क्या चीन की तरफ से बजरिये नेपाल कोई धीमा जहर नदियों द्वारा फैलाया जा रहा ?
क्या चीन की तरफ से बजरिये नेपाल कोई धीमा जहर नदियों द्वारा फैलाया जा रहा ?
नई दिल्ली। क्या चीन की तरफ से बजरिये नेपाल कोई धीमा जहर तो नदियों द्वारा नहीं फैलाया जा रहा ? ऐसा कोई सुबूत फिलहाल नहीं है, लेकिन ऐसा शक पैदा हो रहा है।
दरअसल काँग्रेस के बड़े नेता और लखनऊ विश्वविद्यालय छात्र संघ के पूर्व महामंत्री रामेंद्र जनवार ने फेसबुक पर एक लंबी पोस्ट लिखी है। इस पोस्ट में ऐसा शक जाहिर किया गया है।
श्री जनवार कहते हैं कि सरकारों और राजनीतिक दलोँ को भी सिर्फ बाढ़ देखने के लिए हवाई दौरा कर या कुछ राहत बँटवाकर आँखे नहीँ फेर लेनी चाहिए। बाढ़ के आफ्टरइफेक्ट होते हैँ। बीमारियाँ भी फैलती हैँ। उस समय राजनेताओँ और प्रशासनिक अधिकारियोँ को भी ऎसे किसी आफ्टरइफेक्ट पर निगाह रखनी चाहिए जो पहले नहीँ दिखाई दिए।
आप भी पढ़ें रामेंद्र जनवार की पोस्ट और उस पर उत्कर्ष अवस्थी का कमेंट। यह चीन की शैतानी न भी हो तब भी पर्यावरण व स्वास्थ्य के लिहाज से चिंता की बात तो है ही। देखना यह है कि सरकार को बाढ़ के हवाई दौरे से कब फुरसत मिलती है और उसे ज़मीन की चिंता कब होती है।
रामेंद्र जनवार की पोस्ट
इन फ़जाओँ में अभी मौत पलेगी कब तक।
पिछले साल हमारे इलाके में डेंगू महामारी की तरह फैला था। मेरी पत्नी को भी हुआ। तीन महीने की दिन रात की मशक्कत और लाखोँ रू. खर्च कर उन्हेँ बचा पाया। दर्जनोँ मरे भी।
इस बार एक बुखार तो फैला ही है। स्किन इन्फेक्शन भी महामारी की तरह फैला है। बेटे को दो महीने पहले जाँघो और शरीर के दूसरे हिस्सोँ पर लाल चकत्ते दिखाई दिए। कुछ दिन सामान्य दवा दी। कुछ डर्म वगैरह लगवाए। कोई फायदा नहीँ। चकत्तों पर फफूँद जैसी दिखने लगी। तब किसी ने बताया कि यह बीमारी तो पूरे जिले में फैली है। तब घबराहट हुई और बेटे को लेकर शहर के बेहतरीन त्वचा विशेषज्ञ डा. पालीवाल के यहाँ ले गया।
देखकर सकते में आ गया कि डा. पालीवाल के यहाँ इतनी भीड़ थी कि एक दिन में दिखा पाना सम्भव लग रहा था। और अधिकाँशत: इसी तरह के त्वचा रोगी। खैर जैसे तैसे दिखा पाया।
देखते ही डॉ. पालीवाल ने कहा कि लम्बी दवा चलेगी लगभग चार महीना और अगर बीच में बन्द की तो फिर वापसी हो सकती है मर्ज की।
दो महीनो से हर महीने दो हजार की दवा करवा रहा हूँ। और सब भी करवा रहे होंगे।
खैर यहाँ तक तो गनीमत थी। आज सीतापुर के गाँजरी इलाके के एक किसान मित्र का फ़ोन आया। मैंने पूछा फसल कैसी है। बोले पचास बिगहा धान औ दस बिगसा सब्जी तौ बाढ मा बहिगै। गन्ना भी तिहारा रहि गा। .
फिर अपनी आशँका जाहिर करने लगे कि अपने यहाँ तो पानी बरसा नहीँ। यह बाढ़ नेपाल की पहाड़ी नदियोँ के पानी से आई थी। और हमेशा बाढ़ का पानी उतरने के बाद भी आधी तिहारी फसल बाकी रह जाती थी। लेकिन इस बार लग रहा है कि जैसे कोई पूरी फसल ठीक जड़ से काट ले गया हो। यही नही सन्देह तब और गहराता है जब पानी उतरने के बाद खेत में एक सफेद परत जैसी जमी दिखाई दे रही है, जो पहले नहीँ दिखती थी पहले पानी बलुई मिट्टी की ही परत छोड़कर जाती थी।
मित्र को शक था कि कहीँ चीन की तरफ से बजरिये नेपाल कोई धीमा जहर तो नदियोँ के द्वारा नहीँ फैलाया जा रहा।
मैँ भी शक में लिपटता ही जा रहा था तभी ख्याल आया कि शक बिना पुख्ता प्रमाण के शक ही रहता है और इसका इलाज हकीम लुकमान के पास भी नहीँ था। इसलिए मैने मित्र से कहा कि अगर ऎसा है तो बहुत खतरनाक है लेकिन एक देशभक्त और अन्नदाता होने के नाते आपको खेत की वह सफेद परत मिट्टी सहित ले जाकर उसकी जाँच करवानी चाहिऎ। अगर कोई धीमे जहर जैसे रसायन की परत हुई तब हमें मिल कर इसके लिए आवाज उठानी चाहिए। .
और सरकारों और राजनीतिक दलोँ को भी सिर्फ बाढ़ देखने के लिए हवाई दौरा कर या कुछ राहत बँटवाकर आँखे नहीँ फेर लेनी चाहिए। बाढ़ के आफ्टरइफेक्ट होते हैँ। बीमारियाँ भी फैलती हैँ। उस समय राजनेताओँ और प्रशासनिक अधिकारियोँ को भी ऎसे किसी आफ्टरइफेक्ट पर निगाह रखनी चाहिए जो पहले नहीँ दिखाई दिए।
Utkarsh Awasthi गुरु जी! आप तो जानते हैं कि मेरा गांव बसंतापुर सीतापुर के गाँजरी क्षेत्र सेवता विधानसभा में आता है| मेरा धान भी इस बार पूरा का पूरा नष्ट हो गया। मकाई भी पूरी की पूरी नष्ट हो गई| पिछले सालों में भी बाढ़ आई है लेकिन नुकसान के बाद भी थोड़ी बहुत फसल मिल जाती थी लेकिन इस बार बाढ़ का पानी जहां तक पहुंचा जिस जिस पेड़ में लग गया वह पूरी तरह नष्ट हो गया। बाढ़ के समाप्त होने के बाद ऐसा लगता है कि जैसे खेत में किसी ने झाड़ू लगाया हो| कोई भी यह अनुमान नहीं लगा सकता कि जिस खेत में बाढ़ लगी है उस खेत में पहले कुछ बोया भी गया है। इस बार बाढ़ का पानी का रंग काला था और जब बाढ़ का पानी वापस गया तो खेतों में एक सफेद रंग की हल्की सी परत जैसी जमा हो गई ऐसा लगता है कि इस बार का पानी कुछ जहरीला था। ग्रामीण अंचल में पेट के मर्ज तेजी से फैल रहे हैं जो महीनों तक ठीक नहीं हो रहे हैं। बहुत त्रासदी है। ऊपर से ऊंचे खेतों में जो थोड़ी बहुत फसल बची हुई है उसको आवारा पशु चरे जा रहे हैं। कोई भी पुरसाहाल पूछने वाला नहीं है और यह ऐसा सिर्फ मेरे ही साथ नहीं है पूरे गाँजरी क्षेत्र का किसान तबाह हाल हो चुका है। आगे आने वाले दिनों में उसके सामने निवालों के संकट होने वाले हैं|
Ramendra Jenwar उत्कर्ष जी जहाँ तक आवारा पशुओँ के बची फसल चरने की बात है तो जान लीजिए कि आवारा पशु मौजूदा सरकार के साइड इफेक्ट भी हैँ और आफ्टरइफेक्ट्स भी हैँ जो सरकार के आने के बाद से ही दिखने लगे हैँ और इनका प्रभाव सरकार के जाने के बाद भी काफी समय तक दिखता रहेगा।


