मुलायम कुनबे में खींचतान और अमर सिंह
(समाजवादी पार्टी अगले साल चुनावी मैदान में उतरने जा रही है। इस बीच मुलायम सिंह परिवार में घमासान मचा है, जिनके हाथ में पार्टी है। सत्ता विरोधी लहर फैक्टर, मायावती का आक्रामक चुनाव प्रचार और भाजपा के साथ कांग्रेस की सक्रियता से यूपी में सरगर्मियां बढ़ी हैं। इस परिवार की आपसी लड़ाई में बाहरी फैक्टर भी घुसाया जा रहा है। खासकर अमर सिंह का नाम घसीटा जा रहा है। इसे लेकर एक पड़ताल... )
सत्येन्द्र पीएस
अमर सिंह कितने बड़े नेता हैं? अमर सिंह क्या हैं? अमर सिंह ने क्या ऐसा कर दिया? सभी चैनलों में, अखबारों में अमर सिंह को क्यों खलनायक साबित किया जा रहा है?
तमाम सवाल हैं जो जेहन में आने चाहिए। हालांकि सामान्यतया ऐसे सवाल जेहन में नहीं आते। इसकी वजह है कि मीडिया के आक्रामक हमले सोच को एक दिशा में मोड़ देते हैं।
टेलीविजन की भयावह चिल्ल पों, शोरगुल, नेताओं के बयान और दूसरे दिन अखबारों के पृष्ठ लोगों की सोच तय करने लगे हैं।
मौजूदा स्थिति में देखें तो समाजवादी पार्टी में मुलायम सिंह परिवार ही प्रमुख है।
अखिलेश यादव मुख्यमंत्री, शिवपाल यादव मुख्यमंत्री के बाद दूसरे नंबर के मंत्री हैं। मतलब देश के सबसे बड़े राज्य के सबसे ताकतवर पदों पर मुलायम सिंह परिवार का दो सदस्य बैठा है।
अगर संसद की बात करें तो मुलायम सिंह यादव, धर्मेंद्र यादव और डिंपल यादव, तेज प्रताप यादव और अक्षय यादव लोकसभा में हैं।
परिवार के ही रामगोपाल यादव राज्य सभा सांसद हैं।
इन लोगों के अलावा इस परिवार से तमाम लोग कई बोर्डों और पंचायतों में विभिन्न पदों पर विराजमान हैं। रिश्तेदारों और दूर के रिश्तेदारों की तो शायद मीडिया में भी कोई सूची नहीं आई है, जो इधर उधर जमे होंगे। तमाम रिश्तेदार आईएएस और आईपीएस भी होंगे, जो महत्त्वपूर्ण पदों पर आसीन होंगे।
इतना गिनाने के बाद पाठक के दिमाग में आया होगा कि समाजवादी पार्टी में परिवारवाद है।
आप अपने तरीके से सोचें। यह पद गिनाने का मेरा आशय बिल्कुल यह नहीं है कि परिवारवाद बताया जाए।
इसका आशय यह है कि आज की तारीख में यह परिवार देश का सबसे ताकतवर परिवार है, जिसमें मुख्यमंत्री, कैबिनेट मंत्री से लेकर सांसद और तमाम बड़े-बड़े प्रशासनिक पदों पर बैठे लोग शामिल हैं।
इस परिवार में कलह मची है। यह कलह पहली बार नहीं मची है।
इसके पहले पार्टी के तमाम बड़े नेता राजबब्बर, बेनी प्रसाद वर्मा आदि इसी पीड़ा में पार्टी से निकल गए कि पार्टी में अमर सिंह प्रभावी हैं और इन नेताओं की उपेक्षा हुई।
आजम खां तो पार्टी में रहकर भी अमर सिंह के खिलाफ मोर्चा खोले रहते हैं।
इन्हीं बवालों के बीच अमर सिंह को पार्टी से निकाला भी गया।
अमर सिंह लंबे समय तक भटके भी। तमाम दलों में उनके जाने की अटकलें भी चलीं।
हो सकता है कि अमर सिंह ने खुद यह अटकलें चलवाई हों। हो सकता है कि लोगों ने सिर्फ अनुमान लगाए हों कि अमर सिंह कहीं जा रहे हों। लेकिन लंबी अवधि के दौरान अमर सिंह कहीं स्थापित न हो पाए।
हां, एक लंबे वनवास के बाद वह एक बार फिर सपा के सहारे ही राज्यसभा में पहुंचे और सक्रिय राजनीति में आ गए।
इस बीच अमर सिंह के बीमार रहने और किडनी खराब होने की खबरें आती रहीं, जिसका इलाज अभी भी चल रहा है।
आखिर अमर सिंह क्या चीज हैं, जिसकी वजह से देश के सबसे बड़े परिवार में फूट पड़ जाती है।
यह बयान सबसे पहले रामगोपाल यादव की ओऱ से आया। उसके पहले अखिलेश यादव ने कहा कि बाहरी लोगों की वजह से समस्या हो रही है, तब मीडिया में अटकलें लगाई गईं कि वह बाहरी आदमी अमर सिंह हैं।
क्या वास्तव में अमर सिंह इतने ताकतवर हैं कि 6 सांसदों सहित उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री और सबसे ताकतवर कैबिनेट मंत्री की बुद्धि हर लेते हैं और ये लोग आपस में सिरफुटौव्वल करने लगते हैं?
मेरी राय थोड़ी अलग है।

मुलायम परिवार से इतर नेताओं ने जब आरोप लगाया कि अमर सिंह की वजह से पार्टी में बवाल है तो वह स्वीकार्य था। लेकिन अमर सिंह की वजह से सबसे ताकतवर परिवार एक दूसरे से मारपीट पर उतारू हो जाएं? यह परिकल्पना थोड़ी कठिन है।
2012 में हुए विधान सभा चुनाव के दौरान या उसके पहले कोई विवाद ही न था कि मुलायम सिंह के अलावा पार्टी में दूसरा कोई मुख्यमंत्री हो सकता है। जब अखिलेश यादव ने शपथ ली तो स्वाभाविक है कि शिवपाल यादव को थोड़ा झटका लगा। लेकिन मामला संभल गया।
अब एक बार फिर चुनाव होने जा रहे हैं। एक तरफ सरकार के खिलाफ सत्ता विरोधी लहर है तो दूसरी ओर पार्टी के भीतर की खींचतान। अखिलेश यादव अपने मुताबिक टिकट बांटना चाहते हैं तो शिवपाल यादव अपने मुताबिक।
कुल मिलाकर सत्ता का खेल है।
शिवपाल कहते हैं कि मुझे राजनीति का अनुभव है और अखिलेश मुझसे राजनीति सीखें। वहीं अखिलेश कहते हैं कि मैं मुख्यमंत्री पद छोड़ने को तैयार हूं लेकिन मुझसे योग्य कोई दावेदार तो हो।
कुल मिलाकर वह शिवपाल को योग्य दावेदार मानने को तैयार नहीं हैं।
2012 में विधानसभा चुनाव में बसपा के खिलाफ अभूतपूर्व विजय हासिल करने वाली समाजवादी पार्टी 2014 के लोकसभा चुनाव में धराशायी हो गई। सिर्फ सैफई परिवार चुनाव जीत सका।

उपरोक्त गिनाए लोकसभा सांसदों के अलावा सपा में अन्य कोई लोकसभा सांसद नहीं है।
इन परिस्थितियों में सबसे अहम चुनाव बिहार में पड़ा। न केवल जनता दल यूनाइटेड व उसके नेता नीतीश कुमार की साख दांव पर थी, बल्कि राष्ट्रीय जनता दल के दिग्गज लागू प्रसाद पर भी हाशिए पर जाने का खतरा मंडरा रहा था।
कम से कम लालू प्रसाद के लिए तो विधानसभा चुनाव जीवन मरण का प्रश्न था। 5 साल से उनका दल केंद्र सरकार से और 10 साल से राज्य सरकार से बाहर था।
अगर लगातार एक बार और राजद सत्ता से बाहर होता तो शायद पार्टी के अस्तित्व को ही खतरा हो जाता।
ऐसी विपरीत परिस्थितियों में लालू प्रसाद और नीतीश कुमार ने हाथ मिलाया।
एक अखबार (शायद टाइम्स आफ इंडिया) में उन दिनों खबर आई थी कि लोकसभा परिणाम आने के दिन रात में करीब 12 बजे नीतीश कुमार ने लालू प्रसाद को फोन किया था। उस समय लालू प्रसाद सो रहे थे। सुबह उठते ही लालू प्रसाद ने नीतीश कुमार को फोन मिलाया। लोकसभा चुनाव में हार पर दोनों नेताओं में चर्चा हुई। दोनों दलों की एका का वह पहला मौका माना जाता है।

जदयू में जीतनराम मांझी कांड के दौरान भी लालू प्रसाद ने अहम भूमिका मानी जाती है
और राजनीतिक हलकों में उन दिनों तेज चर्चा होती थी कि वह लालू ही थे, जिन्होंने नीतीश को दोबारा मुख्यमंत्री बनने के लिए न सिर्फ प्रेरित किया, बल्कि जनता दल यूनाइटेड के आधे विधायकों को तोड़कर माझी गुट बनाने और भाजपा के समर्थन से मांझी को सरकार बनाने से रोकने में भी लालू प्रसाद ने अहम भूमिका अदा की थी।
उस समय शरद यादव, नीतीश और लालू ने एक कवायद शुरू की कि देश भर के सभी समाजवादी दलों को एक करके उनका विलय किया जाए और एक देशव्यापी विकल्प खड़ा किया जाए। उसमें समाजवादी पार्टी को भी शामिल किया गया। सपा इसमें शामिल ही नहीं हुई बल्कि सभी नेताओं ने मिलकर मुलायम सिंह यादव को एक स्वर से महागठबंधन या भावी राष्ट्रीय दल का सर्वोच्च नेता घोषित कर दिया।

उस समय भी समाजवादी पार्टी में किच-किच मच गई।
रामगोपाल यादव ने उसमें अहम भूमिका निभाई और कहा कि सभी दलों का विलय हो पाना मुश्किल है। आखिरकार समाजवादी पार्टी ने घोषणा कर दी कि वह बिहार चुनाव में गठबंधन से बाहर रहेगी और बिहार की हर विधानसभा सीटों पर अपने प्रत्याशी उतारेगी।
राजनीतिक पर्यवेक्षक क्या, कोई पान की गुमटी वाला, रिक्शा चालक भी बता सकता था कि बिहार में सपा की कोई भूमिका नहीं है। उसके सभी प्रत्याशियों के जमानत जब्त होंगे। लेकिन इस सबके बावजूद एक सांकेतिक एकता तोड़ देने का काम समाजवादी पार्टी ने किया था।

उस दौरान सिर्फ एक नेता शिवपाल यादव थे, जिन्होंने जदयू-राजद गठबंधन की कुछ रैलियों में हिस्सा लिया था।
स्वाभाविक है कि वे महागठबंधन या राष्ट्रीय स्तर पर एक मजबूत दल बनाए जाने के पक्ष में खड़े थे, जिसे मुख्यमंत्री अखिलेश यादव और राम गोपाल यादव लॉबी ने असफल कर दिया।
शुक्र है कि जदयू-राजद गठबंधन बिहार विधानसभा चुनाव जीत गया। वह अहम चुनाव था, जिस पर देश के हर नागरिक की नजर थी। लेकिन नेता जी की पलटीमार राजनीति ने बिहार चुनाव का भरभंड करने में अपनी तरफ से कोई कसर नहीं छोड़ी थी।

बिहार प्रकरण कुछ लंबा हो गया।
मुलायम सिंह यादव की पलटीमार राजनीति और बेनी प्रसाद से लेकर कांग्रेस को डिच करने की तमाम घटनाएं जेहन में हैं। उन्हें गिनाना कोई मकसद नहीं है। यहां परिवार की चर्चा हो रही है, जो देश का सबसे ताकतवर परिवार है और उसकी आपसी सिरफोड़ौव्वल में अमर सिंह को घसीटा जा रहा है।
हां, तो मैं कहना यह चाह रहा था कि बिहार चुनाव के पहले गठबंधन को लेकर जब सपा में सिरफुटौव्वल मची थी, तब तो अमर सिंह सपा में नहीं थे। उस समय वह कोई सलाह भी नहीं दे रहे थे मीडिया के माध्यम से भी। उसके बावजूद यह सब कुछ हुआ था।
इस तरह से देखें तो यह न तो बदलती पीढ़ी की लड़ाई है। न ही किसी विचार की लड़ाई है। न किसी घुसपैठिए की वजह से हुई लड़ाई है। यह सीधे सीधे सत्ता और पार्टी को अपने हाथ में लेने का पारिवारिक संघर्ष है। यूं कहें कि पहले जिस तरह से राजपरिवारों में राजा बनने के लिए आपसी मार कुटौव्वल और कभी कभी हत्या तक हो जाती थी, कुछ उसी तरह का सपा में चल रहा है।
सपा में शामिल अन्य लोग, उसके कार्यकर्ता इधर या उधर खड़े हो सकते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि कोई बाहरी व्यक्ति इस हाल में है कि इस देश के सबसे ताकतवर परिवार के किसी मामले में हस्तक्षेप कर सके या किसी का बुद्धि विवेक नष्ट कर दे।

इस दौरान हो रहे कुछ अहम बदलावों पर भी नजर रखे जाने की जरूरत है।
जी मीडिया (जिसे आजकल भगवा चैनल माना जा रहा है) के मालिक सुभाष चंद्रा के साथ तमाम पार्टियों में शिवपाल, मुलायम, अमर सिंह देखे जा रहे हैं। सुभाष चंद्रा भाजपा से राज्यसभा सांसद हैं। साथ ही कैलाश सत्यार्थी भी रंगमंच पर हैं। इंडिया टीवी (इसे भी आजकल भगवा चैनल माना जा रहा है) के प्रमुख रजत शर्मा भी रंगमंच पर हैं।
इन काली अंधेरी रातों में बेगम अख्तर का गाया यह गीत राहत देने वाला है।
दीदार करा दे, काफिर बना दे
ये पर्दादारी, ये बेहिजाबी
हैं तख्ते दिल पर सरकार वर्ना
तख्ता उलट दें हम इनकलाबी

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