एक मायने में हिंदू – मुस्लिम रिश्ते कबीर खान का जुनून सा हो गया और तेलुगु महानता राजमौली का
बाहुबली और बजरंगी भाईजान में क्या समानता हो सकती है ?
एक समानता तो यह है कि दोनों व्यापार यानी लोकप्रियता के पैमाने पर सफल फ़िल्में हैं।
एक और समानता है कि दोनों के पटकथा लेखकों में विजयेंद्र प्रसाद हैं।
और एक समानता है कि दोनों के नामों में अंगरेजी का बी अक्षर है।
क्या इतना ही !
दोनों एक दूसरे के उलट हैं। बाहुबली पौराणिक भव्यता का सिनेमा है और बजरंगी भाईजान आधुनिक सभ्यता की कथा है। हिंदुस्तानी दर्शक ने दोनों को पसंद किया।
अगर हिंदी भाषी दर्शकों के नजरिए से देखें तो बाहुबली सफल होते हुए, उतनी सफल नहीं है जितनी सफल वह तेलुगु भाषा में है। उस दृष्टिकोण से बजरंगी भाईजान बाहुबली से ज्यादा लोकप्रिय है। इसका आधार यह है कि 130 करोड़ की लागत ( बॉलीवुड का व्यापार बताने वाली एक वेब साइट के अनुसार ) बाहुबली ने सभी भाषाओं में वैश्विक स्तर पर कुल कमाई 305 करोड़ की कमाई की 24 जुलाई तक की।
दूसरी तरफ बजरंगी भाईजान की लागत भी 125 करोड़ है और इसने अब तक दुनिया भर में 24 जुलाई तक कुल 325 करोड़ की कमाई की है। सिर्फ भारत में इसकी कमाई 181.करोड़ 18 लाख नेट है। कुल कमाई और नेट कमाई का फर्क यह है कि कुल कमाई का अर्थ हुआ कि इतने का टिकट बिका और नेट का मतलब है कि टिकट का टैक्स वगैरह काट कर जो बचा। बाहुबली एक हफ्ता पहले ही बाजार में आ गई थी और उसका पहला हफ्ता के बाद बजरंगी भाईजान आई।
दोनों फिल्मों का सार्थक विवेचन करने के पहले दोनों फिल्मों को निदेशकों की पड़ताल करें तो दोनों के बीच भी एक समानता का सूत्र है कि दोनों का संबंध हैदराबाद से है। ऱाजमौली जहां हैदराबाद में रह कर तेलुगु सीरियल बनाते थे वहीं कबीर अनेक विषयों पर डॉक्यूमेंटरी दिल्ली – मुंबई के बीच बनाते थे। राजमौली का सारा जीवन लगभग हैदराबाद में ही बीता, जबकि कबीर दिल्ली में पढ़े लिखे और उनका कार्यक्षेत्र मुंबई बना।
राजमौली की तेलुगु फिल्मों से टेलीविजन का लगभग हर दर्शक परिचित है क्योंकि उसका हिंदी में डब संस्करण लोगों ने बहुत चाव से देखा है। उनकी काफी फिल्मों का हिंदी संस्करण भी बना जिसमें से राउडी राठौर भी है। यह बंगाल से लेकर तमिलनाड़ु तक उनकी बोलियों में बनी।
तेलुगु सिनेमा में अपनी पहली फिल्म स्टूडेंट नंबर वन से वह तेलुगु सिनेमा में बिकाऊ निदेशक बन चुके थे। जबकि कबीर खान की पहली फिल्म उनके डॉक्यूमेंटरी फिल्मों के अनुभव पर बनी थी काबुल एक्सप्रेस। यह न घाटे का सौदा थी, न भारी मुनाफे का। काबुल एक्सप्रेस में यह तलाश की गई थी कि तालिबान से छुटकारा पाने और अमरीकी कब्जे का अफगानिस्तान का जन जीवन कैसा है। दिसंबर 2006 में दिखाई गई फिल्म एक मायने में अफगानिस्तान का वास्तविक चेहरा भी था। कबीर खान अफगानिस्तान पर डॉक्यूमेंटरी भी बना चुके थे।
ठीक उसी समय 2001 से राजमौली अपने ढंग से तेलुगु सिनेमा की नई व्याख्या कर रहे थे। आम तौर पर लगभग हर दो साल के अंतराल पर तेलुगु सिनेमा में राजमौली अपनी उपस्थिति अपनी अलग-अलग विषयों वाली फिल्मों के साथ दर्ज करते रहे। लगभग सभी की सभी हिंदी में डब की गई जिनसे हिंदी भाषी टेलीविजन के जरिए देखते रहे। लीजिए उनकी हिंदी में डब फिल्मों के नामों में से एक मशहूर नाम राउडी राठौर भी है। यह लगभग सभी भारतीय भाषाओं में इसके संस्करण बने। यह फिल्म तेलुगु में 2006 में बनी थी। राजमौली के प्रिय विषयों में गुंडा या माफिया राज से लड़ना रहा। दूसरी तरफ कबीर खान के प्रिय विषयों में आतंकवाद और हिंदू – मुस्लिम संबंध रहे हैं।
उनकी दूसरी फिल्म न्यू यॉर्क 2008 में दिखाई गई। इसकी पृष्ठभूमि में भी अमेरीका का 9/11 रहा। कुछ कुछ उनके निजी जीवन का अनुभव भी रहा जिसमें नाम में खान होने के कारण उन्हें कितनी मुसीबतों का सामना करना पड़ा। एक मायने में हिंदू – मुस्लिम रिश्ते कबीर खान का जुनून सा हो गया और तेलुगु महानता राजमौली का। राजमौली की फिल्मों में धीरे धीरे हिंदू – मुस्लिम प्रवेश करने लगा।य़ह सीधे सीधे नहीं आया , बल्कि उनकी मगधीरा में दिखने लगा। दक्षिण भारत की कथाओं में अनेक कथाएं हैं कि कैसे हिंदू राजाओं ने मुसलमान को दावत दी कि वह उनके शत्रु हिंदू राजा को परास्त करें। बाहुबली का कट्टपा या कड्डा उसी यवन शक्ति का प्रतीक है। वह माहिष्मती का गुलाम है और बल्लाल देव के कहले पर, यह अनुमान है क्योंकि बाहुबली के प्रथम भाग में कट्टपा स्वीकार करता है कि उसी ने बाहुबली को धोखे से मारा था।
यहां यह समझ लेना जरूरी है कि आंध्र प्रदेश के समाज में कम्मा और रेड्डी पर लंबे समय तक मुसलमान का राजपाट रहा। माहिष्मती आंध्र के प्रसिद्ध विजयनगर राज का भी प्रतीक हो सकता है। पर यह किस्सा अलग से क्योंकि बाहुबली का बल्लाव देव का टकराव कम्मा – रेड्डी का भी टकराव हो सकता है।
कबीर खान के दर्शन में टकराव हिंदू – मुसलमान ही है। वह हमेशा इसको परिभाषित करते रहे हैं – पर उनका टकराव अधिकांश अमरीकी अपराध उपन्यासों की तर्ज पर ही होता है। पर टकराव का केंद्र बिंदु प्रेम होता है। इसकी सबसे बड़ी मिसाल उनकी फिल्म ‘एक था टाइगर’ है।
एक था टाइगर का केंद्र बिंदु हिंदुस्तानी जासूस और पाकिस्तानी जासूस के बीच प्रेम है। दोनों अपने प्रेम के साथ हिंदुस्तानी सरकार और पाकिस्तानी सरकार से भागते फिर रहे हैं। इस फिल्म का एक महत्वपूर्ण संवाद है कि हिंदुस्तान और पाकिस्तान की सरकार में उन्हें जिंदा या मुर्दा पकड़ने पर एका है।
स्पष्ट कि कबीर खान का जीवन दर्शन हिंदू – मुस्लिम एका है। कबीर खान की पत्नी हिंदू है – मिनि माथुर। कई एक बार अमरीका और अन्य देशों में खान नाम के कारण कबीर खान को परेशानियों का सामना करना पड़ा।
अब भव्यता बनाम आधुनिक सभ्यता की व्याख्या पर आते हैं।
भव्यता हमें कहता है कि रुको हम अपनी अगली बाहुबली में बताएंगे कि कट्टप्पा ने क्यों बाहुबली को धोखे से मारा। लेकिन कबीर खान अपनी प्रेम की व्याख्या के लिए आपको अगली कड़ी की प्रतीक्षा में नहीं छोड़ते। वह बजरंगी भाईजान में ही वात्सल्य के माध्यम से एका दिखलाते हैं। इसके सारे पात्र भारतीय जनजीवन की अच्छाइयों और बुराइयों से जुड़े हैं।
मुख्य पात्र वात्सल्य की प्रतीक एक गूंगी लड़की ( हर्षाली मल्होत्रा ) शाहिदा है। अपनी गूंगी बच्ची के लिए प्रार्थना करने उसकी मां हिंदुस्तान में हजरतनिजामुद्दीन औलिया की शरण में आती है। यह एक अदभुत तथ्य है कि मूर्तिपूजक मुसलमान अपनी दुआ के लिए हिंदुस्तान ही आते हैं, चाहे निजामुद्दीन हो या अजमेर। तथ्य यह भी कि हिंदू भी यहां आते हैं।
शाहिदा ट्रेन यात्रा में अपनी मां से बिछड़ जाती है। बिछड़ने का कारण भी वात्सल्य ही है। फिल्म के आरंभ में ही उसका मेमनों के प्रति प्यार स्थापित हो चुका है। यहां हिंदुस्तान – पाकिस्तान के बीच चलने वाली समझौता एक्सप्रेस कहीं रुक जाती है। शाहिदा रुकी ट्रेन से देखती है एक मेमना। आदतन वह मेमना के पास जाती है और ट्रेन चल पड़ती है। उसकी मां को लेकर ट्रेन पाकिस्तान पहुंच जाती है। अब तक उसकी मां को पता चल चुका है कि शाहीदा पीछे छूट चुकी है। उसे बताया जाता है कि वापस जाने के लिए वीजा की जरूरत होगी। अपनी बच्ची को छोड़ कर वह पाकिस्तान चली जाती है और शाहिदा भटकते हुए कुरुक्षेत्र पहुंच जाती है।
कुरुक्षेत्र एक प्रतीक है दो भाइयों की लड़ाई का – कौरव और पांडवों का युद्ध। यहां हमारा परिचय हनुमान भक्तों से होता है, इन्हीं भक्तों के साथ नाचता– गाता पवन कुमार चतुर्वेदी ( सलमान खान ) से होता है। सवाल है कि हनुमान ही क्यों ?
इसलिए कि हनुमान हिंदुओं में सबसे ज्यादा लोकप्रिय है। इनका हनुमान चालीसा बहुत ही लोकप्रिय गुटका है। हमारा हनुमान भक्त भी अपनी कहानी कहता हुआ फिल्म में भी हंसी लाता है। वह संकेत में बहुत सारी बातें कहता है जिसमें रुढ़ ब्राह्मणवाद की परंपराओं से हम परिचित होते हैं जिसमें शाकाहारी और मांसाहारी भोजन भी है।
शाहिदा उर्फ मुन्नी मांसाहारी है। बजरंगी यह भी दिखाता है कि अनाथ बिनबोली बच्ची को कैसे लोग वेश्यालय में बेच आते हैं।
मांसाहारी भोजन ही वह सूत्र है जिससे बजरंगी को पता चलता है कि मुन्नी का घर पाकिस्तान है। फिर बजरंगी उसके घर पाकिस्तान छोड़ने जाता है – बिना वीजा और पासपोर्ट के।
अब कबीर खान पाकिस्तान का मानवीय और अमानवीय पक्ष हमें दिखाते हैं और दिखाते हैं स्ट्रिंगर रिपोर्टर( नवाजुद्दीन सिदीक्की ) का समर्थन और खबर को दुनिया तक पहुंचाने की ललक। जब टेलीविजन वालों को उसकी एक कथा कि एक हिंदुस्तानी एक बच्ची को उसके घर तक पहुंचाने पाकिस्तान आया है तो किसी को भरोसा नहीं होता। वह इंटरनेट का सहारा लेता है। हिंदुस्तान और पाकिस्तान उसके बाद दोनों के साथ हो जाते हैं। बजरंगी को भी पाकिस्तान की कैद से छोड़ा जाता है। वह सीमा पार करते समय पाकिस्तानी रेंजर से मार के कारण कमजोर हो चुका है और हाथ में लाठी ले कर सीमा पार कर लेता है क्योंकि दोनों की सीमा पर नदी है। शायद हाथ में लाठी भी गांधीवाद का एक प्रतीक हो।
हिंदु – मुस्लिम समझ और हर प्रकार के आतंकवाद और रुढ़िवाद के है बजरंगी भाईजान और है आधुनिकता की कथा।
जुगनू शारदेय
जुगनू शारदेय लेखक वरिष्ठ पत्रकार और स्तंभकार हैं. फिलहाल सलाहकार संपादक ( हिंदी ) – दानिश बुक्स