काँग्रेस के प्रदेश नेतृत्व में बदलाव की भी बाट जोह रहे हैं कार्यकर्ता
रामेन्द्र जनवार
लखनऊ। बिहार में महागठबंधन की असाधारण विजय के बाद जहाँ चुनाव के मुहाने पर खड़े अन्य राज्यों में भी भाजपा का विजय अभियान रोकने की निरन्तरता बनाए रखते हुए चुनाव पूर्व गठबंधनों की संभावनाओं पर पार्टियों ने ध्यान देना शुरू कर दिया है, वहीं लगभग डेढ़ साल बाद उत्तर प्रदेश में होने वाले चुनावोँ के लेकर गठबंधनों के समीकरण कुछ ज्यादा ही तेजी से तलाशे जा रहे हैं।
बहुजन समाज पार्टी एक स्थायी जनाधार वाली पार्टी है और सत्तारूढ़ समाजवादी पार्टी के कामकाज से असन्तुष्ट आमजनों का रूझान अपनी तरफ होने को लेकर आश्वस्त दिख रही है। यही कारण है कि बसपा, काँग्रेस व कुछ छोटे दलों के गठबंधन की संभावनाओं को सिरे से खारिज कर रही है, वहीं सत्तारूढ़ सपा अपने युवा मुख्यमंत्री के कामकाज और छवि को लेकर अपने कार्यकर्ताओं को दोबारा वापसी का भरोसा दे रही है।
अब शेष बची केंद्र में सत्तासीन भाजपा और उत्तर प्रदेश में लगभग पच्चीस सालों से वापसी की आस लगाए काँग्रेस, तो इन दोनों पार्टियों में प्रदेश में भाजपा, काँग्रेस की अपेक्षा बहुत मजबूत स्थिति में है और 2014 में काँग्रेस का सूपड़ा साफ़ कर केन्द्र में काबिज होने के बाद से उसके कार्यकर्ताओं के हौसले भी परवान चढ़े दिखाई दे रहे हैं और सबसे बडी बात यह कि गठबंधनों का जो मौजूदा दौर बिहार से शुरू हुआ है, वह साम्प्रदायिकता के नाम पर राज्योँ मे भाजपा को रोकने को लेकर शुरू हुआ है, इस लिहाज से भाजपा का पलड़ा शुरुआती दौर में वैसे ही भारी दिखाई दे रहा है।
बसपा द्वारा गठबन्धन की संभावनाओं को सिरे से खारिज करने के बाद काँग्रेस के सामने एक ही विकल्प शेष बचा दिखाई पड़ रहा है कि वह प्रदेश में बिहार की तर्ज पर अपने नेतृत्व मे एक छोटे दलों का गठबन्धन तैयार करने की दिशा में कदम बढ़ाए, तभी कुछ नये रास्ते खुलने की संभावनाएँ भी सामने आ सकती हैं।
बिहार के महागठबंधन में जो अग्रणी क्षेत्रीय दल राजद और जदयू शामिल रहे, वह बिहार में पहले से अच्छी स्थिति में थे, लेकिन उत्तर प्रदेश में उन पार्टियों की वह स्थिति नहीं है। काँग्रेस अपनी अगुवाई में इन दलों के साथ पश्चिम उत्तर प्रदेश में लोकदल या टिकैत के गुट और साथ ही तराई में बी.एम. सिंह जैसे किसान नेताओं को लेकर एक प्रयोग कर सकती है। अगर वामपंथियों को भी इसमें शामिल कर सके तो एक धर्मनिरपेक्ष गठबंधन को आस्तित्व में लाया जा सकता है।
लेकिन काँग्रेस कार्यकर्ताओं में अभी प्रदेश नेतृत्व में बदलाव को लेकर ही असमंजस बना हुआ है। लोकसभा की पराजय के बाद से ही यह चर्चा गर्म है। लोकसभा चुनाव के बाद छ: राज्योँ में नेतृत्व परिवर्तन ने इस चर्चा को हवा दी है कि टीम राहुल का कोई युवा सदस्य प्रदेश की कमान संभाल सकता है। लेकिन स्थितियाँ साफ़ होने में अभी कुछ वक्त लगेगा ऎसा लगता है।
रामेंद्र जनवार, स्वतंत्र पत्रकार