कौन शहीद होना चाहेगा इस “मुलायम” समाजवाद मेँ ?
कौन शहीद होना चाहेगा इस “मुलायम” समाजवाद मेँ ?
लखीमपुर के हरदासपुर निवासी और बरेली मेँ तैनाती के दौरान शहीद हुए सब इंस्पेक्टर मनोज मिश्रा की हत्या की सीबीआई जाँच, बीस लाख मुआवजा तथा दूसरे बेटे को नौकरी की माँगों को लेकर शहीद के परिजन पिछले दस दिनों से अनशन पर हैं। परिजनों व अन्य लोगों को यह संदेह भी है कि पशु तस्करोँ के खिलाफ सख्ती कर रहे दरोगा मनोज मिश्रा की सुनियोजित हत्या करवाई गयी है और पशु तस्करों की पुश्तपनाही करने वाले लोगों के तार सीधे प्रदेश सरकार के कुछ बड़े नामों से जुड़े हैं।
रोज कोई न कोई राजनेता अनशन स्थल पर पहुँच रहा है।
शहीद के परिजनों का दर्द रोज छलक रहा है लेकिन मुख्यमंत्री या जिला प्रशासन के कानोँ पर जूँ नहीं रेंग रही है....
वैसे तो भाजपाई शुरू से जमकर शहीद के परिजनों के आसपास कुण्डली मारे बैठै हैं। मुख्यमंत्री या प्रशासन द्वारा अनदेखी किए जाने की एक बड़ी वजह यह भी हो सकती है, लेकिन इसके बावजूद शहीद के परिजनों का दर्द अपनी जगह है..... और घटनाएँ शहीद के परिजनों के इस दर्द को लोगों तक पहुँचाने और उनकी पीड़ा का औचित्य साबित करने में भी मददगार साबित हो रहीं हैं।
अब बिसाहडा की घटना और उस पर मुख्यमंत्री की घोषणा शहीद के परिजनों के जख्मों पर नमक छिड़कने वाली ही साबित हुयी है......
बिसाहडा में पुलिस की गोली का शिकार होकर जख्मी हुए राहुल यादव को नौकरी देने और उसकी बहनों की शादी का जिम्मा लेने की मुख्यमंत्री की घोषणा ने शहीद मनोज मिश्रा के परिजनों के जख्मों पर एक बार फिर नमक छिड़क दिया है।
यह सबाल अब सबके मन में है कि क्या यह समाजवाद बस यादवी समाजवाद होकर रह गया है ? राहुल यादव के जख्मी होने का भी तुरन्त संज्ञान और राहत और शहीद मनोज मिश्रा के पशु तस्करों से मुठभेड़ में जान गँवाने पर भी मुख्यमंत्री के मुँह से उसके लिए दो शब्द नहीं.....
आक्रोशित लोगोँ का कहना है कि इस यादवी समाजवाद का 2017 के चुनाव के बाद नामलेवा नहीँ बचेगा ।
शहीद दरोगा की माँ जयदेवी भाव विह्वल होकर अपने बेटे की तस्वीर उठाकर उसे गले से लगाती हैं और उनके मुँह से बोल नहीँ फूटते, बस आँखो से आँसुओं की झड़ी लग जाती है.....
गाँव के लोगों का कहना है कि सरकार का यही रवैया रहा तो लोग अपने बेटों को पुलिस या अन्य सुरक्षा बलों में भेजने से पहले सौ बार सोचेंगे...
रामेंद्र जनवार


