कुछ का साथ, कुछ का विकास, बाकी का विनाश
नोटबंदी की खबरों में बैंकों और एटीएम के आगे लगी लंबी कतारों के दृश्य देख-देखकर परेशान हुए लोगों ने कर्नाटक में रेड्डी बंधुओं के घर की भव्य शादी भी देख ली, जिसमें लगभग 5 सौ करोड़ रुपए खर्च हुए थे।

रेड्डी बंधु भाजपा से जुड़े नेता और मंत्री रहे हैं, उनकी रईसी के चर्चे पहले भी खूब हुए हैं, तो नोटों की बंदी और बिना बात की मंदी के दौर में एक चर्चा और सही।

अकेले रेड्डी परिवार ही क्यों, बड़े अखबारों के पेज थ्री में छपी खबरों को देखकर भी अनुमान लगाया जा सकता है कि नोटबंदी के फैसले से कौन प्रभावित है और कौन नहीं।
कहीं सर्दी के मौसम को मात देने वाली कॉकटेल पार्टियों की तस्वीरें हैं, कहीं फैशन शो की तो कहीं गोल्फ या पोलो मैच की।
फैशन की दुनिया में नयी-नयी परिभाषाएं जोडऩे वाले ये कौन लोग हैं? ये किस हिंदुस्तान में रहते हैं? क्या इनके पास कोई जमा-पूंजी नहीं है, जिसे बदलवाने की इन्हें चिंता हो? या इनकी जेबों में पहले से नए नोट भरे हुए हैं, इसलिए ये एटीएम के आगे नहींखड़े हैं?

क्या अपने आसपास हो रही दर्दनाक घटनाओं से ये बिलकुल बेखबर हैं और इसलिए इतने मजे में जाम हाथ में लिए कहीं सेल्फी ले रहे हैं, कहीं कैमरों के आगे पोज़ दे रहे हैं?

क्या मोदी जी के स्वनाम एप के जरिए हुए सर्वे में इन लोगों ने भी अपनी राय भेजी होगी? या फिर इन्हें पहले से पता है कि नोटबंदी का निर्णय किसके लिए है और किसके हित के लिए है?
इन सारे सवालों के जवाब जनता अपने-अपने तरीके से ढूंढ ले, समझ लें और साथ ही कुछ खास खबरों पर अपनी नजरें भी दौड़ा लें, जो इस प्रकार हैं-
देश की कुल संपत्ति के 58.4 प्रतिशत पर एक प्रतिशत सबसे अमीर लोगों का कब्जा है। अगर 10 प्रतिशत सबसे अमीर भारतीयों की बात करें तो उनके पास देश की कुल संपत्ति का 80.7 प्रतिशत कब्जा है और देश की 50 प्रतिशत गरीब जनता के हिस्से मात्र 2.1 प्रतिशत हिस्सा ही आया है।

इसे कहते हैं कुछ का साथ, कुछ का विकास, बाकी का विनाश।

संपत्ति में प्रतिशत की हिस्सेदारी के ये आंकड़े रेटिंग एजेंसी क्रेडिट सुइस ग्रुप एजी ने दिए हैं।

एजेंसी के अनुसार, 2014 में सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों के पास 49 प्रतिशत था, जबकि पिछले साल यह आंकड़ा 53 प्रतिशत था और एक साल में 5 प्रतिशत और बढ़ गया है।

वर्ष 2000 में सबसे अमीर एक प्रतिशत लोगों की संपत्ति, देश की कुल संपत्ति में महज 36.8 प्रतिशत थी, जो पिछले 16 साल में एक तिहाई से ज्यादा बढ़ी है।
रिपोर्ट के मुताबिक, अगर अमीरों और गरीबों की संपत्ति में तुलना करें तो भारत सबसे ज्यादा आर्थिक असमानता वाले देशों में है।
दूसरी खबर- नोटबंदी के बाद पेटीएम के ग्राहकों की संख्या में 5 सौ प्रतिशत की बढ़ोत्तरी हुई है। इस ऐप के जरिए रोजाना के लेन-देन में 140 प्रतिशत की वृद्धि हुई है, जिससे कंपनी को काफी मुनाफा हो रहा है।

पेटीएम शीघ्र ही अपना बैंक खोलने की योजना बना रहा है।

इधर एयरटेल ने अपना पहला पेमेंट बैंक प्रारंभ कर दिया है। यह बैंक बचत खाते पर 7.25 प्रतिशत की दर से ब्याज देगा, जबकि बाकी बैंक अभी 4 प्रतिशत ब्याज देते हैं।
एयरटेल इस बैंक के जरिए डिजिटल पेमेंट सिस्टम को बढ़ावा देगा।
यानी अब निजी बैंकिंग क्षेत्र को दो प्रतिस्पर्द्धी और मिल गए, जिनकी आपसी प्रतिद्वंद्विता में ग्राहकों को थोड़ा फायदा हो सकता है, लेकिन सरकारी, सहकारी बैंकों का भविष्य क्या होगा, यह देखने वाली बात है।

तीसरी खबर- देश की 90 प्रतिशत से अधिक जनता प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के नोटबंदी के फैसले के साथ है, यह सुर्खियां खूब चल रही हैं। देश की अनुमानित जनसंख्या 125 करोड़ है, उस हिसाब से लगभग 112 करोड़ लोगों को नोटबंदी के समर्थन में होना चाहिए। पर सच यह है कि प्रधानमंत्री ने अपने नाम के ऐप यानी एनएम ऐप के जरिए काला धन, भ्रष्टाचार, नोटबंदी आदि पर जो सवाल पूछे, उसके जवाब लगभग 5 लाख लोगों से लिए गए और इन लोगों में 90 प्रतिशत इस फैसले के साथ हैं।
तो क्या प्रधानमंत्री के लिए देश की जनता का मतलब ये 5-6 लाख लोग हैं और शेष जनता उनके लिए अस्तित्वहीन है?
वैसे अगर इतने लोग भी नरेन्द्र मोदी के साथ हैं, तो यह संख्या उससे बहुत कम है, जितने का दावा भाजपा अपने सदस्य संख्या को लेकर करती है।

देशबन्धु का संपादकीय

देशबन्धु से साभार