कुछ तो छूट रहा है हमारी शिक्षा व्यवस्था में
कुछ तो छूट रहा है हमारी शिक्षा व्यवस्था में
व्यावसायिक परीक्षा मंडल नाम का एक पूरा का पूरा तन्त्र एक राज्य में घोर भ्रष्टाचार में लिप्त पाया जाता है, कहीं कोई ब्यूरोक्रेट सोने के बिस्किट रखता है तो कहीं पुलिस के बड़े अधिकारी ही दंगों में लिप्त पाए जाते हैं, कहीं कोई अधिकारी अपने ही महकमे की महिला अधिकारी से छेड़खानी करता है तो कहीं एक मीडिया का बन्दा फर्ज़ी इंटरव्यू कराता है, कहीं कोई चीफ़ इंजीनियर हजारों करोड़ के घोटाले में लिप्त होता है तो कहीं कोई नेता भ्रामक बातें और भड़काऊ ब्यान देता है. यही नहीं कहीं कोई अपनी पढ़ाई लिखाई या नौकरी का सौदा करके जम कर दहेज लेता है. इतने और इससे ज़्यादा जितने भी उदाहरण दिए जाएँ वे सभी कम लगेंगे हमारे देश को चलाने वाले स्तम्भों के भ्रष्ट, जातिवादी, लिंगभेद्वादी, साम्प्रदायिक व पूर्वाग्रह ग्रसित होने को दर्शाने के लिए. असल में हर गली कूचे में हमें ऐसे उदाहरण मिल जाएँगे जो हमें सोचने पर मजबूर कर देंगे कि हमारी शिक्षा व्यवस्था आखिर क्या उत्पाद बना रही है.
क्या ऊपर दिए गए उदाहरण या जो हम आए दिन समाचारों, अख़बारों में देखते सुनते हैं वो भ्रष्ट अधिकारी क्या पढ़े लिखे नहीं हैं, क्या आई. ए. एस, आई. पी. एस में पढ़े लिखे लोग नहीं होते?, क्या इतना बड़ा परीक्षा मंडल पढ़े लिखे और रसूख वालों का गढ़ नहीं था? क्या वे वैसे ही लोग नहीं होते हैं जिन्हें समाज ऊंचा दर्जा देता है और मेहनतकश के मुकाबले इन्हें ज़्यादा उन्नत समझता है, पर क्या व्यापम जैसे उदाहरणों के पढ़े लिखे चोरों से अच्छा एक ऐसा मेहनतकश नहीं है जो एक दिन की कमाई अपनी मेहनत की खाता है और सो जाता है. मगर फिर भी जब कोई अधिकारी सामने आता है तो समाज का नजरिया ही दूसरा रहता है चाहे वो कितना ही छुपा भ्रष्ट क्यों न हो.
आखिर ऐसी क्या बात है जो हमारी शिक्षा व्यवस्था नम्बरों से खेलने, तथ्यों के जानकार बड़ी बड़ी डिग्री वाले तो निकाल रही है मगर सामजिक मूल्यों और समतावादी समाज के निर्माण में लोगों में कहीं कोई चूक रह जा रही है. नेताओं की तो बात खैर छोड़ ही दीजिए क्योंकि जिस तरह से दबंग, जाति या सम्प्रदाय के नेता, या फिर बड़े ओहदे या घरानों वाले लोग ही नेता के रूप में अधिकतर विराजमान हैं तो उस पर बहस करना एक अलग मुद्दा हो जाएगा मगर जो लोग शिक्षा के बड़े माने जाने वाले इम्तेहानों में परचम लगा कर आते हैं उनमें अगर थोड़े भी ऐसे लोग आते हैं जो समतावादी समाज के निर्माण में और रोड़े ही डालते हैं तो फिर काफी दिक्कत है और हमें सोचना चाहिए कि आखिर और क्या ऐसा हमें अपनी शिक्षा में समाहित करना चाहिए जो इंसान को एक समता, एकता व न्यायपूर्वक समाज की ओर ले जाए ना कि भ्रष्ट, जाति और सम्प्रदाय में बंटे पढ़े लिखे रूढ़िवादियों के बीच जकड़ की ओर.
आखिर व्यापम जैसों को पैसा देता कौन है, अगर हम शुरुआत ना करें तो उनकी दुकानें अपने आप तो चल नहीं सकतीं, आखिर एक ड्राइविंग लाइसेंस बनवाने से लेकर, एडमिशन कराने तक, पासपोर्ट बनाने से, ट्रेन की सीट लेने तक हम ही तो हैं जो भ्रष्ट अफ़सरों को मौका देते हैं, हम भी उसी भ्रष्ट खेप की उपज हैं जो हर काम को आसान करने कराने में बखूबी भ्रष्ट हो जाती है पर किसी बड़े घोटाले पर ऐसे चौंक कर भोली बन जाती है जैसे खुद दूध में धुली हो.
बड़े घोटाले यकीनन आपत्तिजनक हैं मगर शुरुआत हमें अपने गिरेबानों में झांककर करनी चाहिए, हम उसी भ्रष्ट तन्त्र का हिस्सा हैं जो हमारे सहारे के बिना चल नहीं सकता. आखिर नौकरियां मिलती किसको हैं घूस देने पर?, कौन थे जो व्यापम का फायदा उठा रहे थे? क्या वो किसी दूसरी दुनिया के लोग थे या दूसरी दुनिया के हैं जो घोटाले कर रहे हैं, पेपर लीक कर रहे हैं, नजर घुमा कर देखेंगे तो हमारे आस पास ही कई मिल जाएंगे जो रिश्वत खोरी के बल पर अमीर बने होंगे या घूस के बल पर नौकरी पाकर काबिलियत की शेखी झाड़ रहे होंगे.
आखिर शिक्षा के उद्देश्य क्या हैं?
क्या हमारे स्कूली तन्त्र की शिक्षा सिवाय प्रतिस्पर्धा जगाने के या खोखली नैतिकता बताने के बजाय इमानदारी से संविधान में दी गए मूल्यों व लोकतान्त्रिक समता मूलक, तर्क आधारित, प्रगतिशील, साम्प्रदायिकता, पितृसत्तात्मकता या जातिवाद विरोधी व सभी इंसानों को समान रूप से देखने या सबकी बराबरी व समता समानता की बातों को अच्छे से विद्यार्थियों में समाहित करती है या वे पढ़ने लिखने के बाद भी पूर्वाग्रहों से ग्रसित तर्कहीन बातें करते दीखते हैं. यह बातें हमें बड़े पैमाने पर सोचनी होगी कि शिक्षा को सिर्फ कंटेंट या कहाँ किसने कब क्या किया, क्या हुआ, किसने क्या खोजा जानने के साथ साथ प्रश्न करने वाले, तर्कों पर अपना मत बनाने वाले व सही गलत को बिना पूर्वाग्रहों के जाँचने वाले विद्यार्थी निकालने होंगे. ऐसा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि स्कूलों की जो अवधारणा आज के समाज में है उसका कार्य यही होना चाहिए अन्यथा मैकॉले की शिक्षा प्रणाली जो कि अंग्रेज़ों के अपने फ़ायदे के लिए थी और जिसका उद्देश्य कम्पनी के धंधे के लिए सस्ते मानव उत्पाद तैयार करना था वह आज भी सफ़ल होती दिखेगी, जबकि शिक्षा का सही उद्देश्य तो ऐसे ज़िम्मेदार नागरिक तैयार करना है जो गलत के खिलाफ़ प्रश्न करे, संवैधानिक मूल्यों पर आधारित एक सभ्य और समतावादी समाज का निर्माण करें. कम से कम आज के भारत में तो शिक्षा और स्कूलों से शायद समाज की यही अपेक्षा है. वरना एक बात तो तय है कि सिर्फ़ पढ़े लिखे होने मतलब डिग्री पा लेने से कुछ नहीं होगा जब तक हम कुतर्क का साथ देंगे.
मोहम्मद ज़फ़र


