क्या ये चुनावी सर्जिकल स्ट्राइक है ? #SurgicalStrike
क्या ये चुनावी सर्जिकल स्ट्राइक है ? #SurgicalStrike
क्या ये चुनावी सर्जिकल स्ट्राइक है ?
महेंद्र मिश्र
भारतीय सेना ने पाक से सटी सीमा में सर्जिकल स्ट्राइक की है। पांच-सात आतंकी ठिकानों को ध्वस्त करने के साथ 38 आतंकियों को मार गिराने की बात कही गई है। इस कार्रवाई में पाकिस्तान के दो सैनिक भी मारे गए हैं।
इसकी जानकारी सेना के कमांडर और विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने एक संयुक्त प्रेस कांफ्रेंस में दी है।
यह देश की जरूरत है इसलिए हम सेना की इस कार्रवाई के साथ है।
यह सेना के स्वाभिमान की रक्षा के लिए जरूरी है। इसलिए हम खुले तौर पर इस कार्रवाई के पक्ष में है।
यह आतंकवाद को नेस्तनाबूत करने के लिए उठाया गया कदम है। इसलिए हम इस कार्रवाई का हर स्तर पर समर्थन करते हैं। लेकिन इससे इतर अगर इसका कोई घोषित अघोषित तौर पर घरेलू उद्देश्य है, तो यह बेहद खतरनाक है।
अगर इसका मकसद युद्धोन्माद खड़ा करना है, तो हम उसके खिलाफ हैं। या फिर इसका इस्तेमाल देश में भाईचारा बिगाड़ने के लिए किया गया, तो यह सरकार की सबसे बड़ी भूल होगी।
कार्रवाई के बाद सरकार की पहलकदमियां आश्वश्त करने वाली नहीं दिखती हैं।
कूटनीतिक और अतंरराष्ट्रीय राजनीतिक कसौटियों के लिहाज से सरकार का रवैया किसी भी रूप में तार्किक नजर नहीं आ रहा है। कई लिहाज से यह थोड़ा अचरज भरा भी है।
ऐसा नहीं कि पहले भारत ने इस तरह की कोई कार्रवाई नहीं की है। या फिर यह कोई पहली घटना है।
हेमराज की घटना के बाद पाकिस्तान के 10 सैनिकों को भारतीय फौजों ने मार गिराया था, लेकिन उसका प्रचार नहीं किया गया। न ही उसे सर्जिकल स्ट्राइक करार देकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपना कूटनीतिक पक्ष कमजोर किया गया।
इस मामले में हम अपने विरोधी पाकिस्तान से भी सीख सकते हैं। उसने आज तक कितने हमले किए और कितनी बार सीमा पर संघर्ष विराम का उल्लंघन किया। कितनी बार आतंकियों को भेजकर देश के भीतर विस्फोट कराए। लेकिन कभी किसी बात को स्वीकार नहीं किया। हाल में पठानकोट हो या उरी में हुआ हमला। दोनों में उसका वही पुराना रुख रहा। लेकिन हम एक हमला कर बाकायदा प्रेस काफ्रेंस करके उसकी घोषणा कर रहे हैं। साथ ही उसकी पूरी जिम्मेदारी भी ले रहे हैं। क्या ऐसा करते हुए हम अपने कूटनीतिक पक्ष को कमजोर नहीं कर रहे हैं?
या तो हमने खुद को अंतरराष्ट्रीय जगत से अलग करने का मन बना लिया है। या फिर अपने को इतना ताकतवर समझते हैं कि दूसरों को ठेंगा दिखाते चले। लेकिन दोनों स्थितियां नहीं हैं।
हमें अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दूसरे देशों के समर्थन की दरकार है।
ऐसे में अगर हम डंके की चोट पर कहेंगे कि हां हमने दूसरे देश की संप्रभुता का उल्लंघन किया है। तो फिर कौन ऐसा मुल्क होगा जो हमारे पक्ष में खुलेआम खड़ा हो पाएगा। अगर कोई होना भी चाहेगा तो उसके सामने मुश्किल खड़ी हो जाएगी। और अगर कोई खड़ा भी हुआ तो उसे अंतरराष्ट्रीय बिरादरी में शर्मिंदगी का सामना करना पड़ेगा। ऐसे में क्या हम अपने किसी दोस्त को शर्मिंदा होते देखना चाहेंगे?
और सबसे ज्यादा हमें नुकसान अपने पड़ोस में उठाना पड़ेगा। जहां सार्क के मामले में सारे आस-पास के देश अभी हमारे साथ दिख रहे हैं। क्या उनके भीतर यह भय पैदा नहीं होगा कि अगर पाकिस्तान पर भारत ऐलानिया हमला कर सकता है। तो वो किस खेत की मूली हैं। ऐसे में अपने पक्ष में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मिलने वाली सहानुभूति और समर्थन दोनों को हम खो देंगे।
एक बात और सीमा पर होने वाला विवाद पूरे देश से जुड़ा होता है।
और इस मामले में सारी राजनीतिक वैचारिक सीमाएं टूट जाती हैं। और पूरा मुल्क और उसकी जनता एक साथ खड़ी होती है। ऐसे में उसे घरेलू राजनीति से जोड़ना सबसे खतरनाक और घृणास्पद होगा। लेकिन दिशा के स्तर पर ये दोनों संकेत मिलते नजर आ रहे हैं।
पूरे देश में एक युद्धोन्माद का मौहाल बनाया जा रहा है। जो आखिर में पूरे देश के खिलाफ जाएगा। इसलिए सरकार को किसी भी हालत में युद्ध की स्थिति से बचना होगा। तात्कालिक तौर पर यह भले ही फायदेमंद दिखे। या फिर इससे हमारा सीना फूल जाए। लेकिन दीर्घकालिक तौर पर यह पूरे देश के हितों के खिलाफ जाएगा। जिसका पूरा खामियाजा अंत में जनता को उठाना पड़ेगा। और इस मौके का घरेलू राजनीतिक फायदा उठाने की कोई भी कोशिश घृणास्पद होगी।
सूचना के चंद घंटों बाद ही पंजाब में सरहद से जुड़े 10 किमी इलाके को खाली कराने का निर्देश कुछ इसी तरह का संकेत है।
अगर युद्ध की आशंका इतनी घनी है। तो यह काम पाक से सटे हर इलाके में किया जाना चाहिए।
इस मामले में राजस्थान की सीमा सबसे ज्यादा संवेदनशील है। जिससे परमाणु विस्फोट का केंद्र पोखरन जुड़ता है। लेकिन वहां ऐसा कुछ नहीं किया गया।
कश्मीर के एलओसी से सटे इलाकों से ज्यादा नाजुक क्षेत्र और कौन हो सकता है? लेकिन वहां भी सरकार ने ऐसा कुछ नहीं किया। फिर पंजाब ही क्यों?
यह बताता है कि इसके पीछे सरकार का कोई अतिरिक्त उद्देश्य भी है। कहीं यह आगामी विधानसभा चुनाव में ज्यादा से ज्यादा लाभ उठाना तो नहीं?
और हां एक आखिरी लेकिन बेहद महत्वपूर्ण बात।
हम दोनों की लड़ाई का फायदा कोई तीसरा अमेरिका नाम का बंदर न ले जाए। वह बहुत सालों से भारत में अपना पैर जमाने के फ़िराक में है। हमने उसे मरम्मत और रखरखाव के लिए अपने हवाई अड्डे पहले ही दे दिए हैं। कल को अब हम न्याय करेंगे की तर्ज पर अपने सैन्य अड्डे भी देश में स्थापित करने के बारे में न सोच ले। ऐसे में नई बला हमारे सिर पर सवार हो जाएगी। जिसे उतारना फिर मुश्किल हो जाएगा।


