खूनी होती हल और हथियार की जंग
खूनी होती हल और हथियार की जंग
वीरभान सिंह
न्याय की इस लडाई में नंदीग्राम और सिंगूर तलाश रहे नेता
एक तरफ धरती के लाल तो दूसरी ओर दलाल
सरकार की नीति और नीयत, दोनों में है खोट
विकास के मामले में राजनीति और देशहित से समझौता नहीं होना चाहिए, यह जुमला अक्सर चुनावी भाषणबाजी में सुनने को मिलता है लेकिन हिन्दुस्तान में इन दोनों ही मुद्दों पर राजनीति की जाती है। यह एक कडवी सच्चाई है। नेताओं का नजरिया समय के साथ न सिर्फ बदल गया है बल्कि बेहद घिनौना सा हो गया है। जब वह सत्ता में होते हैं तो उनकी सोच कुछ और होती है और जब विपक्ष में होते हैं तो कुछ और। नेताओं की यही बयानबाजी अक्सर टकराव का कारण बनती है।
हकीकत में देखा जाये तो इस तरह की घटनाओं का इतिहास काफी पुराना है। आजादी के बाद से जो सिलसिला शुरू हुआ था वह अब तक जारी है। उप्र में मायावती शासनकाल में जमीन के मुआवजे की आग ने मुलायम सिंह यादव सरकार की दादरी बिजली परियोजना की याद ताजा कर दी जिसमें अनिल अंबानी के लिए जमीनों का अधिगृहण किया गया था। बस अंतर सिर्फ इतना है कि उस दौर में मुलायम सिंह यादव अनिल अंबानी के साथ थे और अब मायावती यमुना एक्सप्रेस-वे का काम देख रहे जेपी गु्रप के साथ। मगर, मुद्दा तो वही है ना कि आखिर जनता के साथ कौन है ? जमीन की जंग को लेकर आंदोलित हो रहे किसानों के मामले को एक तरफ मुख्यमंत्री मायावती जल्द से जल्द ठंडा करना चाह रही थीं तो दूसरी ओर उनके विरोधी, किसानों की इस मांग में नंदीग्राम और सिंगूर तलाश रहे थे।
मेरठ का शताब्दीनगर, इलाहाबाद का करछना, हापुड का बझेडा खुर्द , अलीगढ का टप्पल, मथुरा का बाजना या फिर गौतम बुद्ध नगर का भट्टा पारसौल, कई ऐसे रण हैं जो किसानों के खून से रंगे हुए हैं। एक तरफ किसान हैं तो दूसरी तरफ सरकार। एक तरफ हल हैं तो दूसरी तरफ हथियार। अब हल और हथियार के इस समर में विजयी आततायी होंगे या फिर धरतीपुत्र यह तो वक्त ही बतायेगा, लेकिन महासंग्राम जारी है।
बंुदेलखंड में जहां भरपेट रोटी न मिलने पर किसान आत्महत्या कर रहे हैं वहीं शहरी विकास की चपेट में आए किसान अपनी जमीन बचाने के लिए मरने-मारने को तैयार हैं। एक दशक से विकास के नाम पर किसानों की जमीन पर सरकारी डकैत डाका डाल रहे हैं। पुश्तैनी जमीन को सस्ते में लेने की सरकारी नीयत ने ही इस जंग को इतना ज्यादा खूनी बना दिया है। आंकडे बताते हैं मुख्यमंत्री मायावती के शासनकाल में पुलिस तथा किसानों के बीच हुए टकराव में 14 लोगों की मौत हो गई जिसमें चार सुरक्षाकर्मी भी शामिल हैं। 2007 में घोडी बछेडा में पांच, 2009 में मथुरा के बाजना में एक, 2010 में टप्पल में चार, 2011 में करछना में एक और भट्टा पारसौल में चार लोगों के लिए जमीन का यह संघर्ष मौत की वजह बन गया। इसके अलावा सरकारी और निजी संपत्ति की क्षति का आंकलन करना मुश्किल है। इसकी एकमात्र वजह रही कि सरकार की नीति और नीयत खराब होना और विपक्ष की मौका परस्त राजनीति।


