क्रन्तिकारी वामपंथ मौन क्यों ?
क्रन्तिकारी वामपंथ मौन क्यों ?
मुझे यह बात समझ में नहीं आती है, कि दलितों की एफ़।आई।आर। तक नहीं लिखी जाती है। उनकी बहू- बेटियों के साथ सामूहिक बलात्कार होते है। उनके घर जलाये जाते है और भारत का वाम पंथ चुप्पी साध कर क्रांति हो जाने का इन्तजार करता रहता है, किन्तु यही वामपंथ क्रांति होने के पहले कई मुद्दों के लिए क्रांति के हो जाने का इन्तजार नहीं करता है जैसे कारखानों में मजदूरों पर मैनेजमेंट कोई अत्याचार करता है, तब, सरकारी हमले के विरोध में या हिन्दू मुस्लमान के मामलों में इन मुद्दों पर वामपंथ काफी सक्रिय हो जाता है और होना भी चाहिए क्योंकि क्रन्तिकारी है ,प्रगतिशील है जनवादी और देशभक्त है।
हम तो सिर्फ यह कहना चाहते हैं, कि दलित के मुद्दों पर इनकी सामाजिक न्याय का चक्षु कहाँ चला जाता है, कहां चली जाती है वो क्रांतिकारिता जो समाज में चल रहे जुल्मों के खिलाफ है। जाति के सवाल पर कई-कई दिन के सेमीनार करते हैं, लम्बे-लम्बे शोध पेपर प्रस्तुत करते हैं और जब उनके साथ अन्याय और जुल्म होते हैं, तो चुपी साध लेते हैं।
अभी हाल में ही नोएडा में दनकौर और फरीदाबाद के सुनपेड में दलितों पर अत्याचार की घटनाएँ घटित हुईं। दोनों घटनाएँ जघन्य घटनाएँ थीं। सुनपेड में दलित परिवार पर दबगों के द्वारा दलित परिवार पर पट्रोल छिडककर आग लगा दी गयी, जिसमें एक महिला और उसके पति झुलस गये और उनके दो छोटे बच्चे जिन्दा ही आग में जल कर मर गये। एक –आध संगठनों को छोड़कर पूरा वाम पंथ तमाशबीन बना हुआ है।
हम इस स्थिति पर कोई नतीजे तो नहीं निकाल रहे हैं, पर इतना तय है वामपन्थ किसी गम्भीर बीमारी का शिकार है, क्योंकि बहुत ही सीधी सी बात है, कि जब आप क्रांति करेंगे तो दलित वर्ग आपके साथ क्यों आएगा? आपको तो वह जानता तक नहीं है, क्योंकि आप उनके लिए कोई संघर्ष तक नहीं करते हैं और क्या आपको ऐसा लगता है कि इस बड़े उत्पीड़ित हिस्से को छोड़ कर क्रांति कर लेंगे। फिर आपको बताना होगा, कि किस वर्ग या समुदाय को लेकर आप इस योजना को अमली जामा पहनाएंगे। मजदूरों या किसानों को लेकर। यदि हाँ तो केवल मजदूरों, किसानों को लेकर यह कार्य संभव नहीं है, तब भी यदि आप उसके लिए लड़ नहीं रहे हैं तो वह भी आपके साथ क्यों आएगा ?
भारत की समस्त आबादी में विभिन्न वर्गों और समुदायों के मौर्चे के बाद ही यह महत्वपूर्ण कार्य संभव हो सकता है।
दरअसल वाम पन्थ की यह समस्या उतनी ही पुरानी है जितना पुराना वामपंथ, इसलिए लगभग 90 वर्षों के बाद भी यहाँ क्रांति तो दूर की कोडी रही, राष्ट्रीय पैमाने पर सभी वर्गों कि कोई गोलबंदी तक नहीं हो पाई है और समझते हैं कि सारी दुनिया भर का सच इनके ही पास है। सामाजिक प्रयोग ऐसा कि नक्कारखाने में तूती की आवाज। और सबसे ज्यादा सच्चे सबसे ज्यादा क्रांतिकारी। सबसे ज्यादा सच के करीब और सबसे ज्यादा वैज्ञानिक विचारधारा।
दलितों के लिए और जाति प्रथा के विरोध में जबरदस्त आवाजें इस देश में उठी हैं। बेशक, आवाज उठाने वालों के दर्शनशास्त्र, अर्थशास्त्र और मुक्ति के रास्ते सही नहीं थे, किन्तु जाति के सवाल पर अहसास का धरातल और उनके जज्बे में कोई शक नहीं है, चाहे वे ज्योतिबफुल्ले हो या डॉ. भीमराव आम्बेडकर। इनके बाद जो भी दलित नेतृत्व आया वह सत्ता में भागीदारी के नाम पर सत्ता का ही गुलाम हो गया है और दलितों पर अत्याचारों के मामलों पर वह भी चुप्पी साध लेता है या एक बयान भर दे लेते हैं, उसके बाद फिर कहीं दूसरी जगह पर घटना घट जाती है।
आज दलितों के इस उत्पीड़ित हिस्से की आवाज उठाने वाली कोई पार्टी या संगठन नहीं है। एक ऐसी पार्टी जो इनकी आर्थिक, सामाजिक स्थिति को लेकर एक देश व्यापी आन्दोलन विकसित करे, क्योंकि यह महज एक बयान बाजी का मामला नहीं है और न हीं एड्होक रूप से प्रतीकात्मक धरने या प्रदर्शन का है, महज सौ-पचास लोगों के धरने-प्रदर्शन से विरोध तो दर्ज हो सकता है, किन्तु वह प्रतिरोध सिस्टम पर कोई किसी प्रकार का दबाव बनाने में कामयाब नहीं हो पाता है। सिस्टम इतना ज्यादा गूंगा और बहरा हो चुका है कि उसके कानों तक आवाज़ पहुंचने के लिए कम से कम लाख–पचास हजार लोग सड़कों पर उतरने चाहिए और निरन्तर आन्दोलन चलना चाहिये ऐसा आन्दोलन जो सिस्टम की रातों की नींद हराम कर दे और दबंग जातियां या तो इस मध्ययुगीन बर्बरता को त्याग दें, नहीं तो ऐसा दुःसाहस करते समय थर-थर काँप उठे और जाति –प्रथा को भी जमीन में गाड़ा सके।
जेपी नरेला


