किसानों की त्रासदी और मदद की राजनीति
किसानों के लिये यह दौर त्रासदी का दौर है। उत्तर भारत में रवि की फसलें जमीन्दोज हो चुकी हैं किसान के हाथ में कुछ भी आता नहीं दिखाई दे रहा है। बार-बार बारिश ने किसान को तबाह करके रख दिया है। किसानों की आत्म हत्या की खबरें समाचार पत्रों के मुख्य पृष्ठों पर छप रही हैं। किसानों के हमदर्द चीख-चीख कर विलाप कर रहे हैं। ऐसे लोग भी मैदान में कूद पड़े हैं जिन्हें खेती के बारे में ककहरा भी नहीं आता है। किन्तु वे लोग भी सुझाव पर सुझाव दिये जा रहे हैं। सरकारें बैक फुट पर हैं उन्हें समझ में नहीं आ रहा है कि वे करें तो क्या करें ? दैवीय आपदा के समक्ष हमारी सारी की सारी व्यवस्थायें धरी रह जाती हैं। किसानों को मुआवजा दिये जाने के विषय पर काफी बबाल मचाल हुआ है। भारत जैसे देशों में यह देखने को मिलता है कि जब भी कोई दैवीय आपदा आती है तो हम उस दैवीय आपदा से मुकाबले की रणनीति को त्याग कर चीखने-चिल्लाने लगते हैं हमारे राजनैतिक दल जो विपक्ष में बैठे हैं उन्हें पहले दिन से ही सरकारी व्यवस्था में खामियाँ नजर आने लगती हैं। फिर क्या राजनैतिक रोटियों को सेकें जाने का सिलसिला प्रारम्भ हो जाता है जो कि थमने का नाम ही नहीं लेता है। ऐसी स्थिति में सरकारें दबाव में काम करती हैं। उनके प्रयास रहते हैं कि विपक्ष को आरोप लगाने का मौका न मिले चाहें बचाव कार्य में गुणवत्ता से समझौता करना पड़े। दैवीय आपदा के समय ऐसे-ऐसे मंजर सामने आते हैं जिन्हें देखकर आश्चर्य होता है मसलन दो वर्ष पूर्व उत्तराखण्ड में केदारनाथ घाटी में आये विप्लव पर राजनैतिक रोटियाँ खूब सेंकी गयीं। तत्समय के गुजरात के मुख्यमंत्री गुजरात से पूरा फौज-फाटा लेकर उत्तराखण्ड के मोहाने पर आ खड़े हुये, पूछा गया तो बोले हम उत्तराखण्डवासियों की मदद करने आये हैं। क्या एक राज्य का दूसरे राज्य को मदद पहुँचाने का संवैधानिक तरीका यही है ? किसी ने पूछा, किसी ने इस तथ्य पर तबज्जो दी ? लोगों ने जमकर तारीफ की मोदी साहब की। मोदी साहब का वह व्यवहार किसी की आँखों को नहीं चुभा। मानों मोदी साहब की गुजरात राज्य कोई सल्तनत हो और भारत के संविधान ने गुजरात राज्य के सुल्तान को इस प्रकार व्यवहार करने की आज्ञा दी हो। वैसे सभी को मालूम है कि जम्मू कश्मीर को छोड़कर सभी राज्यों पर एक ही संविधान लागू होता है। संवैधानिक मर्यादाओं की बात की जाये तो मोदी का वह आचरण नितान्त निन्दनीय था केवल राजनैतिक रोटियाँ सेंकने के उद्देश्य से वह आये थे। वरना तरीका तो यह होता है कि वह उत्तराखण्ड की सरकार से सम्पर्क करें, जिस प्रकार की मदद करना चाहते थे, मदद की पेशकश करते। यह शायद देश के इतिहास में पहली बार हुआ था कि एक प्रदेश का मुख्यमंत्री पूरे लाव लश्कर के साथ इलेक्ट्रोनिक मीडिया के सामने संवेदनशीलता का ढोंग रच रहा था। दुर्भाग्य कहें या सौभाग्य आज देश की सबसे बड़ी कुर्सी पर वही शख्स बैठा है।

किसान जिस आपदा का मुकाबला कर रहा है उस आपदा का मुकाबला वह वखूबी कर लेगा, उसे मुकाबला करना आता है वह आधा पेट खाना खाकर भी अपने प्राणों की रक्षा करने में अभ्यस्थ है। ये जो आत्म हत्यायें दिखाई दे रही हैं ये भी न होतीं यदि उसे राजनैतिक दलों ने सपने न दिखाये होते। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के विस्तार से उसने भी जान लिया है कि बेहतर जीवन कैसे जिया जाता है इतिहास के पन्ने पलट कर देखें तो पायेंगे कि किसान से ज्यादा आत्म संतोषी कोई समुदाय नहीं होता है। पिछले 3500 वर्षों में जो भी भारतीय भूखण्ड पर विदेशी आक्रमण हुये उनको किसानों ने ही झेला तब सरकारों की आय का एक मात्र स्रोत कृषि उपज ही होता था। इन किसानों ने अपने बच्चों का पेट काट-काट कर राजशाही को सींचा। दुर्भाग्य यह कि जब उसका ही शासन आया तो भी उसकी स्थिति में कोई बदलाव नहीं नसीब हुआ। किसानों की अपनी जरूरतें बहुत सीमित हैं वह पूरा-पूरा दिन वगैर खर्च किये हुये गुजार देता है और यह सिलसिला कई दिन तक चलता रहता है। थाना, तहसील, कोर्ट, कचहरी में अपने शोषण के लिये भी वह कुछ नहीं कहता उसे भी उसने सदियों से स्वीकार किया हुआ है। किन्तु बदले हुये परिवेश में उसकी सन्तानों ने सपने देखने शुरू कर दिये हैं, उन्हंे भी देश और दुनिया के बारे में जानकारियाँ हासिल हो गई हैं। वे बेहतर जिन्दगी की तलाश में निकलना चाहते हैं। किन्तु इस पूंजीवादी व्यवस्था में पहली शर्त है कि जेब में ठीक-ठाक रकम होनी चाहिये जिसको मुहइया कराना है उन पिताओं को जिनकी जेब में बहुत कम आता है वे आज भी पुरानी महाजनी व्यवस्था के शिकार हैं। ऐसे पिताओं की फसलें यदि नेस्तनाबूत होती हैं तो उनके पास आत्म हत्या के अलावा अन्य कोई विकल्प नहीं है। सरकारों ने आजादी के बाद सभी वर्गों की बेहतरी के लिये काम किया, किन्तु किसान के बारे में केवल नारे ही सृजित किये गये। उससे वोट तो लिये गये किन्तु उन्हंे कुछ दिया नहीं गया। आज भी किसान सबसे अधिक शोषण का शिकार है। समय आ गया है कि सभी राजनैतिक दल मिलजुल कर किसानों के कल्याण के बारे में गम्भीर होकर मंत्रणा करें और ऐसे उपाय खोजें कि यदि भविष्य में उनकी फसलें वरबाद होती हैं तो उन्हें इतना मुआवजा मिले जिससे कि अगली फसल के आने तक उनका जीवनयापन हो सके उन्हें आत्म हत्या के लिये मजबूर न होना पड़े।

अनामदास