उज्ज्वल भट्टाचार्या
कभी-कभी कुछ बातें ज़ुबान से फ़िसल जाती है। सरसरी ढंग से मोदी की यह टिप्पणी भी ऐसी फ़िसलन की मिसाल है। मुझे पूरा यकीन है कि वह ऐसा नहीं कहना चाहते थे। और मुझे पूरा यकीन है कि यह उनके अंदर की बात है।
1998 में मैं अशोक रोड गया हुआ था, गोविंदाचार्य से साक्षात्कार के लिये। मिलनसार व्यक्ति हैं, टेप रिकॉर्डर चालू करने से पहले काफ़ी लंबी बातचीत हुई। मैंने उनसे पूछा था कि भाजपा जनता के प्रबुद्ध वर्ग में व्यापक रूप से फैली हुई इस धारणा से कैसे निपटेगी कि उनका सत्ता में आना लोकतंत्र की स्वाभाविक परिपाटी से कुछ अलग है- वह एक "सांस्कृतिक क्रांति" है ? गोविंद जी ने पलटकर पूछा- सांस्कृतिक क्रांति चीन की तरह ? मैंने अपने सवाल को स्पष्ट करते हुए कहा था कि क्रांति से मेरा आशय यह है कि भारत के अब तक के सांस्कृतिक ताने-बाने को बुनियादी तौर पर बदल दिया जाएगा।
मुस्कराते हुए गोविंद जी ने पूछा था- आप क्या समझते हैं कि अटल जी नेहरू के भारत को बदल देंगे ? फिर उन्होंने ज़ोर देते हुए कहा था- भाजपा एक बहुलवादी लोकतांत्रिक पार्टी है। यहां किसी एक की नहीं चलती है।
आज जब मैं स्थिति पर नज़र डालता हूं तो मुझे दो बातें दिखाई देती हैं- एक अरसे से गांधी-नेहरू के भारत के ख़िलाफ़ एक वैचारिक जिहाद या धर्मयुद्ध छेड़ा गया है। मोदी एक ऐसे नेता हैं, जो पंरपरा को अत्यधिक महत्व दे रहे हैं और वह बड़ी सावधानी से हमारे इंद्रधनुषी राष्ट्रीय आंदोलन के व्यापक आयाम से अपनी परंपरा को चुन रहे हैं- कुछ नेताओं को आगे बढ़ाया जा रहा है, और उससे भी बड़ी बात कि कुछ नेताओं पर ख़ामोशी बरती जा रही है, या उन्हें फ़ोकस के बाहर रखा जा रहा है। ऐसे नेताओं में गांधी और नेहरू प्रमुख हैं।
दूसरी बात यह है कि भाजपा आज कतई बहुलवादी लोकतांत्रिक पार्टी नहीं रह गई है, उसे बैंक के निदेशक मंडल की तरह चलाया जा रहा है। फ़र्क़ सिर्फ़ इतना है कि वहां किसी निदेशक मंडल की नहीं, बल्कि सिर्फ़ एक की चलती है।
कुछ लोगों को तो डरना ही पड़ेगा- इस वक्तव्य के साथ स्पष्ट कर दिया गया है कि यह पिछले चुनावों जैसा कोई साधारण चुनाव नहीं है, यह भारत की संसदीय लोकतांत्रिक परंपरा की निरंतरता नहीं है, बल्कि यह एक "क्रांति" है, जिसके बाद इस देश की सारी समस्यायें दूर हो जाएंगी, देश बदल जाएगा, आज़ादी के बाद से जैसा चल रहा था, उसमें आमूल परिवर्तन आ जाएगा।
और इस परिवर्तन के भामाशाह वही घराने हैं, अब तक की सरकारें जिनके इशारों पर चल रही थीं।
हां, डरने की वजह है।
मैं अब तक भारत की स्थिति के संदर्भ में फ़ासीवाद शब्द का प्रयोग नहीं कर रहा था। इस सिलसिले में अक्सर वामपंथी मित्रों से बहस हो चुकी है। अब मुझे लग रहा है कि इस शब्द के प्रयोग पर मेरी आपत्ति सिर्फ़ एक अकादमिक आपत्ति है। स्थिति की गंभीरता फ़ासीवाद जैसी ही है।
उज्ज्वल भट्टाचार्या, लेखक वरिष्ठ पत्रकार और राजनीतिक चिंतक हैं, उन्होंने लंबा समय रेडियो बर्लिन एवं डायचे वैले में गुजारा है।