गंगा का जलीय पुनर्जीवन के बहाने होता दलीय पुनर्जीवन
गंगा का जलीय पुनर्जीवन के बहाने होता दलीय पुनर्जीवन
अंशु शरण
तमाम सरकारी योजनाओं और गंगा बचाओ अभियान के बावजूद गंगा की स्थिति दिनोंदिन बिगड़ती चली जा रही है। इस सरकार द्वारा गंगा पुनर्जीवन की पहल एक ऐसी पहल है जो मूल समस्या से ध्यान हटा रही है। लगातार गंगा को जीवनदायिनी माँ, देवी, पवित्र पूजनीय आदि अलंकारों से सुशोभित करना, गंगा को भारतीय दर्शन की सांस्कृतिक धारा बनाने और दिखाने का संयुक्त प्रयास बेईमानी है। जब तक हम जल के मूल्यों को नहीं समझेंगे तब तक पवित्र गंगा में गंदगी बनी रहेगी और सबसे बुरी हालत तो उन नदियों की होगी जो पूजनीय नहीं है।
पूजनीय बना के गँगा के सफाई का यह अभियान कहीं न कहीं राष्ट्रवाद से ग्रसित है। उच्चतम न्यायालय की सरकार को फटकार भी गँगा सफाई अभियान के राष्ट्रीय माडल को लेकर ही था जिसमे स्थानीय स्तर पर खामियाँ थी जिसे हम मीडिया के शंखनाद में नहीं सुन पा रहे थे। कम शब्दों में कहें तो ये राष्ट्रवाद का प्रभाव ही है जो गँगा संरक्षण को जल संरक्षण से ज्यादा महत्वपूर्ण बनाता है।
गंगा पुनर्जीवन अभियान पर शक करने की एक बड़ी वजह और भी है जो उसके प्रवाह क्षेत्रों वाले राज्यों जैसे उत्तर प्रदेश बिहार और पश्चिम बंगाल के विधानसभाओं में भाजपा की कमजोर स्थिति से जुड़ा हुआ है। इस जलीय पुनर्जीवन के बहाने दलीय पुनर्जीवन की कोशिशें भी शुरू हो चुकी हैं। अगर हम प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र बनारस की बात करें जहाँ से इस अभियान की शुरुआत हुयी वहीँ एक और नदी वरुणा भी है जो वाराणसी जिले को दो भागो में बांटते हुए गंगा में जा मिलती है। प्रदूषण और कैन्टोमेंट क्षेत्र के होटल व्यवसायियों द्वारा अतिक्रमण के कारण दम तोड़ती वरुणा विलुप्ति के कगार पर है लेकिन ये अपने पूजनीय ना होने की कीमत उठा रही है और राष्ट्रवाद में निहित सामंतवाद की पुष्टि भी करती है।
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