क्रोनी पूंजीवाद के संकट पर मोदी सरकार की नाकामी उजागर करेंगे प्रशांत भूषण

न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव की तरफ से आयोजित विचार गोष्ठी

दरबारी/ क्रोनी पूंजीवाद के संकट मोदी सरकार की उजागर होती नाकामी

Prashant Bhushan will highlight the failure of Modi government on the crisis of Crony Capitalism

नई दिल्ली, 23 नवंबर। जानेमाने वकील और एक्टिविस्ट प्रशांत भूषण, जेएनयू टीचर्स एसोसिएशन के अध्यक्ष अतुल सूद व जेएनयू के रोहित आजाद कल शनिवार, 24 नवम्बर 2018 को 4 बजे शाम, न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव की तरफ से आयोजित विचारगोष्ठी “दरबारी/ क्रोनी पूंजीवाद के संकट मोदी सरकार की उजागर होती नाकामी” पर अपने विचार व्यक्त करेंगे।

यह गोष्ठी नई दिल्ली के प्रेस क्लब आफ इंडियामें होगी।

what is crony capitalism

न्यू सोशलिस्ट इनिशिएटिव की तरफ से यह जानकारी देते हुए कहा गया है -

“दोस्तों

अर्थव्यवस्था के नवउदारवादी प्रबंधन के मापदण्डों के आधार पर भी सोचें तो हम पाते हैं कि मोदी हुकूमत अपने इरादों में असफल रही है। नोटबन्दी एक किस्म की बुलायी गयी आपदा थी। अर्थव्यवस्था के असंगठित क्षेत्र को, जिसमें कृषि भी शामिल थी, उसने तबाह कर दिया। लोगों की संतुलित सलाहों से बिल्कुल बेख़बर रहने वाली अहंकारी सरकार ने उसे लोगों पर लादा। जीएसटी को जिस तरह अमली जामा पहनाया गया उसने इस सरकार की शासकीय असफलताओं को सभी स्तरों पर उजागर कर दिया। अब यह हुकूमत रिजर्व बैंक आफ इंडिया के साथ एक बेढंगे विवाद में उलझी है। इस दौरान, अर्थव्यवस्था के वास्तविक चिंताजनक पहलूओं को - कृषि आय में घटोत्तरी, रोजगार का संकट और मजदूरी में ठहराव, सार्वजनिक एवं निजी क्षेत्र द्वारा निवेश में कमी और असंगठित क्षेत्रा में जमा धन में गिरावट, जहां 90 फीसदी भारतीय काम करते हैं - सम्बोधित नहीं किया जा रहा है। इसके बजाय, आम लोगों के जीवन को और दुश्वार बनाने के लिए मोदी सरकार समाजकल्याण की मौजूदा नीतियों पर कैंची लगाती दिख रही है। उसने योजनाबद्ध तरीके से ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना को समाप्त किया है, जो पूर्ववर्ती संप्रग सरकार के दूसरे कार्यकाल के दौरान भी लोगों की मजदूरी बढ़ने का कारक बनी थी। उसने बड़ी पूंजी को करों में छूट प्रदान की है, कार्पोरेट टैक्स को 30 फीसदी से 25 फीसदी तक कम किया है और दूसरी तरफ, पेट्रोलियम उत्पादों पर करों को बढ़ा कर आम आदमी से हर साल कई कई लाख करोड़ रूपए निचोड़ने का इन्तज़ाम किा है। पूर्ववर्ती किसी भी सरकार ने निजी पूंजी को बढ़ावा देने के लिए सार्वजनिक क्षेत्र को इतनी बेशर्मी के साथ कमजोर नहीं किया होगा, जैसा कि मौजूदा सरकार ने किया है।

खालिस फासीवादी अन्दाज़ में, मोदी सरकार अपनी नाकामियों को झूठ के आवरण में ढंकने की कोशिश में मुब्तिला है। अगर 2015 के लेबर ब्युरो सर्वेक्षण में यह दिखाई दिया कि रोजगार बढ़ नहीं रहे हैं, तो उसने सर्वेक्षण का काम ही समाप्त कर दिया। नोटबन्दी और जीएसटी के बाद अर्थव्यवस्था का असंगठित क्षेत्र भले ही पस्ती में पड़ा हो, उसने सकल वृद्धि दर को बेहतर दिखाने के लिए अर्थव्यवस्था में उसके पुराने अनुपात को ही दिखाना जारी रखा है। कृषि उत्पादों के न्यूनतम खरीद मूल्य को उसने चार सालों से कृत्रिम तरीके से नीचे रखा और अब अपने आखरी वर्ष में जब चुनावों का अब ऐलान होने को है, उसने इसमें बड़ी बढ़ोत्तरी का ऐलान किया है। हालांकि, वह खुद किसानों से कुछ उत्पाद खरीद नहीं रही है, जिन्हें फिर अपने उत्पादों को लागत से भी कम कीमत पर निजी व्यापारियों को बेचने के लिए मजबूर होना पड़ा है। दूसरी तरफ, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों से लाखों करोड़ रूपए लिए बड़े पूंजीपतियों को बचाने में उसे कोई गुरेज नहीं है। ऐसे डिफाल्टर्स के नाम जिन्हें रिजर्व बैंक के गवर्नर ने मोदी सरकार को बताए थे, उन्हें भी सार्वजनिक वित्त की देखरेख कर रही संसदीय समिति के सामने उजागर करने से उसने इन्कार किया है।

अब मोदी सरकार जितना भी छिपाने की कवायद करे, दरबारी/क्रोनी पूंजीवाद संचालित करने तमाम प्रमाण और अर्थव्यवस्था के कुप्रबंधन की तमाम मिसालें लगातार सामने आ रही हैं। उसकी फासीवादी जड़ों को देखते हुए, यह अन्दाज़ा लगाया जा सकता है कि वह अंधराष्ट्रवाद, अल्पसंख्यकद्वेष को उभारने की कोशिश करेगी, सार्वजनिक कल्याण के असली सरोकारों से लोगों का ध्यान बंटाने के लिए अधिकाधिक झूठ परोसेगी।

हमारे सामने विकसित होते इस समूचे घटनाक्रम को देखते हुए भारत की जनता को फिलवक्त़ चाहिए कि वह मौजूदा संकट के कारण और उससे निकलने के संभावित रास्तों पर गंभीर विचार विमर्श के लिए तैयार रहे।“

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