्रदेश में किसानों से वसूली हो रही है और उन्हें लॉकअप में बंद किया जा रहा है। किसानों के लागत मूल्य का पचास प्रतिशत जोड़कर न्यूनतम समर्थन मूल्य निर्धारित करने और किसान आयोग बनाने के वायदें को सरकार भूल ही गयी है। पूरे प्रदेश में मनरेगा को विफल कर दिया गया है कहीं भी लोगों को काम नहीं मिल रहा है। सरकार की जनविरोधी कार्रवाहियों के खिलाफ आइपीएफ कानून के राज के लिए जारी अपने अभियान को और तेज करेगा।


