किसानों के मौजूदा संकट पर
जन एकता मुहिम का ज्ञापन व माँगपत्र

आज भी हमारे देश की आबादी का लगभग 70 फीसदी़ हिस्सा किसानों व मज़दूरों का है। देश के सकल घरेलू उत्पाद (ळक्च्) का 14-16 फ़ीसदी का योगदान खेती का है, जिसमें खाद्यान्न उत्पादन के साथ आबादी की लगभग 60-70 फ़ीसदी जनसंख्या रोज़गार पाती है। किन्तु पिछले दशकों, खासकर 1990 के दशक के बाद से नई आथर््िाक नीतियों के लागू होने से किसान-मज़दूर ही सबसे ज़्यादा मुसीबत झेल रहे हैं। बढ़ते आधुनिक विज्ञान और तकनीक के कथित विकास ने बाज़ार, (वित्तीय) पूँजी और राजनीतिक सत्ता के गठजोड़ के ज़रिए सबसे अधिक किसान और मज़दूर को ही तबाह किया है। अब खेती न केवल घाटे का धन्धा है, वरन इधर के सालों में मौसम पर टिकी खेती से किसानों का जीना तक दूभर हो गया है। उस पर मौजूदा नीतियों, भ्रष्ट सरकारी तन्त्र व किसानों की घोर उपेक्षा ने उसे मार डालने की ही परिस्थितियाँ बना दी हैैं; और उसे खुद ही मर जाने के लिए मजबूर कर दिया है। चिन्ता की बात यह है कि अभी भी नीति-नियन्ताओं का इधर न कोई ध्यान है, न बदलाव की इच्छाशक्ति ही।
पिछले कुछ सालों से कुदरती आपदा के चलते बाढ़ या सूखे से समूचे देश, खासकर उत्तर भारत में खेती लगातार बर्बाद होती रही है। बीते साल सूखे से, या कहीं-कहीं बाढ़ से; और इस साल रबी की अच्छी फ़सल के बावजूद बेमौसम बरसात, आँधी-तूफ़ान व ओलों की मार से खेती बुरी तरह चैपट हुई। पकी खड़ी रबी की फ़सलें - गेहूँ, दलहन व तिलहन, आलू और आम आदि - मार्च के महिने से शुरू हुई बेमौसम बारिश व ओलों की वजह से बर्बाद हुई हैं। यह हाल कमोबेश समूचे उत्तर भारत में है, जिससे बड़ी संख्या में किसान आत्महत्या करने, या सदमे से मरने के लिए मजबूर हो रहे हैं। ग़ौरतलब यह है कि किसानों की मौत का यह सिलसिला अभी भी जारी है, लेकिन सरकारी तन्त्र व विभिन्न राजनीतिक दलों के रवैये में कोई सकारात्मक बदलाव नहीं आया है।
यहाँ हम मध्य उ.प्र. के उन्नाव जि़ले की इसी बर्बादी के कारणों पर विचार करते हुए, समस्या पर अपनी समझ, समाधान की ज़रूरतों, व तत्सम्बन्धी उभरी माँगों पर एक रिपोर्ट प्रस्तुत कर रहे हैं। उपलब्ध स्रोतों, व जनसंचार माध्यमों के ज़रिए ज्ञात तथ्यों के आधार पर तैयार यह रिपोर्ट समस्या की गम्भीरता को समझने, किसान-हितैषी ठोस नतीजों तक पहुँचने, और सरकारों (प्रदेश व केन्द्र दोनों) से वास्तविक और स्थाई समाधान तलाशने की पुरज़ोर माँग करती है।
मध्य उ.प्र. के दो महानगरों - लखनऊ (प्रदेश की राजधानी) व कानपुर के बीच स्थित उन्नाव जि़ले में बेमौसम बारिश व ओलों की मार से गेहूँ, दलहन, तिलहन, आम व आलू की फ़सलें बर्बाद हुई हैं। यह बर्बादी अनुमानित तौर पर 30 से 70-80 फ़ीसदी तक है। मौसम की मार के बाद किसान को हासिल उपज न केवल आधी-तिहाई से भी कम है, वरन उसकी गुणवत्ता भी ख़त्म हुई है। ज़्यादातर किसान छोटी जोत के होने के कारण पहले से ही ग़रीब, बेज़रिया और घिसे-पिटे ढर्रे की खेती करते हैं। बैंकों, सहकारी समितियों या निजी स्तर पर सम्पन्न लोगों से लिए कजऱ्े पर टिकी खेती करने वाला किसान बँटाईदारी, या ठेका खेती के आधार पर किसी तरह अपना व परिवार का न केवल पेट पालता है, साथ ही बच्चों व गृहस्थी का ज़रूरी ख़र्च, पढ़ाई और दवा-इलाज आदि का भी ख़र्च जैसे-तैसे किसी तरह निपटाता है। इस पर भी बेमौसम बारिश व ओलों की मार ने किसान की आथर््िाक रीढ़ पूरी तरह तोड़ दी है। तंगी और बदहाली से घिरा किसान अकेला और लाचार होकर आत्महत्या करने या सदमे से अकाल मौत मरने के लिए मजबूर है।
किसानों की बेबसी के इन हालात में प्रदेश व केन्द्र सरकारों के घोषित मुआवज़े का जनसंचार माध्यमों के ज़रिए प्रतिस्पद्र्धी शोरगुल एक तरफ़ है; वहीं लेखपालों, व सरकारी मशीनरी के असम्वेदनशील काम-निपटाऊ रवैये और राजनीतिक दलों की सम्वेदनहीन उठापटक के बीच फ़सल क्षति के सर्वे और मुआवज़े की राशि को तय करने और चेक-वितरण में चल रही मनमानी व धाँधली दूसरी तरफ़ है। बैंकों की कथित किसान-हितैषी योजनाएँ, सरकारी कजऱ्, व बीमा कम्पनियों की कथित फ़सल सुरक्षा आदि की काग़ज़ी सुविधाएँ हवा-हवाई ही साबित हुई हैं, क्योंकि बर्बाद हुई फ़सल के कारण भुखमरी की आशंका, कजऱ्ों के तनाव व अवसाद के कारण ‘अन्नदाता किसान’ की मौतों का सिलसिला थम नहीं रहा है।
इस रिपोर्ट के साथ मार्च मास से अबतक उन्नाव जि़ले में सदमे या आत्महत्या से हुई 23 किसानों की मौतों एक ब्योरा संलग्न है, जिसे उपलब्ध स्रोतों, अखबारी ख़बरों व अन्य जानकारियों के आधार पर तैयार किया गया है।

माँगपत्र

‘जन एकता मुहिम’, किसानों की समस्या की भयावहता के मद्देनज़र केन्द्र व प्रदेश सरकारों से प्राथमिकता के आधार पर निम्नांकित माँगों को अविलम्ब पूरा करने की पुरज़ोर माँग करती है -

1. ग्राम पंचायत से जि़लास्तर तक खेती में हुए नुकसान के आकलन में बँटाईदारों व ठेका खेतिहरों को शामिल नहीं किया गया है। इनके हुए नुकसान का भी आकलन कर उन्हें भी मुआवज़े की सूची में जोड़ा जाए। मुआवज़े का भुगतान भविष्य में छम्थ्ज् के ज़रिए सीधे पीडि़तों के खाते में किया जाए।
2. जिन इलाकों में फ़सल क्षति का सर्वे न होने, या उसमें गड़बड़ी होने की शिकायतें पीडि़त किसानों द्वारा उठाई जा रही हैं; उन इलाकों में सर्वे उचित ढंग से कराकर (जैसाकि उ.प्र. शासन के मुख्य सचिव खुद आश्वस्त कर चुके हैं), तदनुसार फ़सल क्षति की उचित मुआवज़ा राशि पीडि़त किसानों को वितरित की जाए।
3. बैंकों व सहकारी समितियों के किसानों के कजऱ्े व देनदारियाँ माफ़ की जाएँ; और अगली ख़रीफ़ की फ़सल के लिए बीज, खाद, बिजली व पानी निःशुल्क मुहैया कराना सुनिश्चित किया जाए।
4. रबी की बर्बाद हुई फ़सलों के लिए निजी बीमा कम्पनियों द्वारा फ़सल बीमा की राशि का तत्काल भुगतान कराया जाए। भविष्य में फ़सल बीमा सरकारी कृषि कम्पनी के ज़रिए ही हो, और उसे भुगतान में पारदर्शी व जवाबदेह बनाया जाए।
5. फ़सल क्षति के कारण भुखमरी के संकट से पीडि़त किसानों को सार्वजनिक वितरण प्रणाली के ज़रिए खाद्यान्न सुरक्षा अधिनियम के तहत तत्काल मदद दी जाए। इस सन्दर्भ में सार्वजनिक वितरण प्रणाली को चुस्त-दुरुस्त किया जाए और खाद्यान्न सुरक्षा को सुनिश्चित किया जाए।
6. निजी खरीद कम्पनियों के बजाए सरकारी व सहकारी खाद्यान्न केन्द्रों के ज़रिए कम गुणवत्ता वाले गेहूँ, तिलहन व दलहन की भी खरीद की जाए; और भुगतान तत्काल किया जाए।
7. खाद्यान्न, दलहन, तिलहन सरीखे फ़सल उत्पादों का समर्थन-मूल्य उसी तरह मूल्य-सूचकांक से जोड़कर तय किया जाए, जिस आधार पर सरकारी कर्मचारियों के वेतन-भत्तों या कामगारों की मज़दूरी की राशि में बढ़ोत्तरी की जाती है।
8. प्राकृतिक आपदा या प्रशासनिक दुव्र्यवस्था के कारण किसानों की (आत्महत्या या सदमे से होने वाली) अकाल मौतों पर सरकारी तन्त्र की जवाबदेही व जि़म्मेदारी को हर हाल में सुनिश्चित किया जाए।

मार्च-अप्रैल 2015 के दौरान बेमौसम बारिश ओर ओलों की मार के चलते फ़सल की तबाही के कारण उन्नाव के उन हताष किसानों की सूची, जिन्होंने आत्महत्या कर ली, या जिनकी सदमे से मौत हो गई

क्र. मृत्यु की ख़बर किसान का नाम पता आत्महत्या/सदमे से मौत
की तारीख़

1 26 मार्च 2015 धनीराम (55वर्ष) ग्रा.-खिजौली, विकास खण्ड-सुमेरपुर सदमे से मौत
(पुत्र बिन्दा लोध) (लगातार दूसरी बार ग्रामप्रधान चुने गए थे) (लखनऊ अस्पताल ले जाते हुए)
2 27 मार्च 2015 ब्रह्माशंकर (60वर्ष) ग्रा.-सीमऊ, तहसील-हसनगंज सदमे से मौत
(खेत से घर लौटने के बाद)

3 28 मार्च 2015 रामखिलावन लोधी ग्रा.-सिकन्दरपुर करण, सदमे से मौत
(पुत्र सजीवन) तहसील-उन्नाव सदर (खेत पर फ़सल कटाई के दौरान)

4 4 अप्रैल 2015 सूरजबली (40वर्ष) ग्रा.-कुसहर बँगला, जाजामऊ, आत्महत्या
(पुत्र कामता मल्लाह) एहतेमाली (कीटनाशक पीकर)

5 11 अप्रैल 2015 सुन्दर रैदास ग्रा.-चैधरीखेड़ा, मजरा-टिकाना, आत्महत्या
थाना-असीवन

6 12 अप्रैल 2015 जगदीशचन्द्र (62वर्ष) ग्रा.-तूरी, विकासखण्ड-असोहा, सदमे से मौत
(पुत्र किशन कुशवाहा) पुरवा (खेत पर ही गिरे, अस्पताल ले जाते समय मृत्यं)

7 12 अप्रैल 2015 किशन (30वर्ष) ग्रा.-पाण्डेयपुर, सदमे से मौत
(पुत्र कमल) तहसील-बीघापुर (फ़सल कटाई के दौरान)

8 14 अप्रैल 2015 बाबूलाल ग्रा.-अर्जुनामऊ, नवाबगंज सदमे से मौत
(पुत्र सूबेदार)

9 14 अप्रैल 2015 रामजी तिवारी (40वर्ष) ग्रा.-झूलूमऊ, मजरा-विजयखेड़ा सदमे से मौत
(पुत्र जगदीश) फ़तेहपुर चैरासी

10 15 अप्रैल 2015 अँगनू (60वर्ष) ग्रा.-रामपुर, निकट जैतीपुर, नवाबगंज सदमे से मौत

11 16/17 अप्रैल ‘15 मुनेश्वर सिंह (52वर्ष) ग्रा.-जरगाँव, अचलगंज सदमे से मौत
(पुत्र कालिका सिंह) (अस्पताल में इलाज के दौरान)

12 17 अप्रैल 2015 भिखारी (50वर्ष) ग्रा.-पन्नाखेड़ा, सदमे से मौत
(पुत्र सकटू) मजरा-फि़रोज़पुर कला, सफ़ीपुर (अस्पताल ले जाते हुए)

13 18 अप्रैल 2015 विश्वनाथ (55वर्ष) ग्रा.-रायपुर, पुरवा आत्महत्या
(पुत्र अयोध्या) (फाँसी लगाकर)

14 18 अप्रैल 2015 अखिलेश (35वर्ष) ग्रा.-हटिया, फ़तेहपुर चैरासी सदमे से मौत
(पुत्र सोनेलाल)

15 18 अप्रैल 2015 चन्द्रपाल साहू (40वर्ष) ग्रा.-बछौरा, मौरावाँ आत्महत्या
(पुत्र श्यामबिहारी) (फाँसी लगाकर)

16 20 अप्रैल 2015 कालिका प्रसाद ग्रा.-मोहकमपुर, मजरा-मनिकापुर, सदमे से मौत
(पुत्र दुर्गाप्रसाद) बीघापुर

17 5 मई 2015 सूर्यप्रकाश वर्मा (50वर्ष) ग्रा.-भगवन्तखेड़ा, मजरा-धानीखेड़ा, आत्महत्या
(पुत्र चन्द्रकिशोर वर्मा) थाना-बारा सगवर, भगवन्तनगर (बाग में अँगौछे से फाँसी लगाकर)

18 6 मई 2015 शम्भू शुक्ला (60वर्ष) ग्रा.-पचोड्डा, अचलगंज सदमे से मौत
(पुत्र देवीदत्त) (कानपुर ले जाने के बाद उपचार के दौरान मृत्यु)

19 6 मई 2015 सूरजपाल (40वर्ष) ग्रा.-डडिया सुनौरा, बाँगरमऊ, सदमे से मौत
(पुत्र लीला) गंजमुरादाबाद (ट्राॅमा सेण्टर, लखनऊ ले जाते हुए मृत्यु)

20 8 मई 2015 शिवराम़ ग्रा.-माखनखेड़ा, सदमे से मौत
मजरा-रानीपुर ग्रण्ट, बाँगरमऊ

21 9 मई 2015 गंगाराम (44वर्ष) ग्रा.-सिरधरपुर एहतमाली, मजरा-गहरपुरवा, सदमे से मौत
(पुत्र टेहरी) बाँगरमऊ, गंजमुरादाबाद

22 10 मई 2015 ज्ञानेन्द्र (42वर्ष) ग्रा.-फुरसतखेड़ा, थाना-बारासगवर सदमे से मौत
(पुत्र भगवती प्रसाद) (पिता की फ़सल क्षति से सदमे के कारण)

23 17 मई 2015 रामआसरे (40वर्ष) ग्रा.-पावा, थाना-माखी आत्महत्या
(पुत्र सुन्दरलाल) (ज़हर खाकर की आत्महत्या)

’ रामखिलावन (क्र.3), रामजी तिवारी (क्र.9), व मुनेश्वर सिंह (क्र.11) की मौतों को प्रशासन/राजस्व विभाग फ़सल क्षति के कारण हुई मृत्यु नहीं मानता।