केंद्र के निजीकरण एजेंडे का कुप्रभाव : झारखंड के चंद्रपुरा थर्मल पावर स्टेशन के दो यूनिट बंद
केंद्र के निजीकरण एजेंडे का कुप्रभाव : झारखंड के चंद्रपुरा थर्मल पावर स्टेशन के दो यूनिट बंद
रोजगार का गंभीर संकट
देश के सार्वजनिक क्षेत्र के औद्योगिक प्रतिष्ठानों में हाल के दिनों में जिस तरह से घाटा दिखाकर उसकी उत्पादन क्षमता एंव कार्य क्षमता में गिरावट दर्शाकर उसे बंद करने की प्रक्रिया चल रही है, उससे इतना तो साफ हो जाता है कि यह केंद्र की सरकार पूरी तरह से निजीकरण के एजेंडे पर काम कर रही है। जिसका जीता जागता उदाहरण झारखंड के बोकारो जिला स्थित चंद्रपूरा र्थर्मल पावर स्टेशन (सी.टी.पी.एस) है, जिसके दो यूनिट बंद कर दिये गये तथा तीसरे यूनिट को बंद करने की कोशिश जारी है।
दो यूनिट के बंद होने से ही प्लांट के कामगार जहां बेरोजगार हो गए हैं वहीं उनके आर्थिक आधार बंद होने से क्षेत्र के व्यवसायिक संस्थानों सहित छोटे-मोटे कारोबार करके अपना व अपने परिवार का पेट पालने वाले पर भी रोजी-रोटी का संकट गहरा गया है।
आजादी के बाद अमेरिका की टेनेसी वैली ऑथरिटी की तर्ज पर 7 जुलाई 1948 को दामोदर घाटी निगम (डी.वी.सी) की स्थापना हुई, जिसकी मूल अवधारणा थी बाढ़ की त्रास्दी से बचाव। वहीं दूसरी तरफ नदी पर जगह-जगह बांध बनाकर उसके बहाव की गति को कम करके पानी के प्रवाह से विद्युत उत्पादन करना। जो आज र्थमल और हाइडल की 30 यूनिटों से 7787 मेगावाट बिजली उत्पादित हो रही है। मगर डी.वी.सी. प्रबंधन द्वारा बार-बार यह रोना रोया जा रहा है कि उत्पादित बिजली के खरीदार नहीं होने के कारण डी.वी.सी. उत्पादन आधा करने पर मजबूर है। वहीं वर्षों पुरानी यूनिटों में पुराने टेक्नॉलोजी की वजह से उत्पादन लागत अधिक हो रहा है। इसलिए कुछ यूनिट बंद किये जाएंगे। जिसके तहत ही चंद्रपुरा थर्मल पावर स्टेशन के दो यूनिटों को बंद कर दिया गया है तथा तीसरी यूनिट को बंद करने की योजना पर काम हो रहा है, जिसे नवंबर में बंद कर दिया जाएगा।
चंद्रपुरा के तीन यूनिट में लगभग 2500 मजदूर हैं, जिसमें स्थायी मजदूर लगभग 1000, सप्लाई मजदूर 380 तथा ए.आर.सी. 700 एंव ए.एम.सी. लगभग 400 मजदूर हैं।
बताते चलें कि स्थाई मजदूरों को कंपनी एक्ट के तमाम मानकों के तहत वेतन एवं अन्य सुविधाएं हासिल हैं। जबकि सप्लाई मजदूर का वेतन त्रिपक्षीय समझौता 7 दिसम्बर 2011 के तहत डीवीसी के ग्रुप डी के बेसिक वेतन से 50 रू0 कम है। वहीं उन्हें महंगाई भत्ता प्राप्त नहीं हैं, जबकि उनके अवकाश की आयु सीमा 60 साल है। वैसे सप्लाई मजदूर शुद्ध ठेका मजदूर हैं, मगर उनका वेतन डी.वी.सी. देता है और वे अपने कार्यकाल में कई ठेकेदारों के अंदर काम करते रहते हैं।
ए.आर.सी. यानी एनुअल रेट कान्टेक्ट और ए.एम.सी. यानी एनुअल मेंटेनेन्स कान्टेक्ट दोनों ठेकेदार के अंदर दैनिक मजदूर होते हैं। ए.आर.सी. की मजदूरी ठेकेदार देता है जो न्यूनतम मजदूरी नहीं होता है। कंपनी किसी काम का ठेका ठेकेदार को देती है जो काम पर आधारित होता है और उसी पैसे में ठेकेदार द्वारा मजदूरी को दिया जाता हैं।
एएमसी में कम्पनी ठेकेदार को मजदूरों की संख्या के हिसाब से न्यूनतम मजदूरी के दर पर पैसा देती है।
दो यूनिट बंद होने के बाद 85 मजदूर पिछले छः माह से पूरी तरह बेरोजगार हो गये हैं और उनके परिवार वालों को रोटी के लाले पड़े हुए हैं।
मुहम्मद अजहरूद्दीन 12 साल से ठेका मजदूर था जिसे फरवरी 2017 को हटा दिया गया है।
वही हालत अशोक राणा की है, जो 2006 से यहां ठेका मजदूर था और आज बेराजगार हो गया है।
संजय कुमार गंझू बताते हैं कि 2012 से 35 मजदूर केवल गेटपास की सुविधा के तरह कंपनी में काम कर रहे हैं, उन्हें जनवरी 2017 में बिठा दिया गया था, मगर मजदूर संगठन समिति ने मजदूरों को आंदोलित किया तो उन्हें 15-15 दिन का काम दिया जा रहा है, इन्हें प्लांट के भीतर कोई सुविधा उपलब्ध नहीं है, ठेकेदार मनमानी तरीके से काम करवाता है।
आनन्द महतो का कहना है, कि ठेकेदार अंग्रेजों की तरह हमारा श्रम शोषण करता रहा है, ठेकेदार के वाईसी नहीं बनवा रहा है, जिसके कारण पीएफ नहीं कट रहा है।
वहीं सरफराज आलम बताते हैं कि मजदूरों के वेतन की कोर्ट निर्धारित तिथि नहीं है। मजदूरों की छंटनी का कोई नियम नहीं है। छंटनी का कोई पैनल लिस्ट नहीं है। सब मनमाने तरीके से चल रहा है। वे बताते हैं कि कंपनी प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र तो खोल रखा है मगर चिकित्सा की कोई सुविधा नहीं है। न तो एम्बुलेन्स की सुविधा है न ही डाक्टर की। दवा तो है ही नहीं। जबकि ईएसआईसी के नाम पर कं0 द्वारा प्रति मजदूर 6 प्रतिशत की राशि ठेकेदार द्वारा जमा कराई जाती है जिसमें मजदूरों की मजदूरी से 1.75 फीसदी तथा ठेकेदारों से 4.25 फीसदी राशि की कटौती की जाती है।
यूनिट बंद होने के बाद क्षेत्र के कई मजदूर यूनियन मजदूरों को अलग-अलग गुटों में बांट रखा है जिसके कारण यूनियन मजदूरों में एकता के अभाव का लाभ कंपनी को मिल रहा है। इन मजदूर यूनियनों का डी.वी.सी. प्रबंधन के अच्छे रिश्ते भी हैं जिसका हवाला देकर यह यूनियन लीडर मजदूरों को बरगलाने में सफल रहते हे कि वह प्रबंधन से सिफारिश करके उसे पुनः काम पर रखवा देंगे।
क्षेत्र की मजदूर संगठन समिति ने मजदूरों को सावधान किया है कि वे प्रबंधन के दलालों से सावधान होकर आंदोलन करें तभी उन्हें न्याय मिल सकता है।
मसंस के महासचिव बच्चा सिंह कहते हैं कि अधिकार आंदोलन व संघर्ष से ही मिल सकता है प्रबंधन की दलाली से नहीं।
सीटीपीएस के प्रोजेक्ट हेड सह मुख्य अभियंता बीएन साह मानते हैं कि प्लांट बंदी से कन्ट्रेक्टर के अधीन काम करने वाले ठेका मजदूर प्रभावित होंगे।
बीएन साह के बयान से उतना तो साफ हो जाता है कि प्लांट के अधिकारी भी मजदूरों की त्रासदी को समझते हैं मगर खुलकर नहीं बोल सकते क्योंकि कहीं न कहीं शासन तंत्र का उन पर दबाव है, जो इस बात का संकेत है कि सरकार का निर्देश है कि सार्वजनिक संस्थानों को किसी भी हाल में बंद कर देना है और उसे औने-पौने दाम पर कारपोरेट जगत् की निजी क्षेत्र की कंपनियों के हवाले कर देना है। जिसका प्रमाण यह है कि एक तरफ डी.वी.सी. अपने उत्पादन को खरीदार नहीं मिलने का रोना रो रहा है जबकि निजी क्षेत्र की कंपनियों के उत्पादन के खरीदारों की एक लंबी कतार है।
मसंस के महासचिव बच्चा सिंह बताते हैं कि सार्वजनिक क्षेत्र के उद्योगों को निजी हाथों में देने की साजिश को विफल करने की ताकत केवल मजदूरों में है जो लगातार संघर्षों एंव आंदोलन से ही संभव है। उन्होंने मजदूरों केा प्रबंधन के दलाल संगठनों से सावधान रहने का भी अह्वान किया है।


