कैशलेस-यदि श्रम के लिये अर्थव्यवस्था में जगह नहीं तो फिर भीख - सड़कों पर या सरकार से
कैशलेस-यदि श्रम के लिये अर्थव्यवस्था में जगह नहीं तो फिर भीख - सड़कों पर या सरकार से
कैशलेस-यदि श्रम के लिये अर्थव्यवस्था में जगह नहीं तो फिर भीख - सड़कों पर या सरकार से
आलीराजपुर के आदिवासियों के कैशलेस जीवन की झलकियां
Amit Bhatnagar
काले धन के बादल पैंतालिस दिनों से देश पर मंडरा रहे हैं। हर इंसान लाइन में खड़ा होना सीख गया। साथ ही कुछ नये शब्द भी हमारी ज़ुबान पर चढ़ गये हैं, जैसे कैशलेस।
कैशलेस अर्थव्यवस्था सुनकर मेरे दिमाग में कुछ और ही कहानी और तीस साल पुराने बिम्ब उपजते हैं।
ये कहानी आलीराजपुर के आदिवासी गाँवों की है जहाँ हमने चौदह वर्ष लगभग कैशलेस तरीके से बिताये।
कैशलेस मतलब सच में बिना कैश के।
यह कहानी कहने का मन हुआ। इसलिये नहीं कि ये आदर्श है, बस यूँ ही। वहाँ लोगों के दिन और जीवन सवेरे डब्बा लेकर पहाड़ियों के बीच कहीं बैठ कर पेट खाली कर लिया। फिर नीचे नदी पर जाकर, दाँतुन और मुँह धो लेना। दाँतुन आप अपने स्वाद अनुसार चुन सकते हैं - जामुन, करंज, कौतरिया या बबूल। ये सभी ऐस्टिंजेन्ट होते हैं। मुँह को बंधा हुआ महसूस करते हैं, इन्हे चबाने के बाद।
चाय के पैसे नहीं हैं तो चलेगा। रोज़ कौन पीता है चाय पीता है ? और पैसे नहीं हैं, तो क्या? पड़ोसी तो हैं। सही समय पता है तो जाकर बैठने से चाय मिल ही जायेगी। रात की कुछ रोटी बची है तो सेंक कर खा सकते हैं।
सवेरे सवेरे, अंधेरे में ही, पहला मुर्गा बोलने पर औरतें, जुवार के दानों को घट्टी में पीस कर आटा बना लेती हैं। दाल के टुकड़े करने के लिये भी घरों में एक छोटी घट्टी होती है। अपने खेत में पकी जुवार की रोटी और उड़द या तूवर की दाल का खाना हो गया। अगर घर में जानवर हों तो घी भी मिल सकता है। दही से भी रोटी खा सकते हैं, लाल मिर्च और लहसुन की चटनी डाल कर। मिरची भी रखी है घर में सागवान के पत्तों के छीके में। दाल में खेत से तोड़ी झरकली की भाजी या इमली की कच्ची पत्तियाँ हों तो स्वाद में और चार चाँद लग जायेंगे।
रोज़ रोज़ दाल तो नहीं खायेंगे। हाँ तो महिलाएँ कुछ न कुछ भाजी इकठ्ठा कर लेती थीं, जंगल से लकड़ी लाने के साथ या नदी के किनारे से या खेत से।
कभी बच्चे नदी से छोटी मछलियाँ या केकड़े पकड़ लाते थे। इन्हे छाँछ में जुवार का आटा, हल्दी डाल कर खाटो बना लिया जाता था। आलू प्याज़ लाने पड़ते थे दुकान से। हाट के दिन कुछ लोग सबज़ी लाते थे। वैसे सबज़ी खाने का खास रिवाज़ नहीं था। बैंगन और मिर्च लगभग सभी लोग लगाते थे। वालोर और देसी कद्दू की बेलें भी हर घर के बाहर या छत पर चढ़ी होती थीं। किसी किसी की वाड़ में कंटोले की बेल भी होती थी।
नर्मदा किनारे के गाँवों में तो हर घर के बच्चों को मछली पकड़ना आता ही था।
अनाज भी कई तरह के मिल जाते थे खाने को - जुवार, मक्का, बाजरा, देसी चावल, भादी।
अब तक, खाना बनाने के लिये नमक, हल्दी और कुछ मसाला बाज़ार से लाना पड़ा है। कभी- कभी लहसुन, प्याज़ और आलू भी। अधिकतर यह सामान महुए देकर बदले में ले लिया जाता था।
पर थाली, कटोरी, चम्मच भी तो चाहिये? मिट्टी की थालियों में बहुत बार खाया है। कई बार जुवार या मक्का की बड़ी सी रोटी पर ही रख कर खा लेते थे। पर हाँ थाली लानी पड़ती थी - काँसे की। बाद में एल्यूमिनियम की।
खाना पकाने के प्रायः सभी बर्तन मिट्टी के ही होते थे। कुछ गाँवों में तो इन्हें भी औरतें ही बना लेती थीं। सब्ज़ी बनाते समय हिलाने के लिये लकड़ी की चम्मच। चूल्हा भी औरतें खुद ही बना लेती थीं। खाना हाथ से ही होता था। कटोरी कभी नहीं देखी किसी घर में। पर कुम्हार भी थे जो मिट्टी के बर्तन बनाते थे। पानी रखने के बड़े मटके या हाँडे तो लाने ही पड़ते थे।
इस समय तक इतना प्रचलन हो चुका था पैसे का, कि कुम्हार को पैसे देकर बर्तन खरीदे जाते थे।
रात का खाना भी इसी तरह हो जायेगा।
अनाज पीसने की घट्टी प्रायः घरों में सबसे महॅंगी वस्तु होती थी। इसे घटघड़े बनाते थे। किसी हाट की जगह पर या सड़क के पास के गाँव में इनका पड़ाव रहता था। जिसे घट्टी चाहिये वो इन्हे बता देता था और ये बनाकर, अपने गधों पर लाद कर घर जाकर दे देते थे। रूपयों में इसकी कीमत उस समय लगभग अस्सी रूप्ये थी। इसके बदले लोग अनाज और मुर्गी दे देते थे। कुछ लोग पैसे देते थे। मुर्गी तो घटघड़े खाते ही थे, घर पर।
आप पूछेंगे कि अनाज, दालें आदि की खेती करने के लिये तो कुछ चाहिये।
हाँ खेत चाहिये जो थोड़ा बहुत है। बैल चाहियें जो भी घर पर पाले हुए हैं। हल, बखर आदि चाहियें जो लकड़ी के थे और खुद या गाँव में ही कोई बना देता था। उसके बदले में उसे रोटी खिलाते थे या अनाज दे देते थे। बहुत हुआ तो दो पाँच रूपये दे दिये। कभी उसका काम पड़ेगा तो हम भी जायेंगे। रस्सी भी तो चाहिये हल बैल को बाँधने के लिये - वो तो खेत में उगे सण से घर के बूढ़े लोग गर्मियों के दिनों में बनाते हैं। हाँ, हल के लिये लोहे का फाव चाहिये और कुलपे का नीचे का हिस्सा भी लोहे का है। इनके लिये ज़रूर लोहार के पास जाना पड़ेगा।
तो कुम्हार, लुहार और सुतार जुड़ गये हैं जीवन से और हाँ घटगढ़े भी।
नहाना तो रह ही गया। ओह! आप लोगों को रोज़ नहाने की आदत है! तो नदी में नहा सकते हैं। हाँ औरतें भी। गर्मियों में भी कहीं कहीं पानी रहता है डाबरे में। साबुन की ज़रूरत नहीं है। पत्थर से शरीर को रगड़ सकते हैं। बालों को काली मिट्टी या छाँछ से धो सकते हैं। छाँछ का एक्सट्रा फ़ायदा है कि जुएँ भी निकल जाती हैं। इसके कई विकल्प हैं। डंगला पौधे की जड़ें, जिनको लगाने के बाद भीनी भीनी सी खुश्बू भी आती हैं। नदी नहीं जाना तो सरकार नें कहीं कहीं हैण्डपम्प लगा दिये थे।
सर्दियों में भी यदि नहाने का शौक है तो लकड़ी से पानी गरम कर सकते हैं। हम्म् ... इसके लिये कोई बर्तन होना पड़ेगा। मिट्टी के बर्तन में पानी गरम करते हुए नहीं देखा। प्रायः सभी घरों में एक बड़ी एल्यूमिनियम की हाँडी या पतीला तो होती है। छाँछ करने के लिये या महुए की शराब बनाने के लिये। नहीं तो पड़ोसी के घर मिल जायेगी।
लकड़ी जंगल से लानी पड़ती थी। बारिश के मौसम में नदी नालों में बहकर आती है उसे भी इकठ्ठा कर सकते हैं।
शराब बनाने का ज़िक्र आया। यह कैसे बनेगी ? महुआ तो अपने ही पेड़ों से इकठ्ठा किया हुआ है। महुआ सड़ाने के लिये मिट्टी का ही एक बड़ा बर्तन होता था। सड़ने के बाद उबालने के लिये एक और बड़ा बर्तन चाहिये। कहीं कहीं यह भी मिट्टी का हाँडा ही होता था। बाद में यह एल्यूमिनियम का होने लगा। उसके ऊपर भाप इकट्ठी करने के लिये मिट्टी की हाँडी और लंबा बाँस चाहिये। ऐसे बड़े बर्तन या कभी कभार काम पड़ने वाली चीज़ें गाँव में दो चार लोगों के पास होती थीं जिनसे माँग कर काम चला लिया जाता था।
चलो अब बहुत हुआ सो जाते हैं।
गोबर - मिट्टी से लिपी ज़मीन पर ही सोना है। बिछाने के लिये पुराने कपड़ों से गोदड़ी बनाई है। ओढ़ने के लिये भी ऐसी ही गोदड़ी है। अच्छा तो पुराने कपड़े कभी तो नये होंगे ? हाँ कपड़े लाने पड़ते थे बाज़ार से। पुराने लोग तो कुष्टा पहनते थे, लंगोट की जगह। और ऊपर एक धोती लपेटते या बाँधते थे।
औरतों के कपड़े - घाघरा, ओढ़नी आदि लाते थे। पर कपड़े लाये जाते थे साल में एक बार। कुछ बड़े लोग तो दो तीन साल तक नये कपड़े नहीं खरीदते थे।
वैसे जिनके पास बहुत ज़्यादा पुराने कपड़े नहीं होते थे वो रात को लकड़ों की तापणी जला कर उसके चारों ओर सो जाते थे।
लकड़े जंगल से मिल जाते हैं। कभी कभी नाकेदारों को रिश्वत देनी पड़ती है।
सबसे बड़ी चीज़ तो रह ही गई, जहाँ यह सब ड्रामा चल रहा है - घर। घर कैसे बन सकता है बिना पैसे के? घर के लिये साल दो साल की प्लैनिंग चाहिये। पहले जंगल से धीरे धीरे लकड़ियाँ इकठ्ठी करते रहते हैं। फिर छत में कवेलू के नीचे लगाने के लिये सागटी और बाँस लाने के लिये फलिया वालों की ढास बुलाते हैं जिसमें सब मिल कर लकड़ियाँ या बाँस लेने जाते हैं। घर बनाने का काम भी एक दुसरे की मदद से किया जाता था। दीवारों के लिये बाँस के ही टाटले बनाये जाते हैं।
टाटले बनाने वाला भी गाँव का ही कोई व्यक्ति होता है, अधिकतर रिश्तेदारों में से ही कोई मदद करने आ जाता है। रिश्तेदार को मुर्गी या बकरी भी दी जा सकती है, खुशी से। यदि आपको बाँस के टाटलों की दीवार नहीं बनानी तो आप ईंटें बनवा सकते हैं। मिट्टी, घर वालों को ही इकठ्ठी करनी पड़ती थी। किसी से बैलगाड़ी माँग लेते थे इसके लिये। ईंट पकाने के लिये लकड़ियाँ भी जंगल से लानी पड़ेंगी। फिर वही ढास, इस बार ईंट बनाने के लिये बुलानी पड़ेगी। छत के लिये गोल वाले कवेलू भी लोग ही मिल कर बना लेते थे। घर के अंदर का ओटला भी मिट्टी और गोबर से बनाया जाता था। दरवाज़े भी बाँस के टाटले के। खिड़कियाँ तो होती ही नहीं थीं घरों में।
कुछ और बड़े काम रह गये - शादी और मौत के बाद का भोज। इसके लिये भी गाँव वाले और रिश्तेदार, अनाज से लेकर हर चीज़ की मदद करते थे। इन बड़े खर्चों के लिये तो बकरे या बैल बेचने पड़ते थे।
एक और समय होता है विपदा का। इस इलाके में अधिकतर विपदा का कारण फ़सल न पकना होता है। पुराने लोगों के पास तो ऐसी यादें थीं जिनमें ऐसे समय में भी वे जंगल से कंद मूल खा कर और एक दूसरे से अनाज मांग कर साल गुज़ार लेते थे। जिसके पास पुराना अनाज होता था उसका एक तरह से नैतिक कर्तव्य माना जाता था कि वो भूख के समय में लोगों की मदद करे। कुछ लोगों के पास बीस साल पुराना अनाज भी रखा था। पर आजकल, ऐसे समय, लोग साहूकरों के कर्ज़ में फंस जाते हैं।
कहने का अर्थ यह है कि अधिकतर ज़रूरतें गाँव के संसाधनों से पूरी हो जाती थीं। बड़े से बड़े काम के लिये भी ढास जैसी सामाजिक प्रथाएँ थीं जिनमें श्रम का आदान प्रदान हो जाता था। जो चीज़ें बाहर से लानी पड़ती थीं उनमें से कुछ ऐसी थीं जो ग्रामीण लोग बनाते थे जैसे पत्थर की घट्टी, मिट्टी के बर्तन, बाँस का सामान, लोहे का सामान, कुष्टा - इन सबको पैसे के अभाव में अनाज, मुर्गी या बकरी देकर भी कीमत अदा की जा सकती थीं। कुछ चीज़ें जो दुकानों से लाते थे - नमक, तेल, आलू, प्याज़ आदि - इनकी कीमत भी इनके बदले में कुछ देकर अदा कर देते थे। जैसे मूहड़े के फूल देकर आलू ले लिया या चारोली के बीज देकर खड़ा नमक ले लिया। जंगल में और भी बहुत सी चीज़ें होती थीं जिन्हें दुकान में बदला जा सकता था जैसे गोंद, बेहड़े, मूसली कुछ भी वो चीज़ जिसके लिये गाँव के दुकानदार आगे के खरीदार ढूँढ लें।
जब भी हाट से सामान लाना है तो मुर्गी, बकरी ले ली या एक गाठणी में उड़द, तिल या कुछ भी थोड़ी महंगी बिकने वाली चीज़ बाँध कर ले जाते थे। उसे बेच कर पैसे कर लेते थे और फिर हाट कर लेते थे।
जिन चीज़ों के लिये यह अदला बदली नहीं हो सकती जैसे कपड़े, चाँदी, बड़े बर्तन ... वो चीज़ें साहूकार से लानी पड़ती थीं जिनका हिसाब साल के अंत में होता था और उड़द या मूँगफली जैसी फ़सल बेचकर हिसाब पूरा किया जाता था।
कहानी से समझ यह आया कि वहाँ कैश के बदले लोगों के पास कुछ सामान था, जिसका उत्पादन उन्होंने किया था या उसे जंगल से इकठ्ठा किया था जिसे बेचकर उन्हे कैश मिल जाता था।
लोगों के पास मुर्गियाँ, बकरियाँ थीं जो अड़े बड़े वक्त में कैश की ज़रूरत को पूरा करती थीं।
बहुत सी ज़रूरत की चीज़ें लोग खुद ही बना लेते थे।
यह आदिवासी समाजों की खासियत ही थी कि ईंट कवेलू से लेकर बर्तन, बाँस का सामान, सब कुछ ये बना लेते थे।
जो ये नहीं बनाते थे वो अन्य गरीब लोग बनाते थे जिन्हें दाना देकर ये लोग चीज़ें ले सकते थे।
बहुत अधिक मेहनत वाले कामों को सामूहिक रूप से ढास, लाह, पड़जिया जैसी प्रथाओं के माध्यम से कर लिया जाता था।
कैश की ज़रूरत तो सबसे पहले ज़मीन का कर देने के लिये हुई। और खेत में अनाज पूरा न पकने पर अनाज खरीदने के लिये।
धीरे-धीरे जब हाट में नए नए तरह का सामान आने लगा तो इसे खरीदने के लिये भी कैश की ज़रूरत बढ़ती गई। लेकिन इसके लिये लोग दस बीस किलो दाल या कुछ वनोपज ले जाते थे और इसे बेच कर सामान खरीद लेते थे।
बाद में जैसे जैसे पुलिस, पटवारी और वन विभाग के नाकेदारों के माध्यम से सरकारी दखलंदाज़ी का शिकंजा बढ़ता गया तो अपनी तरह से जीते रहने के लिये रिश्वत देने के लिये भी कैश की ज़रूरत पड़ने लगी।
आदिवासियों की कैश की बढ़ती ज़रूरत स्वावलम्बन से बाजा़र व सरकारी संस्थाओं पर परावलम्बन की कहानी से और अपने आत्म सम्मान खोने से जुड़ी है। इसके साथ ही इनका आर्थिक शोषण भी बढ़ गया।
जंगल नष्ट हो गये या छिन गये। ज़मीनें बॅंट गईं या ये विस्थापित हो गये।
जीवन चलाने के प्राकृतिक आधार हाथ से चले जाने के बाद अब केवल अपना शारीरिक श्रम ही बचा है जिसे बेच कर कैश कमाया जा सकता है। और यदि श्रम के लिये अर्थव्यवस्था में जगह नहीं है तो फिर भीख - सड़कों पर या सरकार से।


