भारतवर्ष नाम के इस राष्ट्र की सबसे बड़ी खासियत है सच से मुंह छुपाना
कलयुग के 21 वें दशक में गऊ माता हर शहर, हर गांव के चौक-चौराहों पर लतियायी जा रही है और गंगा मैया सड़ांध मारती नाला बन चुकी है
नारी को मांस पिंड समझने और कुलटा और छिनाल जैसे अनेकानेक शब्दों से सुशोभित करने का खेल, आज भी जारी है
राजीव मित्तल
भारतीय समाज एक ऐसा रंगमंच है जो अनादि काल से डिवाइन प्रॉक्सी से संचालित हो रहा है। इस छद्म खेल की शुरुआत हुई जंगली आर्यों के प्रवेश से, जो सभ्य होते जाने के साथ ही समाज को कंट्रोल करने के लिये ईश्वर नाम की एक अशीरीरी ताकत धरती पर उतारने की व्यवस्था में जुट गये। क्योंकि यह काल्पनिक अवधारणा थी, जिसका कोई रंग-रूप-आकार नहीं था, इसलिये अकेले ईश्वर से कोई भला नहीं होना था, तो एक भरे-पूरे डिवाइन समूह की कल्पना की गयी, जिसके कई किरदार उन्हें प्रकृति के अलग-अलग रूपों में बैठे-बिठाए मिल गये, और बाकी की छवि कैसी हो, इसके लिये उन्होंने अपनी रचनात्मक शक्ति का भरपूर इस्तेमाल किया। तभी से समाज में खास कर भारतीय समाज में जन्म से मृत्यु तक सांस लेने से ले कर सांस छोड़ने की क्रिया ईश्वर और उसके गणों के कंट्रोल में है। यही जमावड़ा मानव नाम के जीव का केआरए देख यह तय करता है कि चोला छोड़ने के बाद उस मानव की आत्मा को कुंभीपाक नरक भेजना है या रौरव नरक, या फिर उसे स्वर्ग के दर्शन कराए जाएं।
अगर केआरए का ग्रेड ए प्लस हुआ तो उसके लिये मोक्ष नाम का एक स्पेशल ठिकाना है, जो सरकारी वृद्धाश्रम जैसा समझिये, जहां हमेशा भजन-कीर्तन होता रहता है, जहां मच्छर भी मारने को नहीं मिलते। ढेर सारी सहूलियतें, जो बिल्कुल फ्री। किसी विमान कम्पनी के पैकेज टूर वाले मजे। मानव के रोजमर्रा के क्रिया-कलाप पर नजर रखने के लिये तीन सुपर फोर्सेस (ब्रहमा-विष्णु-महेश) और हर दिन नये-नये रूप में प्रकट होने वाले देवी-देवताओं की भरी-पूरी टीम। ऐसी कोई टीम इस ब्राह्मांड में मौजूद है, इसके प्रचार-प्रसार के लिये समाज के भीतर से ही पुरोहित वर्ग ने जन्म लिया, जो समाज के बाकी तुच्छ प्राणियों का परलोक सुधारने में लग गया।

तब-तक बिना किसी भेदभाव के विचर रहे आदम और हव्वा एक बगीचे में पेड़ से तोड़ सेब खा चुके थे, और जिसके खाते ही दोनों को नर-नारी के विभेद का ज्ञान हो चुका था और यह भी कि अब उनकी भूमिकाएं क्या-क्या हैं। बच्चे पैदा करने-कराने से लेकर नर के पथप्रदर्शक और नारी का उसकी अनुगामिनी बने रहने तक तो मामला कुल मिला कर ठीक ही रहा, लेकिन पुरोहित समाज को नारी के अंदर कुछ ऐसे वीषाणु नजर आए जो पूरी कायनात को जहन्नुम बनाने के लिये काफी थे। यहीं से शुरू हुआ नारी को मांस पिंड समझने और कुलटा और छिनाल जैसे अनेकानेक शब्दों से सुशोभित करने का खेल, जो आज भी जारी है।
ज्ञानियों ने एक और छद्म खेल खेलते हुए गऊ को माता, गंगा को मैया और नारी को देवी का रूप दे कर आकाश गुंजा दिया, जिसमें नारी की स्थिति तो शुरू से आज तक देवी और कुलटा के बीच में फंसी हुई है, उसे कब कौन सा रूप देना है, इसका सर्वाधिकार पुरुष समाज ने अपने पास रखा है। और कलयुग के 21 वें दशक में गऊ माता हर शहर, हर गांव के चौक-चौराहों पर लतियायी जा रही है और गंगा मैया सड़ांध मारती नाला बन चुकी है।
भारतवर्ष नाम के इस राष्ट्र की सबसे बड़ी खासियत है सच से मुंह छुपाना और सच से मुंह छुपाने का सबसे आसान तरीका है अपने को किन्हीं वेदों, किन्हीं पुराणों, किन्हीं गीताओं और किन्हीं रामायणों को लिहाफ बना कर अपने ऊपर डाल न जाने कौन से पुण्यों का जाप करना ताकि शरीर से निकल कर आत्मा सीधे स्वर्ग का टिकट कटाए। और जब तक इहलोक में है, संतान पैदा करने से लेकर दुनिया के बाकी काम सुभीते से चलते रहें। इससे भी ऊपर है मोक्ष की अवधारणा, जो जीव नाम के पापी चोले से हमेशा के लिये मुक्ति दिलाने के तरीके बताती है।
इसी मोक्ष को पाने के लिये करोड़ों साल पहले सतयुग नाम के किसी जमाने से तपस्या की परम्परा चली आ रही है। इन्हीं अवधारणाओं की अगली कड़ी में किन्हीं सावित्री, सीता, शकुन्तला, राधा, शचि जैसे चरित्र हैं, जिनका घनघोर पतिव्रता चरित्र चौखटे में फिट कर घर-घर लटका दिया गया है और घर-घर में औरत नाम के क्षूद्र प्राणी की मुंडी पकड़ कर उस चौखटे के सामने 24 घंटे में 24 बार लायी जाती है कि देखो तुम्हारा नाम कोई भी हो, लेकिन तुम्हें बनना इन जैसा ही है, अगर तुम दाएं-बाएं हुई तो कुलटा, पापी, नरक का कीड़ा कहलाओगी। सबसे बड़ा सच तो यह है कि सभ्यता की शुरुआत से ही समाज पर पुरुषों का कब्जा बड़े शातिर ढंग से तैयार की गयी साजिश के तहत होता ही चला गया। स्त्री पर अपनी जकड़ को और मजबूत बनाने के लिये पुरुष समाज ने अपने दो चौखटे तैयार किये। एक चौखटा कोठे से लेकर हरम तक छत्तीस-चौंतीस-छत्तीस का मजा लेने वाला और दूसरा चौखटा उस औरत के सामने सुर्खरू बना रहने वाला, जो उसके वंश को बढ़ाने में खामोशी से लगी हुई है और किसी देवी या देवता की फोटो के सामने पति की गोद में मरने के लिये सुबह-शाम दुआ मांग रही है। लेकिन पुरुष समाज के लिये अपने इस चौखटे को सुर्खरू बनाये रखना तभी तक संभव था, जबकि वह घर की औरत को कई तरह के खौफ दिखा कर, किसिम-किसिम की धार्मिक-सामाजिक अवधारणाएं गढ़ बलात उनमें फांस उसे यह मानने के लिये मजबूर करे कि पुरुष के बिना औरत मांस का एक पिंड मात्र है, जिसे कोई भी नोच-खसोट सकता है।