खट्टरों और मोदियों को समझना होगा यह देश पागलखाना नहीं है न ही इसको कोई बनने देगा
खट्टरों और मोदियों को समझना होगा यह देश पागलखाना नहीं है न ही इसको कोई बनने देगा
हरिशंकर परसाई और शरद जोशी जिंदा होते, या तो उन्हें आत्महत्या करनी पड़ती या फिर उनकी जिंदगियां जेलों में ही गुजरतीं
महेंद्र मिश्र
खट्टर साहब का फरमान आया, किकू शारदा को गिरफ्तार करो। फिर क्या था हरियाणा पुलिस ने मुंबई जाकर अपने आका के हुक्म की तामील की।
अब इस देश में कोई हंसेगा नहीं। मजाल क्या कि कोई खुश रहे? ऐसे में जबकि सरकार ने उसके रोने की हर व्यवस्था कर दी है। बावजूद इसके कुछ लोग अभी भी मनोरंजन कर ले रहे हैं। वह भी मिमिक्री के जरिये नकली ही सही। ऐसे में भला सरकार कैसे बर्दाश्त कर सकती थी।
पलक का कसूर सिर्फ इतना था कि उन्होंने अभिनय में उस बाबा राम रहीम की नकल कर दी थी, जिसने अपनी ही दो फिल्मों में अभिनय के बाद खुद पर हंसने के लिए कुछ नहीं छोड़ा था।
एक अजायबघर से निकले इंसान से इससे ज्यादा उम्मीद भी क्या की जा सकती है। खट्टर साहब जीवन भर संघ के खोल में रहे। बाहर की दुनिया उन्होंने देखी ही नहीं। और फिर मोदी जी ने पता नहीं अपनी दोस्ती के किसी अहसान की वजह से या फिर हरियाणा को सीधे अपने अंगूठे के नीचे रखने के मंसूबों के चलते उन्हें सूबे की गद्दी पर बैठा दिया। संघी कुएं का मेढ़क लोकतंत्र के समुद्र में जाएगा तो कुछ ऐसी ही हकरतें करेगा।
इस देश में अब किसी की नकल करना भी अपराध है। ऐसे में अगर हरिशंकर परसाई और शरद जोशी जिंदा होते, या तो उन्हें आत्महत्या करनी पड़ती या फिर उनकी जिंदगियां जेलों में ही गुजरतीं। दोनों की नजरों से शायद ही कोई बचा हो। जिसकी उन्होंने बखिया नहीं उधेड़ी हो। बड़े से बड़े ओहदेदार को भी उन्होंने नहीं छोड़ा। बाद के दिनों में आलोक पुराणिक से लेकर दूसरे लोगों ने इसे आगे बढ़ाया। यहां तक कि मौजूदा समय में भी कई चैनलों में प्रसारित इस तरह के कार्यक्रम लोगों के पसंदीदा कार्यक्रमों में से एक हैं। कार्टून तो पत्रकारिता का एक स्थापित माध्यम बन चुका है। शंकर से लेकर आर के लक्ष्मण और सुधीर तेलंग से लेकर इरफान तक की एक लंबी विरासत है। जिन्होंने इस क्षेत्र को नई ऊंचाइयां दी।
खट्टर साहब व्यंग्य, कार्टून, मिमिक्री, कॉमेडी एक विधा है। कला और सृजन के इन रूपों पर लगाम लगाइयेगा तो इंसानी जिंदगियों के कई आयाम ही खत्म हो जाएंगे। शरीर हाड़ मांस का सिर्फ पुतला नहीं है। जिसे सिर्फ भोजन की जरूरत है और जो सोने के साथ दिशा मैदान में जाकर खत्म हो जाती हो। इंसानी जीवन में सृजनात्मकता के जितने आयाम खुलते हैं वही असली जिंदगी होती है। किसी और से न सही कम से कम भारतीय संस्कृति से ही कुछ सबक ले लेते। साहित्य, संस्कृति, कला विहीना साक्षात पशु पुच्छ विषाण हीना।
कबीर ने तो किसी इंसान क्या भगवान तक को नहीं बख्शा। पंडा, पुरोहित, मुल्ला-मौलवी और पादरियों की बात ही क्या है, लेकिन उनकी हत्या नहीं हुई। न ही मुस्लिम शासकों ने उन्हें कभी जेल भेजा।
इस श्लोक और कबीर की उस विरासत को ही जान-समझ लेते तो ऐसा नहीं करते। लेकिन आपको न तो भारतीय संस्कृति से कुछ लेना देना है और न ही उसकी परंपरा से। आप का मंसूबा इस देश में एक फासिस्ट राज स्थापित करना और उसकी सेवा में सारे निक्करधारियों और देश को लगा देना है। एक ऐसी मशीनी सोच जिसमें बगैर किसी ना नुकुर के आंख मूंदकर ऊपर के आदेश का पालन होता है। न कोई सवाल और न ही कोई संशय, क्योंकि वह आस्था का प्रश्न होता है। लेकिन खट्टरों और मोदियों को यह जरूर समझना होगा कि यह देश पागलखाना नहीं है। और न ही इसको कोई बनने देगा।


