किसी पत्थर पर नाम खुदवाने को कलाम साहेब नहीं हुआ करते थे जनाब
किसी पत्थर पर नाम खुदवाने को कलाम साहेब नहीं हुआ करते थे जनाब
अगर सिंधिया ने रानी लक्ष्मी बाई और नाना साहब पेशवा का साथ दे दिया होता तो हमें आज़ाद होने के लिए अगले 90 साल का इंतज़ार न करना पड़ता.... उसी वंश का एक इंसान एक तरह से जनसंघ का संस्थापक सदस्य था.....
औरंगज़ेब से अपना बस इतना ही नाता है कि वो इतिहास में हैं और मैं ज़मीन पर…… उनके नाम पर सत्ता के गलियारे में कोई सड़क है भी.... हज़ार बार वहां से गुजरने पर भी कभी ध्यान नहीं दिया...... किसी के नाम की सड़क या किसी की मूर्ति लगा चौराहा या किसी नेता की ढेर सारी प्रतिमाओं से लदा उद्यान अपने लिए उतना ही फालतू है, जितना मेरे भूरे के लिए चूहा..... वो चूहा मार तो देता है, लेकिन कभी खाता नहीं...... और जिनके नाम पर ये सब तामझाम अकसर होते रहते हैं, उनको भी इन सब बातों से कोई मतलब नहीं .... वो अपना काम कर के चले गए.... अब उनकी आरती उतारो या उन्हें दुत्कारो उनकी बला से।
नाम राशि वाली सड़कों को लेकर ध्यान आया कि जबलपुर में रहते नई दुनिया के रिपोर्टर से सर्वे करवाया था कि नाम राशि पटों का क्या हाल है.... सर्वे में जो निकल के आया वो इस देश के वासियों की सोच के सौ फीसदी अनुकूल निकला.... यानी कहीं कोई पट अपनी साबुत हालत में नहीं था...... नामों का ये हाल कि सब प्राकृत लिपि में पहुँच चुके थे ... जो पत्थर थोड़ा बहुत बचा था, उस पर पोतड़े और गमछे सूख रहे ..... मेरी मीडिया भर से इल्तिज़ा है कि वो भी इस तरह के सर्वे करा ले..... खैर मुझे कलाम साहब के लिए अफ़सोस है .... इससे ज़्यादा कुछ नहीं..... और जहां तक औरंगज़ेब का सवाल है..... रोमिला थापर लाख इस मुग़ल बादशाह के गुणगान कर लें.... हम उनके झांसे में नहीं आने वाले।
अब उस दोपहर को याद करें जब एक चैनल पर संघ प्रबुद्ध विचारक राकेश सिन्हा और औरंगज़ेब के बदले कलाम की याचिका दायर कर चुके भाजपा सांसद महेंद्र गिरी ज्ञान बाँट रहे थे....
गिरी साहब से अपने को कोई मतलब नहीं, क्योंकि अब तो गेहूँ और घुन दोनों एक जैसे नज़र आने लगे हैं.... उन पर कोई समय बर्बाद नहीं करना..... अपने केंद्र बिंदु में हैं जनाब राकेश सिन्हा।
विचारक हैं, चेहरा मोहरा विचारणीय होना लाज़िमी है .... वो बार-बार किसी दारा की बात कर रहे थे.... अब वो दारा सिंह भी हो सकता है दाराशिकोह भी.... खैर हमारा अनुमान सही निकला.... राकेश जी दाराशिकोह की ही बात कर रहे थे..... अच्छा लगी नसीब के मारे दाराशिकोह से उनकी उन्सियत....
अब असली बात पर आया जाए..... किसी को पता है कि दाराशिकोह को सल्तनत क्यों नहीं हासिल हो पायी.... दाराशिकोह और उसके बेटे का क़त्ल किस वजह से हुआ.... शाहजहाँ को अपने आखिरी साल क़ैद में क्यों काटने पड़े.... । राजपुताना के महाराणाओं और महाराजाओं की दगाबाजी के कारण, जो उन्होंने और अफगान सेनापति ने शाहजहाँ से की, जिसकी वजह से देवरी में हुए युद्ध में दाराशिकोह हार गया और औरंगज़ेब के हाथों कैद हो गया.... ये सब राजा महाराजा शाहजहाँ के दरबार में दस हज़ारी - बीस हज़ारी मनसबदार हुआ करते थे … और युद्ध क्षेत्र में उतरने में असमर्थ बादशाह ने इन सब को दाराशिकोह का साथ देने की चिट्ठी लिखी थी लेकिन सब ने औरंगज़ेब से चुपचाप सुलह कर अपनी अपनी सेनाएं पीछे हटा लीं.....रही सही कसर शाही सेनापति ने पूरी कर दी।
अब एक बात और कि पेशवाई के चार स्तम्भ हुआ करते थे.... सिंधिया, भोंसले, गायकवाड़ और होल्कर ( गलत हूँ तो बता देना भाई)……
ज़्यादा विस्तार में नहीं जाना है.... केवल सिंधिया की ही बात करें.... 1857 में अंग्रजों से हारने की सबसे बड़ी वजह थी अंग्रेजों को सिंधिया राजवंश का साथ... अगर सिंधिया ने रानी लक्ष्मी बाई और नाना साहब पेशवा का साथ दे दिया होता तो हमें आज़ाद होने के लिए अगले 90 साल का इंतज़ार न करना पड़ता.... और न ही रानी लक्ष्मी बाई मारी जातीं … इसलिए आज भी झांसी वाले ग्वालियर के लोगों से रिश्ते नहीं बांधते.... उसी वंश का एक इंसान एक तरह से जनसंघ का संस्थापक सदस्य था.....
सही बात तो यह है कि अंग्रेजों को लाने वाले सारे देशद्रोहियों ने आज़ाद भारत में जम कर मलाई काटी और काट रहे हैं …अंग्रेज, हिन्दू राजाओं के दुश्मन तो कतई नहीं थे, क्योंकि इसलिए कोई राजपूत राजा अंग्रेजों से नहीं लड़ा कम से कम देश को बचाने के नाम पर.... अगर अंग्रेजों से कोई लड़ा तो वो थे मराठा, जो बाद में कंफ्यूज हो कर बिखर गए या हैदर अली और उसका बेटा टीपू सुलतान।
राजीव मित्तल


