नई दिल्ली। अलगाववादियों और सरकार के बीच जारी लड़ाई में आम कश्मीरी का जीना दूभर हो गया है। अब एक और आरोप लगा है कि सरकार ही अपने एजेंटों से पत्थरबाज़ी करा रही है और पैलेट्स की मार आम कश्मीरी भुगत रहा है।
प्रतिष्ठित समाचारपत्र देशबन्धु ने समाचार एजेंसी आईएएनएस के हवाले से शेख कयूम की एक रिपोर्ट प्रकाशित की है, जिसमें बताया गया है कि लाल चौक के दुकानदारों ने आरोप लगाया कि कुछ दिनों पहले उन लोगों ने जब शाम में दुकानें खोलीं तब पत्थर फेंक रहे एक सरकारी एजेंट को पकड़ा।

देशबन्धु की पूरी खबर निम्नवत् है -
श्रीनगर, 21 अगस्त। एक आम दुकानदार दुविधा में है कि वह दुकान खोले या नहीं। अगर हां, तो कब! कुछ वर्षो में कश्मीर घाटी में सबसे भयानक अशांति के दौरान अलगाववादी और सरकार के बीच चल रहे दिमागी युद्ध में छोटे दुकानदार बुरी तरह पिस रहे हैं।

घाटी में इन दिनों अलगाववादी नेताओं का फरमान चलता है।
इन लोगों ने आम लोगों से कहा है कि सुबह से शाम तक के बंद के बाद वे शाम छह बजे से सुबह छह बजे तक अपना दैनिक काम निपटाएं। लेकिन ऐसा प्रतीत होता है कि अशांत घाटी में सामान्य हालत बहाल करने को जूझ रही सरकार यह नहीं चाहती है।
गत 8 जुलाई को सुरक्षा बलों के हाथों हिजबुल कमांडर बुरहान वानी के मारे जाने के बाद से घाटी में दुकान, स्कूल और कार्यालय बंद हैं। बड़े पैमाने पर सरकार विरोधी प्रदर्शनों और सुरक्षा बलों एवं प्रदर्शकारियों के बीच झड़पों में कम से कम 67 लोगों की मौत हो चुकी है और हजारों अन्य लोग घायल हुए हैं।
सप्ताहों से बनी अशांति के दौरान जब बंद में ढील दी गई थी तो कुछ जगहों पर शाम में कुछ देर के लिए दुकानें खुलीं।

लेकिन कई दुकानदारों का आरोप है कि अलगाववादियों के फरमान के अनुपालन होने से सरकार खुश नहीं है।
कई जगहों पर जब दुकानें खोली जाती हैं तो प्राधिकारी शरारती तत्वों के उपद्रवों को रोकने का बहाना बनाकर प्रतिबंध लगा देते हैं।
यहां के मुख्य व्यापारिक केंद्र लाल चौक के निकट लैम्बर्ट लेन के एक कपड़े की दुकान चलाने वाले व्यापारी ने कहा,

"उदाहरण के तौर पर अलगाववादियों ने पहले दोपहर बाद कुछ देर के लिए बंद में ढील दी थी। लेकिन हमें दुकानें खोलने की अनुमति नहीं दी गई और प्रतिबंध लगा दिए गए।"

हाल में एक संवाददाता सम्मेलन में राज्य के कार्यवाहक पुलिस महानिदेशक एस.के. मिश्रा ने आश्वासन दिया था कि अगर दुकानदार दिन में दुकानें खोलते हैं तो सुरक्षा बल उन्हें सुरक्षा प्रदान करेंगे।
यह पुलिस प्रमुख का एक संदेश था।
दुकानदारों को दिन में अपनी नियमित गतिविधियां शुरू करनी चाहिए और अलगाववादियों के निर्देशों को नहीं मानना चाहिए।

कई दुकानदारों ने आरोप लगाए कि प्राधिकारियों ने शाम में उन्हें उन जगहों पर व्यावसायिक प्रतिष्ठान नहीं खोलने को कहा है, जहां कर्फ्यू लागू हैं।
लाल चौक के दुकानदारों ने आरोप लगाया कि कुछ दिनों पहले उन लोगों ने जब शाम में दुकानें खोलीं तब पत्थर फेंक रहे एक सरकारी एजेंट को पकड़ा।
रीगल लेन के निकट एक मिठाई की दुकान के एक विक्रेता अली मोहम्मद ने कहा,

"अलगाववादियों के विरोध कार्यक्रमों और बंद में ढील का उल्लंघन करने के लिए उस आदमी की पिटाई की गई।"

मोहम्मद ने एजेंसी से कहा,

"उसे पुलिस को इसलिए नहीं सौंपा गया, क्योंकि वह उन्हीं (पुलिस) का आदमी था।"

स्वतंत्र रूप से एजेंट की पहचान प्रमाणित नहीं की जा सकी और पुलिस ने घटना से अपना कोई संबंध होने से इनकार कर दिया था।
इस लड़ाई में आम कश्मीरी सशंकित हैं।
विडम्बना है कि उन्हें अपने दैनिक सामान खरीदने की छूट केवल शाम में मिलती है। लेकिन अपरिहार्य खतरा का डर बना रहता है।
गत छह से अधिक सप्ताहों से जम्मू-श्रीनगर -लेह सामरिक राष्ट्रीय राजमार्ग पर भी रात में ही यातायात चालू रहती है, क्योंकि दिन में प्रदर्शनकारी सभी सड़कों पर वाहनों को क्षतिग्रस्त कर देते हैं और यात्रियों को घायल कर देते हैं।
जमीनी स्थिति पर नियंत्रण खोने के बाद ऐसा लगता है कि सरकार अब अपना फरमान लागू करने का फैसला करने वाली है। लेकिन सबसे बड़ी चुनौती अपनी शर्तो पर घाटी में सामान्य स्थिति बहाल करना है।